वकालत या सरहद या फिर हो सियासत - हर फील्ड के माहिर रहे बाबू हुकुम सिंह

शामली। किसानी हो, वकालत हो, सरहद पर दुश्मन देश की सैना का डटे रहकर मुकाबला करना हो या राजनीति में अपने प्रतिद्धंदियों को धूल चटाना हो बाबू हुकुम सिंह कभी पीछे नहीं रहे। हर फिल्ड में बाबू हुकुम सिंह का डंका बजता रहा और अंतिम सफर में भी वह लोकसभा सांसद के रूप में दुनिया को अलविदा कह गये। बाबू हुकुम सिंह जनता के लिय अफसरों को फटकारने और पब्लिक की आवाज बुलंद करने में अग्रणी भूमिका निभाते थे। गजब वक्ता के तौर पर पहचान रखने वाले बाबू हुकुम सिंह का अपने जिले से लेकर प्रदेश की राजनीति में भी बड़ा कद रहा और कई बार सरकार में बनवाने में भी उनका बड़ा रोल रहा। किसान परिवार में जन्में बाबू हुकुम सिंह ने वकालत से अपनी शुरूआत की और पीसीएस जे की परीक्षा में सफल हुए तो भारत पर चीन ने हमला बोल दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने सेना में आने का आह्वान किया तो बाबू हुकुम सिंह के लिये देशसेवा सर्वोपरि हुई और उन्होंने भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान के युद्ध में बतौर सैनिक कैप्टन सरहद पर डटे रहे। स्थिति सामान्य होने के बाद वापस लौटकर बाबू हुकुम सिंह ने फिर से वकालत शुरू कर दी और अपनी लोकप्रियता के चलते जिला बार संघ के अध्यक्ष भी बने। बाबू हुकुम सिंह ने पहली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद बाबू हुकुम सिंह ने पीछे मुडकर नहीं देखा और अपने राजनीति करियर में सात बार विधायक और एक बार लोकसभा सांसद रहे। विधायक रहते हुए कई बार सरकारों में मंत्री भी रहे। इनके अलावा बाबू हुकुम सिंह एक बार विधानसभा उपाध्यक्ष भी रहे। बाबू हुकुम सिंह के सियासी सफर से रूबरू होने के लिये देखिये खोजी न्यूज की यह खास रिपोर्ट...

मुजफ्फरनगर जनपद के कस्बा कैराना निवासी मानसिंहे किसान ने सोचा नही था कि उनके घर में पैदा हुआ यह बेटा भविष्य में उत्तर प्रदेश की राजनीति का भाग्य विधाता बनेगा। 5 अप्रैल 1938 में पैदा हुआ यह बालक बाबू हुकुम सिंह के नाम से कैराना से लेकर लखनऊ से राज गलियारो तक में अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुए थे। बाबू हुकुम सिंह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक रहे। पढाई में उनकी रूचि को देखते हुए उन्हें इलाहाबाद उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेज दिया गया, जंहा से उन्होंने बीए एलएलबी की डिग्री हासिल की। इसी बीच जैसे ही बाबू हुकुम सिंह 22 वर्ष के हुए तो 13 जून 1985 को रेवती सिंह से उनका विवाह सम्पन्न हो गया। विधि स्नातक की उपाधि ग्रहण करने के उपरान्त बाबू हुकुम सिंह ने वकालत को ही अपना कैरियर चुना। उन्होने उस समय के विख्यात अधिवक्ता ब्रह्मप्रकाश से वकालत की ट्रेनिंग ली और 1962 में उन्होंने स्वतन्त्र रूप से वकालत शुरू कर दी। इसी बीच उन्होनें पीसीएस (जे) की परीक्षा दी, जिसमें वह सफल हो गये थे।

