भाई-बहन के अटूट बंधन का प्रतीक 'भैयादूज'

भाई-बहन के पवित्र बंधन और प्रेम का प्रतीक भाईदूज और कलम के आराध्य देव भगवान चित्रगु्प्त की पूजा धूमधाम के साथ मनायी जा रही है।;

Update: 2020-11-16 07:24 GMT

पटना। बिहार में भाई-बहन के पवित्र बंधन और प्रेम का प्रतीक भाईदूज और कलम के आराध्य देव भगवान चित्रगु्प्त की पूजा धूमधाम के साथ मनायी जा रही है।

भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह के प्रतीक का पर्व 'भैयादूज' और कलम के आराध्य देव भगवान चित्रगु्प्त की पूजा बिहार में धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनायी जा रही है। भाईदूज को 'यम द्वितीया' के नाम से भी जाना जाता है। यह भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का पर्व है। इस पर्व को बड़ी श्रद्धा-भक्ति और निःस्वार्थ प्रेम के रूप में मनाया जाता है।

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रक्षाबन्धन के अलावा भाईदूज ऐसा दूसरा त्योहार है, जो भाई-बहन के अगाध प्रेम को समर्पित है। यह त्योहार रक्षाबंधन की तरह ही महत्व रखता है। भाईदूज के दिन विवाहिता बहनें अपने भाई को भोजन के लिए अपने घर पर आमंत्रित करती है। भाई-बहन का प्यार अटूट होता है। विवाहिता बहन अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी उम्र की कामना करती है। इसके बदले भाई भी उनकी रक्षा का संकल्प लेते हुए उपहार देते हैं।

भैयादूज के दिन गोधन कूटने की प्रथा भी है।गोधन कूटने के लिए सारी महिलाएं एक जगह एकत्र होती हैं और गीत भी गाती हैं।गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। जगह-जगह महिलायें गोधन कूटने की रस्म को पूरा करते हुए अपने भाइयों के लंबी उम्र की कामना कर रही हैं। ऐसी मान्यता है कि गोधन कूटने वाली बहनों के भाइयों की उम्र लंबी हो जाती है।बिहार में भैयादूज काफी धूमधाम से मनाया जा रही है। बहनों ने भाइयों की पूजा की और भगवान से उनकी लंबी उम्र की कामना की।


भाईदूज के दिन बहनें अपने भाईयों को पारंपरिक तरीके से बजरी खिलाती है। बजरी को खिलाने के पीछे मान्यता है कि भाई खूब मजबूत बनता है। बहनें अपने भाईयों को पहले खूब कोसती हैं फिर अपनी जीभ पर कांटा चुभाती हैं और अपनी गलती के लिए भगवान से माफी मांगती हैं। बजरी खिलाने के बाद भाई अपनी बहन को आशर्वाद देते हैं। इसके पीछे यह मान्यता है कि यम द्वितीया के दिन भाइयों को गालियां और श्राप देने से उन्हें यम (मृत्यु) का भय नहीं रहता।

भगवान चित्रगुप्त की पूजा भी पूरे बिहार मे धूमधाम के साथ मनायी जा रही है। हिंदू धर्म में चित्रगुप्त की पूजा का विशेष महत्व है। चित्रगुप्त कायस्थों के आराध्य देव हैं। भगवान चित्रगुप्त कलम को देवता माना जाता है। चित्रगुप्त पूजा करने से साहस, शौर्य, बल और ज्ञान की प्राप्ति होती है। कायस्थ पूजा के दिन भगवान चित्रगुप्त के साथ ही कलम और बही-खाते की भी पूजा करते हैं क्योंकि ये दोनों ही भगवान चित्रगुप्त को प्रिय हैं। इसके साथ ही अपने आय-व्यय का ब्योरा और घर परिवार के बच्चों के बारे में पूरी जानकारी लिखकर भगवान चित्रगुप्त को अर्पित की जाती है।

चित्रांश परिवार में कलम दवात की पूजा को लेकर गजब उत्साह देखने को मिल रहा है। कायस्थ समाज के लोग काफी श्रद्धा के साथ अपने घरों के अलावा मंदिरों में भी कलम और दवात की पूजा कर रहे हैं। राजधानी पटना में कई जगहों पर भगवान चित्रगु्प्त की प्रतिमाएं स्थापित की गयी है। गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी, अनिसाबाद के अलावा कई जगहों पर चित्रगुप्त पूजा का विशेष आयोजन किया गया है। प्रात: मंदिर परिसर में सैंकड़ो की संख्या में चित्रांश समाज के लोगों ने कलम के देवता भगवान चित्रगुप्त की सामूहिक पूजा-अर्चना की एवं अपने इष्ट देवता के समक्ष साल भर के आय-व्यय का लेखा-जोखा रखा और मनोवांच्छित फल और शांति के लिए कामना की।


 

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