झूठे विज्ञापन करने वालों की अब खैर नहीं

लखनऊ। गुमराह करने वाले विज्ञापन देने वालों को 6 महीने की जेल या एक लाख का जुर्माना। अगर आप भी उपभोक्ता हैं और कोई अपने किसी प्रोडक्ट के बहाने आपसे ठगी करता है तो अब उसकी खैर नहीं। बेचने वालों को, गुमराह करने वाले विज्ञापन देने वालों को जेल की हवा खानी पड़ेगी। इसमें घटिया सामान बेचने वालों को 6 महीने की जेल या एक लाख का जुर्माना देना पड़ सकता है। अगर बड़े तौर पर नुकसान होता है तो ग्राहकों को 5 लाख तक मुआवजा देना पड़ सकता है और 7 साल की जेल हो सकती है। नए उपभोक्ता कानून के तहत अगर किसी उपभोक्ता की मौत हो जाए तो मुआवजे के तौर पर 10 लाख और 7 साल या आजीवन कारावास भी होने की संभावना है। देश में नए कानून के दायरे में ई-कॉमर्स कंपनियां भी शामिल की गई हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत अब ग्राहक किसी भी उपभोक्ता अदालत में शिकायत कर सकते हैं। अभी तक वहीं शिकायत की जा सकती थी, जहां सामान खरीदा गया हो। उपभोक्ता कानून में बदलाव के साथ उपभोक्ताओं को कई अधिकार दिए गए हैं, जिसमें ऐसी वस्तुओं की बिक्री और सेवाओं से बचाव होगा, जिससे जीवन या संपत्ति को नुकसान हो सकता है। इसके साथ ही उपभोक्ता को सामान की गुणवत्ता क्षमता मात्रा शुद्धता कीमत और मानक के बारे में विस्तृत जानकारी देनी होगी। उत्पादन में किसी भी तरह की शिकायत होने पर त्वरित कार्यवाही का प्रावधान होगा। वहीं उपभोक्ता द्वारा की गई शिकायत पर चयनित संस्था द्वारा गंभीरता से सुनवाई की जाएगी और उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाएगा।
विज्ञापन, विज्ञापन, विज्ञापन! जहां देखो वहां विज्ञापन, नजर उठी नहीं कि विज्ञापन पर पड़ी। टीवी हो, अखबार हो, पत्रिका हो या गली चैराहे पर लगे होर्डिंग्स हो। आज के दौर में पूरा जीवन चारों ओर से विज्ञापनों से ही घिरा हुआ है। आधुनिक युग में विज्ञापन बहुत मायने भी रखते हैं। व्यापारी से लेकर आम इंसान तक के लिए, लेकिन ऐसे में यह सवाल उठता है कि जीवन व समाज में इनकी सीमा अथवा औचित्य क्या और कितना हो? वर्तमान समय में विज्ञापनों की दुनिया इतनी बढ़ गयी है कि इसके फायदे कम और समाज पर इसका बुरा प्रभाव अधिक नजर आ रहा है। विज्ञापनों ने समाज को दिग्भ्रमित कर गलत वस्तुओं के प्रचार प्रसार से अपना खजाना तो भर लिया किन्तु सामान्य जनता की जेब खाली कर दी। इसने बिन बुलाए मेहमान की तरह अपना सबसे बड़ा शिकार स्त्रियों व बच्चों को बनाया। बच्चों के बचपन को तो छीना ही साथ ही कई मासूमों के जीवन को भी निगला। विज्ञापनों में जिस तरह महिलाओं की छवि दिखाई जाती है, उस पर तो लगातार सवाल उठते रहे हैं। करीब दर्जन भर विज्ञापन सेक्स, नग्नता आदि पर बनाये गए हैं, जिससे उनकी छवि तो खराब होती ही हैं। हमारे समाज की संस्कृति और नारी सम्मान का भी अपमान होता है।
मुंह में रजनीगंधा कदमो में दुनिया, किंगफिशर- द किंग ऑफ गुड टाइम्स, आठ दिनों में गोरापन, दो मिनट में नूडल तैयार, ठंडा मतलब कोका कोला, अपना लक पहन कर चलो, आठ दिनों में वजन कम करें, इसको लगा डाला तो लाइफ झिंगालाला, इस तरह की टैग-लाइंस यानी उपनाम वाली पंक्तियां मीडिया पर अक्सर आपने देखी सुनी या पढ़ीं होंगी, जो तरह-तरह की चीजों के विज्ञापनों में सेलिब्रिटीज यानी विभिन्न क्षेत्रों के मशहूर व्यक्तियों से बुलवाई जाती हैं। इस तरह के विज्ञापन लोगों को भ्रमित करते है और उन्हें प्रोडक्ट खरीदने के लिए प्रोत्साहित करते है। माना कि व्यापरियो को विज्ञापन और इश्तेहारों के जरिए खरीदारों को उकसाना पड़ता है, लेकिन वो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकते। ऊंची-ऊंची हांक कर, लोगो को रंगीन सपने दिखाकर बहलाना बाजारीकरण का प्रदर्शन है जिससे आम जनता नुकसान होता है।
