गरिमापूर्ण देहरी- अब घर तो बड़ा पर उसमें परिवार बहुत छोटा

गरिमापूर्ण देहरी- अब घर तो बड़ा पर उसमें परिवार बहुत छोटा

नई दिल्ली। पहले एक घर होता था जिसमें बडा सा परिवार रहता था। अब घर तो बडा होता है लेकिन उसमें परिवार बहुत छोटा रहता है। परिवार में तब आजकल की तरह पति, पत्नी और उनके बच्चे ही उसमें नहीं रहते थे बल्कि दादा दादी, ताऊ ताई, चाचा चाची,बुआ,भतीजे और गरीब संबंधियों के एक दो बच्चे भी उसी घर में रहते थे । उस घर की एक चौखट भी होती थी, जो आमतौर पर शीशम की लकड़ी की बनी होती थी। खूब मोटी मजबूत तो होती ही थी, काफी चौड़ी भी होती थी। लगभग आठ दस इंच की चौड़ी वो चौखट बहुत गरिमापूर्ण होती थी। घर और बाहर का विभाजन इसी चौखट से होता था। इस चौखट पर कितने ही लोगों को सिर झुकाना पडता था। घर के अंदर रहने वालों के लिए भी ये चौखट मर्यादा की सीमा रेखा हुआ करती थी। चौखट की पूजा की जाती थी। गोस्वामी तुलसीदास ने इस चौखट का महत्व बताते हुए अपने विश्व प्रसिद्ध प्रबंध काव्य रामचरित मानस में लिखा है- राम नाम मनि दीप धरि, जीह देहरी द्वार तुलसी भीतर बाहरेउ,जो चाहसि उजियार अर्थात तन और मन दोनों को उज्ज्वल बनाना चाहते हो तो प्रभु श्रीराम के नाम रूपी मणि के दीपक को अपनी जिह्वा पर रखिए। ये जिह्वा भी शरीर की देहरी अर्थात चौखट ही है। घर की चौखट पर दीपक रखने से घर के अंदर और बाहर दोनों जगह उजियार अर्थात उजाला हो जाता है। अभी पिछले दिनों इसी चौखट का जिक्र हुआ था।

वरिष्ठ पत्रकार जेपी शुक्ला के साथ उनके घर पर ही बातचीत हो रही थी। साथ में मधुसूदन त्रिपाठी भी थे। कोरोना संक्रमण के इस काल में बहुत जरूरी काम होने पर ही बाहर निकलना होता है। ऐसे में कितने ही लोगों से सिर्फ मोबाइल से बात होती रहती है। मधुसूदन घनिष्ठ मित्रों में हैं। पडोस में रहते भी हैं, इसलिए सामने पार्क में अक्सर मिलना हो जाता है। जेपी शुक्ला और डाॅ रमेश दीक्षित के पास कविताओं और संस्मरणों का खजाना है। इनके पास बैठना अच्छा लगता है। हम दोनों जेपी शुक्ला जी के घर पहुंच गये। बात चीत का सिलसिला चल रहा था तभी चैखट का जिक्र आया। दरअसल, बात कुछ अच्छे लोगों की हो रही थी। शुक्ला ने राजमोहन गांधी का नाम लिया। वे राजनेता से बढकर समाजसेवी और लेखक हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पौत्र और राज गोपालाचारी के नाती होने के कारण उनमें विशिष्ट गुणों की अपेक्षा की भी जा सकती है। बापू पर कई पुस्तकें लिखी गयीं लेकिन राज मोहन गांधी ने 'ए ट्रू स्टोरी आफ मोहनदास कर्मचन्द गांधी' में जिस तरह की बातें लिखी हैं, उनमें दादा और पोते का स्नेह भी झलकता है। राजमोहन गांधी को केजरीवाल की पार्टी ने 2019 में पूर्वी दिल्ली से लोकसभा का चुनाव भी लडवाया था। जेपी शुक्ला ने उनकी सरलता और सहजता को उसी दौरान देखा। इसी सिलसिले में चैखट का जिक्र भी आया था। शुक्ला जी ने बताया कि राजमोहन गांधी के साथ एकबार अमेठी जाना हुआ। वहां संजय जी के घर गये। संजय के घर में बहुत ऊंची और चौड़ी चौखट लगी है। चौखट पार करते समय राज मोहन गांधी के पैर में चोट लग गयी। उनक साथ कई कार्यकर्ता भी थे लेकिन उनको कहां इतनी फुर्सत कि देखते राजमोहन गांधी के कहां चोट लगी है? राज मोहन ने भी किसी को नहीं बताया। आजकल के नेताओं की बात होती तो फौरन मरहम पट्टी कराकर अखबारों में खबर भी छपवा दी जाती। खैर, संजय सिंह से बात करके राजमोहन लखनऊ के राज्य अतिथि गृह पहुंचे। अबतक लगभग साढ़े नौ बज रहे थे। शुक्ला बताने लगे कि उन्हे तो पता था कि राज्य अतिथि गृह में साढे 8 बजे काउंटिंग हो जाती है कि कितने लोगों के लिए भोजन बनना है। इसलिए उन्होंने राजमोहन जी से अनुरोध किया कि आप मेरे घर पर भोजन करना पसंद करें, तो व्यवस्था करा दूं क्योंकि यहां आपको अब भोजन नहीं मिलेगा। जेपी शुक्ला जी उन दिनों अतिथि गृह के बगल वाले हास्टल में ही रहते थे। शुक्ला जी बता रहे थे कि भोजन कराने से पहले वे राजमोहन गांधी जी को सिविल अस्पताल की इमरजेंसी, जहां आजकल झलकारी बाई अस्पताल बना है,ले गये। वहां एटीएस का इंजेक्शन लगवाया। पट्टी बांधकर दवा भी दी गयी क्योंकि एडी के पास पैर काफी फट गया था।

