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महबूबा जी, तिरंगा तो हम सबकी शान है

महबूबा जी, तिरंगा तो हम सबकी शान है

श्रीनगर। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने गत 23 अक्टूबर को कहा था कि जब तक जम्मू-कश्मीर को लेकर पिछले साल पांच अगस्त को संविधान में किए गए बदलावों को वापस नहीं ले लिया जाता, तब तक उनको चुनाव लड़ने अथवा तिरंगा थामने में कोई दिलचस्पी नहीं है। महबूबा जी, तिरंगा तो हम सभी की शान है। कितने ही वलिदानों के बाद इसे फहराने का गौरव हासिल हुआ है। आपका विरोध भाजपा से हो सकता है। भाजपा के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार से हो सकता है, जिसने 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया । हालांकि कश्मीर में ही रह रहे दूसरे प्रांत के लोगों को यह देखकर मायूसी होती थी कि देश के अंदर ही कश्मीर में उन्हे पराया समझा जाता है। वे अपना घर नहीं बना सकते थे, अपना व्यापार नहीं कर सकते थे और वहां की सरकार बनाने में भी उनको वोट देने का अधिकार नहीं था। इनके साथ ही वे कश्मीरी बालाएं जिनको कोई गैर कश्मीरी भा जाता था और उसी के साथ वे घर बसाना चाहती थीं, उनको भी हक हकूक से महरूम कर दिया जाता था। इन सभी को 5 अगस्त 2019 के फैसले से राहत मिली थी। फिर भी महबूबा जी, अगर आपको विरोध की राजनीति करनी है तो सरकार को हटाने की बात करें। आपने तो सीधे-सीधे राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को न थामने की बात कह दी। इससे बहुत लोगों को तकलीफ पहुंची है।

जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को पिछले वर्ष अगस्त में समाप्त किए जाने के बाद से महबूबा हिरासत में थीं। रिहा होने के बाद पहली बार मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि वह तभी तिरंगा उठाएंगी, जब पूर्व राज्य का झंडा और संविधान बहाल किया जाएगा। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती के तिरंगा न थामने के बयान पर अब सियासी हमला तेज हो गया है। महबूबा मुफ्ती के खिलाफ जम्मू कश्मीर में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। मुफ्ती का विरोध करने के लिए 25 अक्टूबर को भी बड़ी संख्या में युवा पीडीपी दफ्तर पहुंच गए और उनके कार्यालय के ऊपर तिरंगा फरहाने की कोशिश की। हालांकि पुलिस ने उन्हें रोक दिया। सैकड़ों की संख्या में पहुंचे युवाओं ने महबूबा मुफ्ती के खिलाफ नारेबाजी की और वंदे मातरम का जयघोष किया। युवाओं ने जब पीडीपी दफ्तर पर तिरंगा फहराने की कोशिश की तो वहां पर काफी देर तक पीडीपी नेताओं और युवाओं के बीच बहस भी होती रही। युवाओं ने मीडिया से बातचीत में कहा कि हमारा किसी दक्षिणपंथी पार्टी से कोई संबंध नहीं है। हम मूल रूप से राष्ट्रवादी हैं और तिरंगे के लिए किसी भी अपमान को बर्दाश्त नहीं करेंगे। एक युवा ने पीडीपी कार्यालय के मुख्य द्वार के पास की चारदीवारी पर 24 अक्टूबर को राष्ट्रीय ध्वज फहराया था और इस दौरान उसकी पीडीपी के दो वरिष्ठ नेताओं के साथ बहस भी हुई थी। युवक ने कहा था कि वह कल फिर लौटेंगे और बड़ी संख्या में युवाओं के साथ पीडीपी कार्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे।

