फूलों का हास फूलवाले उदास

फूलों का हास फूलवाले उदास

नई दिल्ली। फूलों को देखकर कौन खुश नहीं होता लेकिन कोरोना संकट में फूलों के कारोबार पर भी बुरा असर पड़ा है। महामारी के करीब 8 महीने बाद भी बाजार में सन्नाटा फैला हुआ है। दिल्ली की गाजीपुर मंडी जो सब्जियों के साथ-साथ फूलों के कारोबार के लिए काफी फेमस है। त्योहारी सीजन में वहां पर भी बाजार ठंडा पड़ा हुआ है। एक ओर दिवाली और दूसरी ओर शादियों का सीजन, लेकिन इसके बाद भी बाजार में किसी भी तरह की रौनक देखने को नहीं मिल रही है। अन्य राज्यों में भी त्योहारी सीजन में फूलों का बाजार ठंडा पड़ा है।

दिल्ली की मंडी में फूलों का बाजार सुबह 4-5 बजे ही लगना शुरू हो जाता है। त्योहारी सीजन में यहां फूलों की मांग सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाती है और तो और यहां देशी-विदेशी फूलों से शादी की वरमाला भी तैयार की जाती है। कोरोनावायरस की वजह से फूल मंडी पर बुरा असर पड़ा है कोरोनाकाल में फूलों की आपूर्ति से लेकर विक्रेताओं के सामने कई बड़ी समस्याएं खड़ी हो गई हैं। श्रेयस ब्लूम के प्रोपराइटर संजय सरावगी के मुताबिक, दिवाली के मौके पर सजावट के लिए मैं पिछले बीस सालों से सरकारी कार्यालय के लिए फूलों की आपूर्ति कर रहा हूं। यहां मैं प्रधानमंत्री कार्यालय, दिल्ली के एलजी हाउस, स्वास्थ्य मंत्रालय और विज्ञान भवन के लिए भी फूलों की सप्लाई करता आ रहा हूं। लेकिन इस साल कोविड-19 की वजह से फूलों की बिक्री पर बुरा असर पड़ा है।


फूल मंडी में वर्कर पूजा ने बताया, दिवाली के सीजन के करीब मंडी खचाखच भरी रहती थी लेकिन अब सब ठप हो गया, पिछले कुछ महीनों से फूलों की बिक्री पहली जैसी नहीं रही, मैं सुबह से शाम तक बस खाली ही बैठी रहती हूं। लॉकडाउन के बीच फूल की फसलों के नष्ट होने से भी इस बार फूल बाजारों में फूलों की वैरायटी भी कम है। फूल मंडी में वर्कर लंबू ने कहा कि लॉकडाउन से पहले फूलों की बिक्री धड़ल्ले से होती थी अब तो इक्का-दुक्का ग्राहक ही दुकान पर चढ़ता है।

फूलों की खेती भारत में एक लंबे अरसे से होती रही है, लेकिन आर्थिक रूप से लाभदायक एक व्यवसाय के रूप में पुष्पों का उत्पादन पिछले कुछ सालों से ही प्रारंभ हुआ है। समकालिक पुष्प जैसे गुलाब, कमल ग्लैडियोलस, रजनीगंधा, कार्नेशन आदि के बढ़ते उत्पादन के कारण गुलदस्ते और उपहारों के स्वरूप देने में इनका उपयोग काफी बढ़ा है। पुष्प को मनुष्य के द्वारा सजावट और औषधि के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसके अलावा घरों और कार्यालयों को सजाने में भी इनका उपयोग बहुतायत से होता है। मध्यम वर्ग के जीवनस्तर में सुधार और आर्थिक संपन्नता के कारण पुष्प बाजार के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और फूलों की खेती को एक विशाल बाजार का स्वरूप प्रदान कर दिया है।

