मियाद बीतने के बाद किया गया दावा अर्थहीन -उच्च न्यायालय

लखनऊ । इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ ने एक अहम फैसले में कहा कि वादकारी की तरफ से देरी से और मियाद बीतने के बाद पेश किया गया दावा राहत से इन्कार की ओर ले जाता है।
अदालत ने संकेत किया कि अच्छा खासा राहत देने के लिए वाजिब केस भी देरी से पेश करने पर अर्थहीन हो जाता है ।
एक सेवा सम्बन्धी (सर्विस) मामले में इस अहम विधि व्यवस्था के साथ कोर्ट ने एक मृत सिपाही की पुत्री की अनुकम्पा नियुक्ति के आग्रह वाली याचिका को गुण-दोष विहीन करार देकर खारिज कर दिया। वर्ष 1984 में मृत सिपाही की 1985 में जन्मी पुत्री ने बालिग होने पर अनुकम्पा नियुक्ति की याचिका दायर की थी।
न्यायामूर्ति इरशाद अली ने सोमवार को यह अहम फैसला विजय लक्ष्मी यादव की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की कई नजीरों का हवाला देकर सुनाया। याची का कहना था कि उसके पिता की 22 जुलाई 1985 को एक मुठभेड़ के दौरान गोली लगने से मृत्यु हो गई थी। 3 फरवरी 1984 को याची का जन्म होने की वजह से उस समय वह नाबालिग थी। दो फरवरी 2002 को बलिग होने पर उसने मृतक आश्रित नियमावली 1974 के तहत अनुकम्पा नियुक्ति की अर्जी दी थी। इसके बाद भी उसे तैनाती नहीं दी गई।
उधर, सरकारी वकील का कहना था कि बालिग होने और अर्जी देने के काफी समय बाद याची ने याचिका दायर की। ऐसे में वह नियमों के तहत अनुकम्पा के आधार पर तैनाती पाने की हकदार नहीं है। कोर्ट ने सुनवाई के बाद उक्त विधि व्यवस्था के साथ याचिका खारिज कर दी।
वार्ता