यह सच है कि जम्मू एवं कश्मीर का एक झंडा हुआ करता था। उस झंडे में लाल बैकग्रांउड है जिस पर हल और तीन खड़ी लाइनें बनी हैं। ये लाइनें कश्मीर, जम्मू और लद्दाख को दर्शाती हैं जिनका अपना इतिहास है और जो 1931 के बाद हुए राजनीतिक आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इसकी कहानी 13 जुलाई, 1931 से जुड़ी है जब डोगरा सरकार ने श्रीनगर की सेंट्रल जेल के पास एक जुलूस पर फायरिंग के आदेश दिए थे, जिसमें 21 लोग मारे गए थे। बताया जाता है कि इसके विरोध में किसी ने एक घायल व्यक्ति की खून में सनी हुई कमीज निकाली और भीड़ ने उसे जम्मू-कश्मीर के झंडे के तौर पर फहराया। इसके बाद 11 जुलाई 1939 को डोगरा शासकों के विरुद्ध आंदोलन कर रहे राजनीतिक दल जम्मू और कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस ने इसे अपने झंडे के तौर पर अपनाया। देश को आजादी मिली और कश्मीर रियासत का भारत में विलय हो गया।

इसके बाद 7 जून 1952 को जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए इसे राज्य का आधिकारिक झंडा बना दिया। हालांकि, ऐसा कहा जाता है कि झंडे को 1947 से 1952 तक जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज माना गया था।

इस कहानी को लोग लगभग भूल चुके थे। मोदी की सरकार ने जब 5अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया तब उस भूली हुई कहानी को लोग याद दिलाने लगे । केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने साफ शब्दों में कहा था कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करने वाले अनुच्छेद 370 को पिछले साल समाप्त कर दिया गया था, जिसे अब बहाल नहीं किया जाएगा।कानून मंत्री ने कहा कि इसे समाप्त करना देश के प्रति हमारी प्रतिबद्धता थी और लोगों ने इसकी प्रशंसा की। उन्होंने दावा किया था कि अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान समाप्त किये जाने से केंद्र शासित प्रदेश में विकास को बढ़ावा मिला है और समाज के कमजोर वर्ग जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं को वही अधिकार प्राप्त हो रहे हैं जो उन्हें देश के बाकी हिस्सों में मिलते हैं।

इस प्रकार एक सच्चाई ये भी है कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का झंडा भी समानांतर रूप से अस्तित्व में रहा है। इसे साल 2015 में बीजेपी सदस्य और पूर्व पुलिस अधिकारी फारुख खान ने जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी लेकिन पिछले कुछ समय से कोर्ट इस मसले पर शांत ही रहा है। फारुख खान बाद में लक्षद्वीप में प्रशासक के रूप में नियुक्त किए गए। फारुख खान ने ये याचिका मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार के उस सर्कुलर के बाद दायर की थी जिसमें उन्होंने सभी संवैधानिक इमारतों और सरकारी वाहनों पर जम्मू-कश्मीर के प्रांतीय झंडे को फहराने का आदेश दिया था और ये सर्कुलर तब जारी किया गया था जब अब्दुल कय्यूम खान नाम के एक शख्स ने झंडे के सम्मान के संबंध में अदालत के निर्देश मांगते हुए एक याचिका दायर की थी।

यह पीडीपी-बीजेपी सरकार के बीच पहली तकरार थी। बाद में सरकारी वेबसाइट से चुपचाप ये सर्कुलर हटा दिया गया लेकिन, ये मामला अदालत में तब पहुंचा जब बीजेपी और पीडीपी गठबंधन का एजेंडा नाम से एक समझौते के तहत जुड़ गए थे। यह एजेंडा अन्य बातों के अलावा ये भी कहता है कि राजनीतिक और संवैधानिक वास्तविकताओं पर विचार करते हुए जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को लेकर बीजेपी और पीडीपी की स्थितियों को मान्यता देते हुए और उनकी धारणाओं को सराहते हुए, भारतीय संविधान में विशेष दर्जे सहित जम्मू-कश्मीर से संबंधित सभी संवैधानिक प्रावधानों पर वर्तमान स्थिति बनी रहेगी।

अब नये हालात में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को भी विवादास्पद कहानी सुनाने की जिद नहीं करना चाहिए। वे सिर्फ यह जिद ही नहीं कर रही हैं बल्कि राष्ट्र ध्वज के प्रति तिरस्कार की भावना भी साफ साफ देखी जा सकती है। (अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

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