भारत ने पुष्प उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत में कई कृषि जलवायु क्षेत्र है जो नाजुक और कोमल फूलों की खेती के लिए अनुकूल है। उदारीकरण के पश्चात के दशक के दौरान पुष्पकृषि ने निर्यात के क्षेत्र में विशाल कदम रखा है। इस युग में सतत उत्पादन के स्थान पर वाणिज्यिक उत्पादन के साथ गतिशील बदलाव देखा गया है। वर्ष 2012-13 के दौरान, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पुष्पकृषि डेटाबेस 2012 के अनुसार भारत में फूलों की खेती के लिए 232।74 हजार हेक्टयर क्षेत्र था जिसमें से शिथिल फूलों का उत्पाद 1।729 मिलियन टन हुआ तथा खुले फूलों का उत्पाद 76।73 मिलियन टन हुआ। कई राज्यों में फूलों की खेती व्यावसायिक रूप से की जा रही है और मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, झारखंड, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ते हुए पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, महाराष्ट्र राज्यों में फूलों की खेती की हिस्सेदारी बढ़ गई है। भारतीय फूल उद्योग में गुलाब, रजनीगंधा, ग्लेड्स, एंथुरियम, कार्नेशन, गेंदा आदि फूल शामिल है। फूलों की खेती अत्याधुनिक पाली और ग्रीनहाउस दोनों में की जाती है। भारत में वर्ष 2013-14 में फूलों का कुल निर्यात 455।90 करोड़ रुपए का रहा। प्रमुख आयातक देश संयुक्त राज्य अमेरिका, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, जापान और कनाडा थे। भारत में 300 से अधिक निर्यातोन्मुख इकाईयाँ है। फूलों की 50 फीसद से अधिक इकाईयाँ कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू में है। विदेशी कम्पनियों से तकनीकी सहयोग के साथ भारतीय पुष्पकृषि उद्योग विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की और अग्रसर है। वर्ष 2012-13 के दौरान लगभग 232.74 हजार हेक्टयेर क्षेत्र पुष्पकृषि के तहत किया गया। अनुमानित पुष्प उत्पादन वर्ष 2012-13 के दौरान 1.729 मिलियन टन खुले फूल और 76.73 मिलियन टन कट फ्लावर से हुआ।

पुष्पों की खेती का महत्व व्यावहारिक विविधीकरण की दृष्टि से पुष्पों की खेती का महत्व दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। यद्यपि पुष्पों को उगाने की कला भारत के लिए नई नहीं है तथापि, बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक स्तर पर इनकी खेती तथा पॉली हाउसों में इनकी संरक्षित खेती भारत में अपेक्षाकृत नई है। विपुल आनुवंशिक विविधता, विभिन्न प्रकार की कृषि जलवायु संबंधी परिस्थितियों बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न मानव संसाधन के कारण भारत में इस क्षेत्र में विविधीकरण के नए मार्ग प्रशस्त हैं जिनका अभी तक पर्याप्त रूप से दोहन नहीं हुआ है। विश्व व्यापार संगठन के युग में विश्व बाजार के खुल जाने के कारण पुष्पों तथा पुष्पोत्पादों का विश्व भर में स्वतंत्र रूप से आवागमन संभव है। इस संदर्भ में प्रत्येक देश को प्रत्येक देश की सीमा में व्यापार करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। विश्व स्तर पर 140 से अधिक देश पुष्पों की फसलों की खेती में लगे हुए हैं। विभिन्न देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका पुष्पों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। जहां प्रति वर्ष 10 बिलयन डॉलर से अधिक के पुष्पों की खपत होती है। इसके बाद उपभोग के मामले में जापान का स्थान है जहां प्रति वर्ष 7 बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य के पुष्पों की खपत होती है। भारत का भविष्य में बेहतर स्कोप है क्योंकि उष्णकटिबंधीय पुष्पों की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है और भारत जैसे देश द्वारा इसका लाभ उठाया जा सकता है क्योंकि हमारे यहां देशी वनस्पति जगत में उच्च स्तर की विविधता उपलब्ध है।

फूलों की लगभग सभी प्रजातियों की बुवाई सितंबर-अक्तूबर में की जाती है। गुलाब और गेंदा हर प्रकार की मिट्टी में लगाए जा सकते हैं, परंतु दोमट, बलुआर या मटियार भूमि ज्यादा उपयोगी है। गुलाब की खेती कलम लगा कर की जाती है। उन्नत किस्म के बीज पूसा इंस्टीटयूट या देश के किसी भी बड़े अनुसंधान केंद्र से प्राप्त किए जा सकते हैं। वैसे तो फूलों का कारोबार और पैदावार साल भर चलती है, पर जाड़ों में यह बढ़ जाती है। कीट भक्षी पक्षी और छोटे-छोटे कीड़े-मकौड़े फूलों के दुश्मन होते हैं। इनसे बचाव के पूरे इंतजाम होने चाहिए। समय-समय पर दवाओं का छिड़काव भी जरूरी है। सर्दियों में फूलों को बचाने के लिए क्यारियों पर हरे रंग की जाली लगानी चाहिए।




Next Story
epmty
epmty
Top