शुक्ला जी ने यह वाकया सुनाया तो मुझे अपने गांव के घर की वह देहरी याद आ गयी जिसपर बाबा महीने में एकबार अपने हाथ से कपड़े से सरसों का तेल लगाते थे। उन दिनों सभी घरों में चौखट होता थीं, अन्तर सिर्फ मोटी औरा पतली का हुआ करता था। यही चौखट घर की हैसियत भी बताती थी। जितना बड़ा घर, उतनी मोटी चौखट। नामदार लोगों की चौखट पर नौबत बजती थी। घरों में चौखट तो आज भी होती है लेकिन वो फर्श के अंदर रहती है। उसके तीन हिस्से ही दिखाई पड़ते हैं। कुछ घरों में चौखट की पूजा अब भी होती है। शीतलाश्टमी को दरवाजे पर थाप लगायी जाती है ताकि कोई बला अंदर प्रवेश न कर सके। घर बनाते समय चौखट के नीचे शुभ प्रतीक पीले या लाल कपड़े में बांध कर दबा दिये जाते थे। माना जाता है नकारात्मक शक्ति को चौखट रोक देगी, ठीक उसी तरह से जैसे आज भी लोग धमकी देते हैं- खबरदार, आज के बाद इस चौखट पर पैर न रखना। देहरी लांघ जाना बहुत बड़ा दुस्साहस माना जाता था, विशेष रूप से लडकियों और महिलाओं के लिए । उनके लिए घर का आंगन ही सब कुछ हुआ करता था लेकिन अब सोच बदल गयी, परिस्थितियां भी बदल गयीं और संयुक्त परिवार तो न के बराबर रह गये हैं। लड़कियाँ, महिलाएं नौकरी करती हैं, व्यापार करती हैं। उन्हे पुरुषों से बराबरी का संवैधानिक अधिकार भी मिला हुआ है। इसके बावजूद देहरी का महत्व है। प्रधानमंत्री के रूप में और पहली बार सांसद बनने पर नरेन्द्र मोदी ने संसद भवन की देहरी को प्रणाम किया था। शादी के समय भी द्वार पूजन की परम्परा आज भी निभाई जाती है, भले ही गेस्टरूम में कार्यक्रम सम्पन्न हो रहा हो। नयी बहू चौखट की पूजा करने के बाद ही गृहप्रवेश करती है। इस चौखट का सम्मान बना रहे, यह सीख पूर्वजों ने दी है। (हिफी)

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