चाय-अखबार बेचने वाले शख्स का संघर्ष से चमका सितारा- दोबारा बने डिप्टी CM
हिन्दूवादी नेता के रूप में संघर्ष करने वाले केशव प्रसाद मौर्य की किस्मत का सितारा साल 2016 में बुलन्द हुआ;
लखनऊ। हिन्दूवादी नेता के रूप में संघर्ष करने वाले केशव प्रसाद मौर्य की किस्मत का सितारा साल 2016 में बुलन्द हुआ, जब उनको तेजतर्रार छवि के कारण भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने यूपी मिशन का लक्ष्य देकर प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसके बाद साल 2017 में जब विधानसभा चुनाव का परिणाम आया तो केशव प्रसाद का कद और भी ऊंचा हुआ। यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में मिले जोरदार बहुमत का श्रेय केशव प्रसाद मौर्य को भी मिला। इसी कारण केशव प्रसाद मौर्य को उप मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें भारी भरकम जीत का इनाम दिया। वर्तमान में वो देश की सियासत के चार सदनों में से तीन सदनों का सफर कर चुके हैं। अब केवल उनसे संसद का उच्च सदन राज्यसभा ही अछूता रहा है। 2012 में वो यूपी विधानसभा के सदस्य बने, 2014 में लोकसभा पहुंचे और 2017 में यूपी विधान परिषद् में सदस्य निर्वाचित हुए। वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव के कार्यकाल के समाप्त होने के बाद भाजपा ने यूपी में वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में दोबारा जीत हासिल की। जीत हासिल के बाद बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को दोबारा उप-मुख्यमंत्री का दायित्व उनके हाथों में सौंप दिया। केशव प्रसाद मौर्य पहले ऐसे नेता है, जिन्होंने लगातार दूसरी बार उप-मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण की है।
केशव प्रसाद मौर्य भारत के उत्तर प्रदेश के दूसरी बार उप-मुख्यमंत्री हैं। वे सोलहवीं लोकसभा के लिए साल 2014 में इलाहाबाद की फूलपुर लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर वो सांसद निर्वाचित हुए थे। साल 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद 18 मार्च को उनको पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की और 19 मार्च 2017 को इन्होंने सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यूपी में नयी सियासी पारी शुरू करने पर केशव प्रसाद ने संसद की राह को छोड़कर विधान परिषद् में सीट पक्की की। 49 वर्षीय केशव प्रसाद मौर्य का जन्म कौशाम्बी जनपद के छोटे गांव सिराथू में एक किसान परिवार में हुआ। अपने माता पिता के साथ कृषि कार्यों में हाथ बंटाते हुए हुए इन्होंने चाय की दुकान भी चलायी और समाचार पत्र का विक्रय तक किया। केशव प्रसाद मौर्य का जन्म 7 मई सन 1969 में इलाहाबाद के कौशाम्बी जिले के एक छोटे से क्षेत्र सिराथू में एक किसान परिवार में हुआ था। कुशवाहा समाज से ताल्लुक रखने वाले इनके पिता का नाम श्याम लाल मौर्य और माता का नाम धनपति देवी मौर्य है। इनके पिता एक किसान थे। इनका बचपन बहुत कठिन था। अपने माता पिता के साथ कृषि कार्यों में हाथ बटाते हुए इन्होंने चाय की दुकान भी चलाई और समाचार पत्र का विक्रय तक किया। इनकी पत्नी का नाम राजकुमारी देवी मौर्य है, साल 1986 में राजकुमारी से केशव प्रसाद का विवाह सम्पन्न हुआ। केशव प्रसाद ने इलाहाबाद में हिन्दू साहित्य सम्मेलन से हिंदी साहित्य में स्नातक तक का अध्ययन किया।
केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश के अति पिछड़े समुदाय पर मजबूत पकड़ रखते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आने के बाद विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और भाजपा में करीब 18 साल तक प्रचारक रहे हैं। साथ ही श्रीराम जन्म भूमि और गोरक्षा व हिन्दू हित के लिए अनेकों आन्दोलन किये और इसके लिए जेल भी गये। 2014 में फूलपुर से भाजपा प्रत्याशी के रूप में 308308 वोटो से ऐतिहासिक जीत हासिल की। उन्हें फूलपुर सीट से सांसद के रूप में करीब 52 प्रतिशत वोट मिले थे। केशव प्रसाद मौर्य के प्रयासों से ही इलाहाबाद को स्मार्ट सिटी के लिए चयनित किया गया। उत्तर प्रदेश में सत्ता मिलने के बाद उप मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद केशव प्रसाद मौर्य ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। आजाद भारत के बाद भाजपा पहली बार फूलपुर संसदीय सीट से विजयी हुई थी। साल 2018 में फूलपुर सीट पर हुए उपचुनाव में सपा बसपा के महागठबंधन के कारण भाजपा इस सीट को बचा नहीं पाई और यहां सपा प्रत्याशी नागेन्द्र सिंह पटेल ने जीत हासिल की। सूत्रों के मुताबिक केशव प्रसाद मौर्य इस सीट पर पार्टी से अपनी पत्नी के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन सीट के समीकरण और उनकी चाहत को दरकिनार करते हुए शीर्ष हाईकमान ने नया प्रत्याशी मैदान में उतारा, जिसके कारण भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
केशव प्रसाद ने चुनाव लड़ने का सफर इलाहाबाद शहर पश्चिमी विधान सभा सीट से वर्ष 2002 में शुरु किया। उस समय बसपा के राजू पाल से चुनाव हार गये थे। 2007 में पुनः इसी सीट पर चुनाव लड़े और हार गये। 2012 में इन्होंने अपना क्षेत्र बदल दिया और सिराथू विधानसभा से अखिकार जीत हासिल कर यूपी विधानसभा का हिस्सा बने। इस पद पर 2 वर्ष रहने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में जब पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतरने की खास रणनीति बनायी तो केशव प्रसाद मौर्य ने मोदी लहर की सम्भवना देखते हुए फूलपूर सीट से संसदीय चुनाव में भाग्य आजमाया था। उनकी दूरदर्शिता सही साबित हुई और भाजपा को प्रचंड जनादेश मिला, वो विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर संसद के सफर पर निकल पड़े, लेकिन फिर भाग्य ने पलटा खाया। यूपी में मिशन 2017 का लक्ष्य हासिल करने को शीर्ष नेतृत्व को तेजतर्रार और कुशल रणनीतिकार चेहरे की तलाश थी, जो केशव प्रसाद मौर्य पर आकर खत्म हुई। दरअसल, केशव प्रसाद मौर्य की छबि दबंग नेता की है। ऐसे में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी के सरल स्वभाव को लेकर शीर्ष नेतृत्व मिशन 2017 के अपने अभियान में कहीं ना कहीं कुछ कमीं महसूस कर रहा था, इसी कारण 2016 में पार्टी में कद्दावर होने के साथ अपने दबंग व आक्रामक तेवर के लिए पहचाने जाने वाले केशव प्रसाद मौर्य के प्रति शीर्ष नेतृत्व आश्वस्त हुआ, यूपी भाजपा में नयी उर्जा का संचार करने और मिशन यूपी का लक्ष्य भेदने के लिए केशव को कप्तान बना दिया गया।
उत्तर प्रदेश में भाजपा का पांच साल का कार्यकाल पूर्ण होने के बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीत हासिल करते हुए 35 साल का रिकॉर्ड तोड़कर सुनहरे अक्षरों में इतिहास के पन्नों में कीर्तिमान स्थापित किया। यूपी में जीत हासिल करने के बाद बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को दोबारा डिप्टी सीएम बनाया।