राजनीतिक दलों ने नहीं जताया आधी आबादी पर भरोसा

बागपत। महिलाओं के उत्थान के लिए बढ़ चढ़ कर बातें करने वाले राजनीतिक दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत में विधानसभा का टिकट देने के मामले में कदम पीछे करते रहे हैं।
बागपत में लगभग सभी प्रमुख पार्टियां महिलाओं को प्रत्याशी बनाने से हिचकती रही हैं। हालांकि यहां की महिलाओं ने मौका मिलने पर अपनी राजनीतिक परिपक्वता का इजहार चुनाव जीत कर किया है। यहां दो बार महिलाएं चुनावी मैदान में उतारी गयी और पहली ही बार में वे विधायक भी बनीं।
बागपत की छपरौली सीट से सबसे पहले वर्ष 1980 में सरोज देवी चुनाव लड़कर विधायक बनी थीं। इसके बाद बागपत विधानसभा सीट से वर्ष 2012 में बसपा ने हेमलता चौधरी को प्रत्याशी बनाया। वह नवाब कोकब हमीद को हराकर विधायक बनी थीं। इसके बाद भी बड़ी पार्टियां महिलाओं पर भरोसा नहीं जता रही हैं।
इस बार किसी भी पार्टी ने अभी तक महिलाओं को टिकट नहीं दिया है। बागपत की तीनों विधानसभा सीटों पर करीब चार लाख 25 हजार 474 महिला मतदाता है। इनमें सबसे ज्यादा छपरौली विधानसभा सीट पर हैं। छपरौली विधानसभा सीट पर करीब एक लाख 48 हजार 619, बड़ौत विधानसभा सीट पर करीब एक लाख 34 हजार 998 तथा बागपत सीट पर भी करीब एक लाख 41 हजार 857 महिला मतदाता हैं। इसके बावजूद किसी भी राजनैतिक दल ने एक भी महिला को प्रत्याशी घोषित करना मुनासिब नहीं समझा।
बागपत निवासी ममता यादव का कहना है कि महिलाओं को राजनीति व टिकट में भागीदारी मिलनी चाहिए। इससे महिला शक्ति को बढ़ावा मिलेगा। वे राजनीति में आकर महिला उत्थान समेत उनकी बेहतरी के लिए काफी कार्य कर सकेंगी।
रूपाली शर्मा का कहना है कि महिलाओं को राजनीति में आगे लाना चाहिए। महिला ही महिलाओं की समस्याओं को बेहतर तरीके समझ सकती है। इस पर सभी पार्टियों को ध्यान देना चाहिए। जिससे महिला जनप्रतिनिधि बनकर बेहतर कार्य कर सकें। अनीता देवी का कहना है कि जब महिला देश की प्रधानमंत्री बन सकती है तो उनको राजनीति में आगे लाने में क्या परेशानी है।
वार्ता