चारों सदनों में जाने के बाद भी मंत्री बनने से महरूम रह गए थे मुनव्वर
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शामली। पश्चिमी यूपी की पब्लिक आज भी चौधरी मुनव्वर हसन के किरदार की ऐसी दीवानी है कि अगर नेताओं की बात आती है तो उनका नाम जरूर लेती है और ले भी क्यों ना। जब काम ऐसा किया हो। अब पब्लिक यूं कहती है कि चौधरी मुनव्वर हसन जैसा नेता न तो है और आगे होना भी मुश्किल है। कैराना की धरती पर 15 तारीख को जन्में युवा ने 15 साल की उम्र में ही सियासी दहलीज पर कदम रखा और फिर ये कदम पीछे नहीं हटे, पीछे हटे तो सिर्फ गरीबों पर जुल्म करने वाले लोग। एक बड़े नेता ने चौधरी मुनव्वर हसन के पिता अख्तर हसन का टिकट कटवाया तो उस युवा चौधरी मुनव्वर हसन ने उस पार्टी को छोड़ी और निर्दलीय प्रत्याशी को चुनाव जिताने में अहम रोल निभाया और फिर अगले दो विधानसभा चुनावों में लगातार उस बड़े नेता को हराकर विधायक बने। इसके अलावा चौधरी मुनव्वर हसन दो बार लोकसभा सासंद, एक बार राज्यसभा सांसद और एक बार एमएलसी रहे। चौधरी मुनव्वर हसन का यह दुर्भाग्य रहा कि सियासत में बड़ा रुतबा और चारों सदनों का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी मंत्री बनने से मरहूम रह गए। एक बार जब चौधरी मुनव्वर हसन की मंत्री बनने की बारी आई थी तो उस वक्त लोकसभा में मंत्रियों की संख्या कम करने का प्रस्ताव पारित हो गया था और चौधरी मुनव्वर हसन मंत्री बनने से मरहूम रह गए थे लेकिन चौधरी मुनव्वर हसन का रूतबा मंत्रियों से कम नहीं रहा। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को पूर्व केन्द्रीय मंत्री काजी रशीद मसूद के पार्टी से निकाले जाने के बाद पश्चिमी यूपी में ऐसे नेता की कमी खली, जो मुस्लिम वोट बैंक का नेतृत्व कर सके लेकिन सपा को ऐसा चौधरी मुनव्वर हसन के रूप में ऐसा नेता मिला, जिन्होंने दबंग अंदाज और काम कराने की धुन से सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद सहित अन्य जिलों में भी मुस्लिम वर्ग के साथ-साथ सभी वर्गों में अच्छी पकड़ रखता था। चौधरी मुनव्वर हसन का मुलायम सिंह यादव के दरबार में कद हमेशा ऊंचा रहा। 10 दिसम्बर 2008 का दिन चौधरी मुनव्वर हसन के परिवार के लिये ही नहीं बल्कि उनके समर्थकों के लिये बड़ा ही बुरा साबित हुआ था। दुःख का पहाड़ इतना बड़ा था कि कैराना में उस दिन चूल्हों में आग भी नहीं जली थी। दबंग, निडर, धाकड़ और शेर नेता के नाम से जाने जाने वाले चौधरी मुनव्वर हसन की सियासी सफर पर पेश है खोजी न्यूज की खास रपट...
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कैराना कस्बे के अख्तर हसन गुर्जर बहुल इस क्षेत्र में अपनी राजनैतिक एवं सामाजिक पहचान रखते थे। इनके पूर्वज भी अपनी बिरादरी के आस पास 84 गांवों के चौधरी रहे। संभ्रांत राजनैतिक परिवार के अख्तर हसन नगरपालिका परिषद के चेयरमैन तथा 1984 में कैराना लोकसभा सीट से सांसद रहे। अख्तर हसन के परिवार में यूं तो कई बच्चों ने जन्म लिया लेकिन जिस बच्चे का नाम मुनव्वर हसन रखा था, उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि ये बच्चा बड़ा होकर देश एवं प्रदेश की राजनीति में अपना नाम करेगा आ राजनीति विरासत में मिलने के कारण मुनव्वर हसन ने जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही राजनीति शुरू कर दी। 15 साल की उम्र में मुनव्वर हसन ने शामली के दिग्गज नेता पूर्व राज्यपाल विरेन्द्र वर्मा की सरपरस्ती में सियासत के मैदान में ताल ठोककर कांग्रेस का झण्डा पकड़ा। 10वीं तक शिक्षा करने के बाद मुनव्वर हसन ने जनता व पार्टी के लिये आन्दोलनों में बढ़-चढ लेना शुरू कर दिया था। तब पूर्व मंत्री हुकुम सिंह की मुनव्वर हसन से राजनैतिक दुश्मनी हो गई थी, जब वह दोनों काग्रेस में थे क्योंकि हुकुम सिंह ने 1989 के लोकसभा चुनाव में मुनव्वर हसन के पिता अख्तर हसन का टिकट कटवा दिया था। इससे नाराज मुनव्वर हसन ने कांग्रेस का दामन छोड़कर मण्डल कमीशन के मसीहा राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल में शामिल हो गये। मुनव्वर हसन की कम उम्र की वजह से जनता दल उनको टिकट नहीं दे पाई। ऐसे में चौधरी मुनव्वर हसन ने हुकुम सिंह को हराने की ठान ली थी और निर्दलीय उम्मीदवार राजेश्वर बंसल के चुनाव की कमान संभाल कर हुकुम सिंह को हरवाने में अहम रोल अदा किया था।