इससे पहले कि बाबू हुकुम सिंह न्यायिक मजिस्ट्रेट बनते भारत पर चीन ने हमला बोल दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत माँ की रक्षा का सवाल सर्वाेपरि हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्र के नाम संदेश में नवयुवकों से भारत माँ की रक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया। पं० नेहरू की भावुक स्पीच सुनकर बाबू हुकुम सिंह वर्ष 1962 में भारतीय थल सेना में चले गये, जहां वह अफसर के रूप में तैनात रहे। भारत-चीन युद्ध समाप्त होते ही पाकिस्तान की ओर खतरे के बादल मंडाराने लगे। 1965 में भारत पाकिस्तान के बीच भीषण युद्ध हुआ। उस समय बाबू हुकुम सिंह पुंछ राजौरी सैक्टर में कैप्टन के रूप में तैनात थे। इस युद्ध में उन्होने अपने अदभ्य साहस का परिचय दिया। चूंकि बाबू हुकुम सिंह ने देश पर छाये संकट के बादलों का सामना करने के लिए फौज की वर्दी पहनी थी। लिहाजा हालात सामान्य होने के बाद वह कैप्टन पद छोडकर वापस मुजफ्फरनगर आये और वर्ष 1969 में उन्होने पुनः वकालत शुरू कर दी। थोडे समय में ही बाबू हुकुम सिंह वकीलों के बीच लोकप्रिय हो गए। उन्होंनें 1970 में जिला बार संघ के अध्यक्ष का चुनाव लडा, जिसमें वह निर्वाचित हुए।
बाबू हुकुम सिंह की राजनीति में कोई रुचि नही थी। वह वकालत में ही स्थापित होना चहाते थे और विख्यात अधिवक्ता बनने की चाह रखते थे। इसी दशा में उनके जीवन मे एक ऐसा मोड आया, जब वह राजनीति सफर शुरू करने वाले बाबू हुकुम सिंह अंतिम सफर तक उस दिशा में अग्रसर रहे। 1974 में वह अपने व्यक्तित्व के कारण काफी लोकप्रिय हो चुके थे। वकालत के साथ-साथ वह सामाजिक आन्दोलनो मे भी हिस्सा लेते थे। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर कांग्रेस तथा भारतीय क्रांति दल दोनो ने ही उन्हें विधानसभा चुनाव लडने को निमंत्रण दिया। काफी जद्देजहद के बाद उन्होने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडने का मन बनाया और वह चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने। बाबू हुकुम सिंह ने वर्ष 1980 में पार्टी बदली और लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा और इस पार्टी से भी चुनाव जीत गए। वर्ष 1985 में जब बाबू हुकुम सिंह तीसरी बार विधायक बने तो उन्हें वीर बहादुर सिंह की सरकार में खाद्य एवं रसद आपूर्ति, संसदीय कार्य और पशुपालन जैसे विभागों का मंत्री बनाया गया। इसके बाद जब जब नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने बाबू हुकुम सिंह को राज्यमंत्री के दर्जे से उठाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया था।

इनके अलावा बाबू हुकुम सिंह को 1981-82 में लोकलेखा समिति का अध्यक्ष भी बनाया गया था। बाबू हुकुम सिंह वर्ष 1975 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के महामंत्री भी रहे। 1980 में लोकदल के अध्यक्ष बने और 1984 में वे विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे। 1995 में बाबू हुकुम सिंह ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और चैथी बार विधायक बने। कल्याण सिंह और रामप्रकाश गुप्ता की सरकार में वह मंत्री रहे। 2007 में हुए चुनाव में भी विधानसभा पहुंचे। बाबू हुकुम सिंह अपने राजनीति सफर में सात बार विधायक रहे। इसके अलावा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर कैराना लोकसभा सीट से चुनाव लडा और वो चुनाव भी बाबू हुकुम सिंह जीत गये। सांसद रहते वक्त ही बाबू हुकुम सिंह सांस में तकलीफ होने के कारण 3 फरवरी 2018 को उन्होंने अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह गये।