घायल जवानों के लिए संजीवनी बनी 'रक्षिता'

घायल जवानों के लिए संजीवनी बनी रक्षिता

छत्तीसगढ। नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में ना जाने ऐसे कितने इलाके और गांव हैं जहां अभी भी नक्सलियों के डर से सड़कें बेहतर स्थिति में नहीं बन पाई है। ऐसे में मोटरसाइकिल एंबुलेंस रक्षिता छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के लिए किसी देवदूत से कम नहीं है।

दरअसल आजादी के इतने वर्षों बाद भी नक्सली इलाके छत्तीसगढ़ में सड़कों का बेहतर जाल नहीं बिछ पाया है। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों के अलावा जंगल में रहने वाले आदिवासी गांव में विकास तो छोड़िए, बुनियादी जरूरतों के लिए भी सुविधाएं नक्सलियों की वजह से लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे हालातों के बीच सीआरपीएफ के लिए विकसित की गई रक्षिता एंबुलेंस जहां फोर्स के लिए जीवनदायिनी बन रही है, वहीं ग्रामीणों को भी इसका लाभ पहुंच रहा है। इन जंगलों में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को सबसे ज्यादा दिक्कत स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं को लेकर है। जहां आए दिन मलेरिया से लेकर दूसरी बीमारियां लोगों को अपनी चपेट में ले लेती है।

नक्सलियों से मुकाबला करते हुए सीआरपीएफ के जवान भी घायल हो जाते हैं। रास्ते संकरे होने की वजह से सीआरपीएफ के जवानों को नक्सलियों के हमले में घायल होने के बाद समय से चिकित्सा नहीं मिल पाती। जिससे उनके प्राणों पर संकट बना रहता है। ऐसे में बाइक एंबुलेंस रक्षिता सीआरपीएफ के जवानों का सहारा बनी है। जो ग्रामीणों के भी काम आ रही है। कवर्धा से लेकर नारायणपुर तक ऐसे न जाने कितने इलाके हैं, जहां बाइक एंबुलेंस लोगों की मददगार बन रही है। गिरगांव के जंगलों के अंदर बसे लोगों तक पहुंचने के लिए सड़के नहीं होती अथवा चार पहिया वाहन नहीं होते। वहां पर बाईक एंबुलेंस आसानी से पहुंच जाती है। जिससे जवानों को आसानी से चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हो जाती है और उन्हें समय से अस्पताल में पहुंचा दिया जाता है।




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