बड़ी-बड़ी कम्पनियां किसी मशहूर सेलेब्रिटी को अपने प्रोडक्ट कैम्पेन प्रोजेक्ट के तहत साइन करती है और उसे प्रोडक्ट के प्रॉफिट में से एक से पच्चीस करोड़ रुपए तक देती हैं, जिसे वो विज्ञापन खर्च के रूप में अपनी वस्तु अथवा सेवा के मूल्य में जोड़ लेती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि वस्तुतः उपभोक्ता ही विज्ञापन में काम करने वाली मशहूर हस्तियों को अपनी जेब से रुपये देता है। सेलेब्रिटी जिस प्रोडक्ट का विज्ञापन करते हैं, उस प्रोडक्ट के लाभ में उनकी भी हिस्सेदारी होती है, इसलिए उसकी गुणवत्ता में भी उनकी जिम्मेदारी बनती है, जिससे वो बच नहीं सकते। विज्ञापन में भाग लेने वाली मशहूर हस्तियों की सबसे बड़ी गलती यही है कि जिन वस्तुओं और सेवाओं का वो स्वयं उपयोग नहीं करते हैं, उसका उपयोग जनता को करने की सलाह देते हैं और विज्ञापन में उत्पाद से संबंधित झूठे दावे कर गलत जानकारी भी लोगों को देते हैं। कुछ साल पहले मैगी के मामले में बिहार के मुजफ्फरपुर कोर्ट ने अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, प्रिटी जिंटा और नेस्ले कंपनी के अधिकारीयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए थे, जब मैगी में घातक रासायनिक पदार्थ पाये जाने का विवाद उठ खड़ा हुआ था। जनता चाहती है कि सेलिब्रिटीज जिस चीज का प्रचार करें, उसके स्वयं भी एक उपभोक्ता हों। विज्ञापन में सिलेब्रिटी ही नहीं एक उपभोक्ता भी बोले।
एक अच्छी बात है कि उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाने के लिए झूठा दावा करने वाले विज्ञापनों पर रोक को लेकर केंद्र सरकार नया कानून ले आई है अब ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये विज्ञापन कम्पनियां कितने झूठ और कितना सच हम उपभोक्ता तक परोसती हैं। नए कानून के तहत भ्रामक विज्ञापन करने पर सेलिब्रिटी पर भी 10 लाख तक जुर्माना लगेगा। इसके तहत सेलिब्रिटी का दायित्व होगा कि वह विज्ञापन में किए गए दावे की पड़ताल कर ले, खराब प्रोडक्ट या मिलावटी समांतर कंपनियों पर जुर्माना और मुआवजे का प्रावधान है। उपभोक्ता झूठी शिकायत करता है तो अब 50 हजार जुर्माना लगेगा। वहीं कानून को लेकर केंद्र सरकार केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण का गठन करेगी, जिसके अधिकारी अनदेखी करने वालों और भ्रमित करने वाले विज्ञापन पर नजर रखेंगे। इसके अलावा सीसीपीए की स्वतंत्र जांच एजेंसी का भी गठन किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी डायरेक्टर जनरल के हाथ में होगी।
ऐसे में जो बड़े-बड़े सेलेब्रिटी विज्ञापन करते हैं कि फलां तेल लगाने से गंजे के सिर पर बाल आ जाएंगे, बच्चे मानने लगते है कि अमुक दूध पीने से वह 'शक्तिमान' बन जाएंगे, युवतियां सोचती है कि कोई क्रीम लगाने से वह 'मिस इंडिया' बन जाएंगी। जिसके सिर पर बाल नहीं हैं और जिसका रंग गहरा है वो असफल है ये एक हकीकत है या एक पूर्वाग्रह है जो विज्ञापनों के जरिए हमारे दिमाग में डाल दिया गया है। हमने कुछ पहचान बनाई हैं जैसे राष्ट्रीयता, धर्म, जाति, त्वचा का रंग, लैंगिक पसंद- सभी पहचान हमें लोगों को 'जज' करने का कारण देती हैं। ये सारी पहचान (आइडेंटिटीज) वहां भी लगाई जाती हैं जहां इनकी कोई आवश्यकता नहीं होती। हम बस इनके साथ पैदा होते हैं। क्या हमारी पहचान हमारे विचारों और कर्मों से नहीं होनी चाहिए? भारत के मनोरंजन उद्योग में आकर्षक दिखने का मूल आधार है गोरा होना और आकर्षक होना, स्वीकार्य किए जाने की पहली कसौटी है। विज्ञापनों का उद्देश्य अपने उत्पाद को सही तरीके से विज्ञापित करना व उचित जानकारी पहुंचाना होना चाहिए न कि देश की संस्कृति और जनता को भ्रमित कर उन्हें हानि पहुंचाना।
(नाज़नींन-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)