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कश्मीर की रोशनी में छिपे अंधेरे

कश्मीर की रोशनी में छिपे अंधेरे

जम्मू। आज से लगभग बीस साल पहले जम्मू कश्मीर में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हटाने और फिर ऐसे लोगों को रहने के लिए दूसरी जगह देने के लिए रोशनी एक्ट लाया गया था। साल 2001 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार ने यह कानून लागू किया। इस एक्ट के तहत लोगों को उस जमीन का मालिकाना हक देने की योजना बनी, जिस पर उन्होंने अवैध कब्जा कर रखा था। बदले में उन्हें एक छोटी सी रकम चुकानी थी। इस रकम का इस्तेमाल राज्य में बिजली का ढांचा सुधारने में किया जाना था, इसी से इस एक्ट का नाम रोशनी एक्ट रखा गया था। अफसोस की बात कि इस रोशनी एक्ट में बड़े-बड़े नेता ही अंधेरे भरने लगे। अंधेरे ऐसे बढे कि देश के साथ गद्दारी करने वाले और आतंकवादियों की मदद करने वाले जनप्रतिनिधि बनने की व्यवस्था भी कर चुके थे। राज्य का विशेष दर्जा छिनने के बाद वहां प्रशासन चैकन्ना हुआ है और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने ऐसे लोगों पर शिकंजा कसा। इसी का नतीजा है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 25 नवम्बर को जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद से संबंधित एक मामले के सिलसिले में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष वहीद उर रहमान पर्रा को दो दिन की पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया।

एनआईए पर्रा से दिल्ली मुख्यालय में दो दिन से पूछताछ कर रही थी। पर्रा ने हाल ही में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में आगामी जिला विकास परिषद चुनावों के लिए अपना नामांकन पत्र भी दाखिल किया है। पर्रा हाल में बने गुपकार गठबंधन में भी शामिल हैं।निलंबित डीएसपी देविंदर सिंह से भी पर्रा के संबंध रहे हैं। यहां पर सवाल फिर खड़ा होता है कि अपराध और आतंकवाद के आरोपियों को चुनाव लडने से रोकने का कानून क्यों नहीं बनाया जाता ? दक्षिणी कश्मीर खासकर आतंकवाद से प्रभावित पुलवामा में पीडीपी के पुनरुद्धार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पर्रा ने बताया था कि एनआईए ने उनसे उनके राजनीतिक करियर और पीडीपी की राजनीति के बारे में पूछा। पर्रा से पहले दिन एनआईए ने करीब सात घंटे तक पूछताछ की थी। पर्रा पर जम्मू कश्मीर के निलंबित डीएसपी देविंदर सिंह आतंकी मामले से जुड़े होने का भी आरोप है। इसके अलावा पर्रा पर हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर निबिड़ बाबू के साथ गिरफ्तार किए गए उनके मददगार इरफान मीर से रिश्ते रखने का भी आरोप है। एनआईए ने दूसरे दिन की पूछताछ में पर्रा से देविंदर सिंह मामले के आर्थिक पहलू के बारे में भी पूछताछ की।

ध्यान रहे कि इसी साल जुलाई में देविंदर सिंह को हिज्बुल मुजाहिदीन के दो आतंकियों के साथ श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर गिरफ्तार किया गया था। आतंकी नावेद बाबू को हथियार सप्लाई करने के आरोपी पूर्व भाजपा नेता तारिक मीर ने पूछताछ के दौरान पर्रा का नाम लिया था। जम्मू-कश्मीर पुलिस के निलंबित डीएसपी देविंदर सिंह ने कथित तौर पर संवेदनशील जानकारियों सहित कई बातें पाकिस्तान उच्चायोग में अपने संपर्क सूत्रों को बताई थीं। अधिकारियों ने बताया कि पाकिस्तानी उच्चायोग के संपर्क सूत्र उसे कुछ संवेदनशील जानकारी निकालने के लिए तैयार कर रहे थे। एनआईए अधिकारियों ने बताया, हालांकि सिंह की भूमिका की जांच के दौरान, राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उसके सुरक्षित सोशल मीडिया एकाउंट् का पासवर्ड खोज निकाला, जिसमें उसके पाकिस्तानी उच्चायोग के कुछ कर्मियों के साथ उसकी मिलीभगत की जानकारी मिलती है। इन कर्मियों को राष्ट्रीय राजधानी में जासूसी गतिविधियों में उनकी भूमिका पाये जाने के बाद वापस भेज दिया गया था। एनआईए ने 6 जुलाई को जम्मू जेल में बंद सिंह और पांच अन्य के खिलाफ पाकिस्तान के आतंकवादी समूहों विशेषकर हिजबुल मुजाहिदीन की मदद से कथित तौर पर भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के एक मामले में आरोप पत्र दायर किया था।अपनी गिरफ्तारी से पहले, सिंह की आखिरी पोस्टिंग रणनीतिक महत्व के श्रीनगर हवाई अड्डे की खास एंटी-हाईजैकिंग यूनिट में थी। इस वर्ष 11 जनवरी को उनकी गिरफ्तारी के तुरंत बाद, केंद्र ने एहतियाती तौर पर हवाई अड्डे की सुरक्षा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) को सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।