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चौधरी मुनव्वर हसन 1991 में विधानसभा का चुनाव लड़ें और उन्होंने इस चुनाव में 42.34 प्रतिशत वोट हासिल कर कांग्रेस के उम्मीदवार हुकुम सिंह को हराया। इससे अगले चुनाव की बारी आई तो फिर 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में हुकुम सिंह से ही चौधरी मुनव्वर हसन का मुकाबला हुआ, जिसमें चौधरी मुनव्वर हसन ने 37.94 प्रतिशत मत प्राप्त कर हुकुम सिंह को हरा दिया और दूसरी बार विधानसभा पहुंचे थे। उसी दौर की बात थी कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री काजी रशीद मसूद का पश्चिमी यूपी में अच्छा खास रूतबा था लेकिन सपा संस्थापाक मुलायम सिंह यादव से मनमुटाव के चलते सपा से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उस वक्त यूं तो कई मुस्लिम नेता थे लेकिन किसी की भी अपने जनपद से बाहर पकड़ नहीं थी। मुलायम सिंह यादव सपा का पश्चिमी यूपी में वजूद बरकरार रखने के लिये ऐसा नेता ढूंढ रहे थे, जो उनकी पार्टी का झंडा मजबूती से उठाये रखे। 1996 के लोकसभा चुनाव में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने कैराना लोकसभा सीट पर 1993 में सपा में शामिल हुए दबंग विधायक चौधरी मुनव्वर हसन को अपना उम्मीदवार बनाया तो सियासी हल्कों में चर्चा थी कि सपा पश्चिमी यूपी में अपना वजूद बना पाती है या नहीं। लोकसभा चुनाव के परिणाम घोषित हुए तो पूरे पश्चिमी यूपी में मुरादाबाद के शफीकुर्ररहमान बर्क के अलावा अगर किसी ने समाजवादी पार्टी की लाज बचाई थी तो वो थे चौधरी मुनव्वर हसन। पहले तो चौधरी मुनव्वर हसन को जिला प्रशासन ने 17 हजार वोटों से हराने की घोषणा कर दी थी लेकिन चौधरी मुनव्वर हसन और कैराना लोकसभा की पब्लिक को यह सब गडबड लगा तो चौधरी मुनव्वर हसन अपने अंदाज में आ गये और उन्होंने मुजफ्फरनगर के जिला प्रशासन को हिलाकर रख दिया तथा पुर्नमतगणना हुई तो चौधरी मुनव्वर हसन भाजपा उम्मीदवार उदयवीर सिंह को हराकर पहली बार लोकसभा में पहुंचे थे।
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लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में सपा ने चौधरी मुनव्वर हसन को दोबारा अपना प्रत्याशी बनाया। भाजपा एवं अन्य दलों ने इस बार चौधरी मुनव्वर हसन को घेरने की तैयारी कर सपा की आपसी फूट का फायदा उठाया और चौधरी मुनव्वर हसन को हार का मुँह देखना पड़ा। चौधरी मुनब्बर हसन की हार से समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चौधरी मुनव्वर हसन के समर्थक हैरान और दुखी थे। चुनाव हारने के बाद भी चौधरी मुनव्वर हसन ने हौसला नही हारा और जनता की समस्याओं के लिए संघर्ष करते रहे। चौधरी मुनव्वर हसन की जनता एवं समाजवादी पार्टी के लिए संघर्ष को देखते हुए सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन्हें राज्यसभा में भेज दिया था। राज्यसभा में सांसद के रुप में पहुंचकर चौधरी मुनव्वर हसन ने देश के ऊपरी संदन मे तो अपनी आवाज बुलन्द की साथ ही वह पार्टी संगठन को मजबूत बनाने के लिये संघर्ष करते रहे।
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अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के पतन के बाद जब देश में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हुए तो सपा ने कैराना सीट पर भारी भरकम नेता हरेन्द्र मलिक तथा मुजफ्फरनगर सीट पर अमीर आलम खान को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। इस बीच अमीर आलम खां पार्टी छोड़कर लोकदल के टिकट पर कैराना सीट से चुनाव मैदान में कूद गये। अमीर आलम के पार्टी छोड़ने के बाद चौधरी मुनव्वर हसन ने हरेन्द्र मलिक को मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ाया और स्वयं कैराना सीट से सपा प्रत्याशी बन गये। इस