मेरे शब्द मेरी कविता– हां मुझको मोहब्बत हुई थी करता हूँ स्वीकार मैं,

प्यार नहीं करती हूं किसी से, बस प्यार को बखूबी जानती हूं। मेरे शब्दों में और मेरे वाक्यों में प्यार की अहमियत का बोध आप लोगों को करा रही हूं। शायद मेरे विचार आप सभी के प्यार से और सुंदर हो जाए। इसी लिए आपके लिए मैं मेघा गुप्ता लेकर आई हूं आज फिर मंगलवार के दिन एक और प्यार का नया अंदाज।
हां मुझको मोहब्बत हुई थी करता हूँ स्वीकार मैं,
किसी अजनबी के लिए हां जीता था मैं,,
उसके जाने से हर रात रोता था मैं,
उसको ढाई शब्द प्यार के बोलने से डरता था मैं,,
हां मुझे स्वीकार है किसी से प्यार करता था मैं!!
हर किसी को मोहब्बत करने से मना करता हूँ मैं,
लेकिन ये सच है हाँ एक पल किसी पर मरता था मैं,,
हां उसको बताया नहीं, वो मुझको आज भी जनती नहीं,
पर चोरी चोरी चुपके छुपके उसके सपनो को तख्ता था मैं,,
हां आज स्वीकार करता हूँ किसी से तो प्यार करता था मैं !!
जुबान पर नाम उसका और हाथों में गुलाब था,
एक दिन इजहार करने के लिए मैं भी तैयार था,,
पर दुनिया में उसकी बदनामी के डर से कदमों को पिछे हटा लिया था मैंने,
इसलिए अपना टैग उसपर लगाने से पहले ही ये दुनिया छोड़ गया था मैं,,
हां आज भी वो मोहब्बत जिन्दा है दिल में,
फर्क इतना है मैं उसकी दुनिया से दूर और वो किसी की तलाश में जिन्दा है,,
हां मैं स्वीकार करता हूँ किसी से प्यार करता था मैं!