मराठा आरक्षण पर उद्धव की जिद
जातिवादी राजनीति ने नेताओं को इस तरह से जकड़ लिया है कि वे पद की गरिमा को ही भूल जाते हैं।;
मुंबई। जातिवादी राजनीति ने नेताओं को इस तरह से जकड़ लिया है कि वे पद की गरिमा को ही भूल जाते हैं। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे भारत के पीएम हैं। क्या वे किसी खास जाति विशेष को प्राथमिकता दे सकते हैं? ऐसे करके वे क्या अपने पद की गरिमा को नहीं गिरा देंगे? इसीलिए पीएम मोदी ने सबका साथ सबका विकास, सबका विश्वास नारा दिया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पूरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं। महाराष्ट्र में रहने वाले क्या सिर्फ मराठा ही हैं? वहां यूपी, बिहार, गुजरात, राजस्थान आदि से लोग आकर बस गये हैं। मारवाड़ियों ने तो महाराष्ट्र को समृद्ध बनाया है, फिर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सिर्फ मराठों के हित की बात क्यों करते? मराठों को आरक्षण देने का उन्होंने कानून बनाया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 6 मई 2021 को खारिज कर दिया था। अब मुख्यमंत्री ठाकरे ने मराठों को आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) कोटा में मराठों को 10 फीसद आरक्षण देने का फैसला किया है। सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने इस प्रकार का आदेश जारी कर दिया है। गरीब क्या सिर्फ मराठे ही हैं?
महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण देने का फैसला किया है। राज्य सरकार की तरफ से जारी नए आदेश के मुताबिक, इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन यानि ;ईडब्ल्यूएस) में मराठा समुदाय शामिल हो गया है। इसके बाद कम्युनिटी में शामिल लोगों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण मिलेगा। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट ने मुंबई में यह आदेश जारी किया है। नए आदेश के तहत मराठा समुदाय के सदस्य ;ईडब्ल्यूएस) आरक्षण के तहत सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत के अंदर लाभ उठा सकेंगे। इसके तहत ईडब्ल्यूएस कोटा की शर्तों को पूरा करने वाला व्यक्ति, जो किसी अन्य आरक्षण वर्ग में शामिल नहीं है, उसे रिजर्वेशन का लाभ मिलेगा।
यह ईडब्ल्यूएस कोटा 9 सितंबर 2020 से लेकर इस साल 5 मई को आए सुप्रीम कोर्ट से फैसले के बीच समुदाय पर लागू होगा। वहीं, ईडब्ल्यूएस कोटा उन एसईबीसी उम्मीदवारों पर लागू होगा, जिनकी नियुक्तियां अंतरिम रोक के पहले से अटकी हुई थीं। फिलहाल, 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस कोटा समाज को उस वर्ग के लिए जारी है, जो किसी दूसरे तरह के आरक्षण में शामिल नहीं है। ईडब्ल्यूएस कोटा को लेकर केंद्रीय कानून को प्रभाव में आए 2 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इसके तहत सामान्य वर्ग में नौकरियों और शिक्षा के लिए गरीब वर्ग को आरक्षित किया जाता है। सरकार की तरफ से जारी आदेश के अनुसार, सोशली एंड इकोनॉमिकली बैकवर्ड क्लास घोषित किए गए मराठा समुदाय 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस कोटा का लाभ ले सकेगा। राज्य में मंत्री और एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा है कि राज्य सरकार ने ऐसे मराठा समुदाय की मदद करने का फैसला किया है, जो किसी अन्य आरक्षण वर्ग में शामिल नहीं हैं। अब तक इस आरक्षण को लेकर स्थिति साफ नहीं थी। मलिक ने कहा, 8 लाख रुपये सालाना आय से कम वाले समुदाय ईडब्ल्यूएस कोटा के लिए मान्य होंगे।
ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 6 मई को महाराष्ट्र में मराठा कोटा रद्द कर दिया और कहा कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसद से अधिक नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत पर तय करने के 1992 के मंडल फैसले को वृहद पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया। साथ ही अदालत ने सरकारी नौकरियों और दाखिले में मराठा समुदाय को आरक्षण देने संबंधी महाराष्ट्र के कानून को खारिज करते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमें इंदिरा साहनी के फैसले पर दोबारा विचार करने का कारण नहीं मिला। जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता में जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जस्टिस हेमंत गुप्ता और एस जस्टिस रवींद्र भट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मामले पर फैसला सुनाया था।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक मराठा समुदाय शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने साथ ही ये भी कहा कि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती। महाराष्ट्र ने आरक्षण की ये लक्ष्मण रेखा लांघ दी थी। पांच जजों की पीठ ने चार अलग-अलग फैसले दिये थे, लेकिन सभी ने माना कि मराठा समुदाय को आरक्षण नहीं दिया जा सकता। आरक्षण सिर्फ पिछड़े वर्ग को दिया जा सकता है। मराठा इस कैटेगरी में नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस गायकवाड कमिशन और हाईकोर्ट दोनों ने असाधारण स्थिति में आरक्षण दिए जाने की बात की है, लेकिन दोनों ने नहीं बताया कि मराठा आरक्षण में असाधारण स्थिति क्या है।
संविधान पीठ ने मामले में सुनवाई 15 मार्च को शुरू की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने जून 2019 में कानून को बरकरार रखते हुए कहा था कि 16 फीसदी आरक्षण उचित नहीं है और रोजगार में आरक्षण 12 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए और नामांकन में यह 13 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य में शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मराठाओं के लिए आरक्षण के फैसले को बरकरार रखा था। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि महाराष्ट्र के पास मराठाओं को आरक्षण देने की विधायी क्षमता है और इसका निर्णय संवैधानिक है, क्योंकि 102वां संशोधन किसी राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की सूची घोषित करने की शक्ति से वंचित नहीं करता।
वर्ष 2018 में लाए गए 102वें संविधान संशोधन कानून में अनुच्छेद 338 बी, जो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के ढांचे, दायित्वों और शक्तियों से संबंधित है तथा अनुच्छेद 342ए, जो किसी खास जाति को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा घोषित करने की राष्ट्रपति की शक्ति और सूची में बदलाव की संसद की शक्ति से संबंधित है, लाए गए थे। इसी साल 23 मार्च की सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया था कि एसईबीसी कानून 2018 के मद्देनजर महाराष्ट्र द्वारा राज्य में नौकरियों और दाखिलों में मराठा समुदाय के लोगों को आरक्षण देना संवैधानिक है। मेहता ने कहा था, 'केंद्र का मत है कि महाराष्ट्र एसईबीसी कानून संवैधानिक है।' उन्होंने कहा था कि केंद्र अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल के अभिवेदनों को स्वीकार करता है और इसे केंद्र सरकार का मत माना जाना चाहिए। इससे पहले अटॉर्नी जनरल ने 18 मार्च को शीर्ष अदालत से कहा था कि संविधान का 102वां संशोधन राज्य विधायिकाओं को एसईबीसी निर्धारित करने और उन्हें लाभ देने के लिए कानून लाने से वंचित नहीं करता। मेहता ने कहा था कि संशोधन के जरिए लाया गया अनुच्छेद 342 ए राज्यों को एसईबीसी घोषित करने की शक्ति से वंचित नहीं करता। सवाल यह कि सिर्फ मराठों पर यह मेहरबानी क्यों की जा रही है? (हिफी)