चुनाव में समूचे उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह विरोधी लहर थी क्योंकि कांग्रेस ने प्रचार किया था कि मुलायम सिंह यादव ने ही कांग्रेस की केन्द्र सरकार नही बनने दी। एक तरफ तो मुसलमानों का कांगेस के पक्ष में झुकाव तो दूसरी तरफ सभी दलों ने चौधरी मुनव्वर हसन की घेराबन्दी कर जनता को बरगला दिया था कि मुनव्वर हसन आज भी सांसद है लेकिन मुलायम सिंह यादव ने एक मुसलमान अमीर आलम खां को हराने के लिए चौधरी मुनव्वर हसन को चुनाव मैदान में उतार दिया। बस यही संदेश चौधरी मुनव्वर हसन की दूसरी हार का कारण बन गया था। चौधरी मुनव्वर हसन की लोकप्रियता का अन्दाजा इसी बात से होता है कि रामपुर में भी कांग्रेस प्रत्याशी नूर बानों ने एक जनसभा में मुनव्वर हसन के चुनाव लड़ने का विरोध किया था। लोकसभा के दो चुनाव हारने के बाद भी राज्यसभा सांसद मुनव्वर हसन ने हिम्मत नहीं हारी और वह सड़कों पर जनता की लड़ाई लड़ते रहे।
यूं तो सपा में कई कददावर नेता थे लेकिन सत्ता आने के बाद भी जनता से उनका सम्पर्क कम ही रहा। इसी दौरान विधान परिषद के चुनाव में उस वक्त के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने चौधरी मुनव्वर हसन को मंत्री बनाने के लिये एम०एल०सी० का चुनाव लड़ाया लेकिन ये मुजफ्फरनगर ही नहीं बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि लोकसभा में मंत्रियों की संख्या कम करने का प्रस्ताव पारित हो गया था और जनता एक ऐसे नेता के मंत्री बनने से वंचित रह गई थी। विधान परिषद चुनाव में मतों को जबरन उठा कर मतदान कराने की परम्परा थी लेकिन जब चौधरी मुनव्वर हसन एम०एल०सी० पद के सपा प्रत्याशी बने तो उन्हें मतदाताओं को जबरन उठाने या डराने की जरूरत नहीं पडी क्योंकि उनके पक्ष में लहर थी और मुजफ्फरनगर ही नहीं सहारनपुर के जनप्रतिनिधि भी मुनव्वर हसन को जिताने के लिए कमर कसे हुए थे। एम०एल०सी० चुनाव की मतगणना हुई तो चौधरी मुनव्वर हसन ने रिकार्ड मतों से जीत तो हासिल की ही साथ ही उन्होंने 40 साल से कम उम्र में देश के चारों सदनों का प्रतिनिधित्व करने वाले विश्व के पहले नेता बन गये थे।
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वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर सपा प्रत्याशी के लिये मारामारी थी लेकिन सपा मुखिया ने अपना विश्वास चौधरी मुनव्वर हसन पर जताया था। मुलायम सिंह यादव ने अपने स्तर से जनपद के कार्यकर्ताओं एवं जनता के बीच जानकारी कराई थी तो परिणाम निकला था कि जनता की समस्याओं के निस्तारण के लिये समर्पित चौधरी मुनव्वर हसन को ही चुनाव अखाड़े में उतारा जाये हालांकि कादिर राना और अमीर आलम खां ने मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर चौधरी मुनव्वर हसन के टिकट दिये जाने का खुलकर विरोध किया था। सपा प्रत्याशी मुस्लिम एवं सजातीय मतों तक ही सीमीत रहते थे लेकिन चौधरी मुनव्वर हसन ने इस मिथक को तोड़ दिया था। उनके उस लोकसभा चुनाव में समाज के प्रत्येक वर्ग का समर्थन मिला था। जब चौधरी मुनव्वर हसन का सभी वर्गों ने चुनाव प्रचार जोरदार तरीके से किया तो सभी भौचक्के रहे गये थे। इस चुनाव का परिणाम आया तो चौधरी मुनव्वर हसन ने भाजपा उम्मीदवार अमरपाल सिंह को चुनाव हरा दिया और दोबारा लोकसभा सांसद बन गये थे। सपा से निष्कासित होने के बाद चौधरी मुनव्वर हसन बसपा में शामिल हो गए थे।
मुजफ्फरनगर लोकसभा से सांसद रहते वक्त चौधरी मुनव्वर हसन, उनके परिवार और उनके समर्थकों के लिये 10 दिसम्बर 2008 की रात बड़ी ही मनहूस साबित हुई क्योंकि चौधरी मुनव्वर हसन की सड़क हादसे में मौत हो गई थी और वह हमेशा के लिये दुनिया को अलविदा कह गये। चौधरी मुनव्वर हसन तत्कालीन ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय की बेटी की शादी में शरीक होकर दिल्ली लौट रहे थे। चौधरी मुनव्वर हसन धुन के ऐसे पक्के नेता थे, जिनमें जनता का नेतृत्व करने की शानदार क्षमता थी। चौधरी मुनव्वर हसन के दुनिया से चले जाने का दु:ख का पहाड़ इतना बड़ा था कि कैराना के अधिकतर चूल्हों में आग तक नहीं जली थी।