अब रोशनी एक्ट घोटाले की बात करें तो जम्मू-कश्मीर के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा घोटाला सामने आया है। जिस रोशनी कानून को सरकार ने गरीबों को सस्ती जमीन और राज्य में बिजली लाने के लिए बनाया, उसे कुछ पार्टियों के नेताओं ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। इस घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के चीफ फारूक अब्दुल्ला के बाद अब पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की चेयरपर्सन और पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती भी घिरती दिख रही हैं।

इस घोटाले की सीबीआई जांच कर रही है। अभी तक के जांच में कई बड़े खुलासे हुए हैं। एक अधिकारी के मुताबिक, पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी ने जम्मू के संजवान इलाके में अवैध ढंग से तीन कनाल सरकारी जमीन पर कब्जा कर पार्टी ऑफिस का निर्माण कराया। इसी ऑफिस के पहले फ्लोर पर विवादास्पद नेता राशिद खान ने अपना बसेरा बनाया है। यह भी पता चला है कि जिस समय जमीन पर कब्जा किया गया, उस वक्त मुफ्ती मोहम्मद सईद की अगुआई वाली पीडीपी की सरकार थी।

पीडीपी के नेता चैधरी तालिब हुसैन ने जम्मू डिविजन के चन्नी रामा इलाके में दो कनाल सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया है। अधिकारी के मुताबिक, उन्होंने तो रोशनी एक्ट का सहारा लेने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। सीध्से-सीधे जमीन पर कब्जा कर लिया। बता दें कि रेप के आरोपी तालिब हुसैन को महबूबा मुफ्ती ने बड़े धूमधाम से अप्रैल 2019 में पार्टी में शामिल कराया था। उन्हें तब महबूबा ने आदिवासी हितों का पैरोकार बताया था।बॉलीवुड में बीते जमाने के बड़े नाम फिरोज खान और संजय खान की बहन दिलशाद शेख ने भी सात कनाल जमीन पर श्रीनगर के इलाके में कब्जा जमाया। दिलशाद ने रोशनी एक्ट का फायदा लिया, लेकिन जमीन नियमित कराने की रकम नहीं जमा कराई। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता असलम मट्टू ने भी रोशनी एक्ट के सहारे एक कनाल सरकारी जमीन पर श्रीनगर में कब्जा किया, लेकिन इसके लिए कोई रकम नहीं अदा की। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद के परिवार के एक सदस्य ने भी रोशनी एक्ट का फायदा लिया। साल 2001 में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए 1990 को कट ऑफ वर्ष मान लिया गया था। मतलब जो लोग 1990 या उससे पहले से किसी जमीन पर काबिज हैं तो वह इस एक्ट के प्रावधानों के तहत जमीन का मालिकाना हक पाने के हकदार थे। शुरुआत में कुछ किसानों को इसका फायदा भी मिला, लेकिन ऐसा हर जमीन के मामले में नहीं किया गया। समय बदला और सरकारें बदलीं। जम्मू-कश्मीर में आने वाली हर सरकार ने अपने हिसाब से रोशनी एक्ट में बदलाव करके 1990 के इस कट ऑफ साल को बदलना शुरू कर दिया। इसका फायदा यह हुआ कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस एक्ट के दायरे में आते चले गए।

2011 में जम्मू-कश्मीर के रिटायर्ड प्रोफेसर एसके भल्ला ने एडवोकेट शेख शकील के जरिए इस मामले में जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में आरटीआई फाइल करवाई। उन्होंने इस याचिका में सरकारी और जंगली जमीन में बड़ी गड़बड़ी के आरोप लगाए। पूरे मामले का खुलासा 2014 में आई सीएजी यानी कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट में हुआ।

कैग ने 2007 से 2013 के बीच जमीन ट्रांसफर करने के मामले में गड़बड़ी की बात कही। कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार को जिस जमीन के बदले 25,000 करोड़ रुपये मिलने चाहिए थे, उसके बदले उसे सिर्फ 76 करोड़ रुपये ही मिले। फिलहाल मामला कोर्ट में है। सीबीआई मामले की जांच कर रही है। (हिफी)

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