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संविधान के साथ जीवित हैं केशवानंद

संविधान के साथ जीवित हैं केशवानंद

लखनऊ। देश ही नहीं विदेशों में भी कानून की बारीकियों को समझाते समय भारत के एक दीवानी मुकदमे का जिक्र किया जाता है। यह मामला था केरल राज्य सरकार बनाम केशवानंद भारती का। राज्य सरकार मंदिर की जमीन अधिग्रहीत करना चाहती थी लेकिन केशवानंद भारती ने इसका विरोध किया। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा जहां अदालत ने माना कि संविधान की मूल भावना को नहीं बदला जा सकता। इस प्रकार संविधान की प्रस्तावना को भी संविधान का अंग माना गया। इस प्रकार केशवानंद भारती को संविधान का रक्षक माना जाता था। गत 6 सितम्बर को केशवानंद भारती का निधन हो गया। वे संविधान के साथ उतने ही रचे बसे हैं जैसे बाबा साहब भीमराव आंबेडकर। केशवानंद भारती के निधन पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत राजनीतिकों, समाजसेवियों और संत समाज ने उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं।

दक्षिण भारत के राज्य केरल के कासरगोड़ में इडनीर नामक स्थान पर एक शैव मठ है। 1961 में केशवानंद भारती को इस मठ का प्रमुख बनाया गया था। उस समय उनकी उम्र महज 20 साल थी। इस मठ का इतिहास आदि शंकराचार्य से जुड़ा है। शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य की परंपरा में यह मठ स्थापित हुआ था। यह मठ तांत्रिक पद्धति का अनुसरण करने वाली स्मार्त भागवत परंपरा को मानता है। इसी मठ की हजारों बीघा जमीन राज्य सरकार हड़पना चाहती थी। मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट में गया था। केरल के महंत केशवानंद भारती की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से वर्ष 1973 का चर्चित संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत पर फैसला आया, जिसने संविधान में संशोधन को लेकर संसद के अधिकारों को न केवल सीमित किया बल्कि साथ-साथ न्यायपालिका को संविधान संशोधन की समीक्षा का अधिकार मिला। भारत के कानूनी इतिहास में आए ऐतिहासिक फैसले में भारती याचिकाकर्ता थे। गत 6 सितम्बर 2020 को उनकी मौत हो गई। वह वर्ष 1970 में केरल के कासरगोड स्थित इडनीर हिंदू मठ के वंशानुगत प्रमुख थे और केरल सरकार के दो भूमि सुधार कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन पर पाबंदी लगाई गई थी। भारती की याचिका पर 47 साल पहले 13 न्यायाधीशों की पीठ का 7-6 के बहुमत से दिया गया फैसला आज भी संविधान के मूल तत्व को संरक्षित रखने की दिशा में मील का पत्थर है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान सर्वोच्च है। संसद को इसमें संशोधन का अधिकार है लेकिन, संशोधन के जरिये संसद संविधान के आधारभूत ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती।

केशवानंद भारती ने केरल के भूमि सुधार कानून को चुनौती दी थी। उन्होंने केरल के भूमि सुधार कानून 1963 को संविधान की नौवीं सूची में शामिल किए जाने संबंधी 29वें संविधान संशोधन का मुद्दा उठाया था। इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए भी एक बार प्रयास हुआ। सुनवाई के लिए पीठ भी गठित हुई लेकिन, बाद में 1975 में पीठ खत्म कर दी गई और मामला बंद कर दिया गया। इस फैसले ने न्याय जगत में बेसिक स्ट्रक्चर यानी संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जो आज भी कायम है। सुप्रीम कोर्ट पहुंचने वाले संवैधानिक मामलों में आधे से ज्यादा को इसी आधार पर चुनौती दी जाती है कि इसमें मूल ढांचे का उल्लंघन है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का फैसला सुप्रीम कोर्ट के 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 24 अप्रैल, 1973 को सुनाया था। यह मुकदमा केशवानंद भारती ने दाखिल किया था। केशवानंद भारती की याचिका में गोलकनाथ फैसले में दी गई व्यवस्था का मुद्दा उठाया गया था। मौलिक अधिकारों के बारे में दिया गया गोलकनाथ का फैसला 11 न्यायाधीशों का था। इसलिए केशवानंद भारती की याचिका पर 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सुनवाई की। इस मामले में प्रख्यात कानूनविद नानी पालकीवाला सहित जानेमाने दिग्गज वकीलों ने बहस की थी। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-368 में संसद को संविधान संशोधन करने का अधिकार है। लेकिन, संशोधन के जरिये संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता। उस फैसले में कोर्ट ने संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर यानी मूल ढांचे का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। कोर्ट ने बेसिक स्ट्रक्चर किसे कहा जाएगा, इसे व्यापक तौर पर परिभाषित नहीं किया था।

हालांकि, संविधान की कुछ विशेषताओं को आधारभूत संरचना के रूप में बताया था। जैसे कि संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, संघवाद, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत, ध्सर्मनिरपेक्षता, संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य, संसदीय प्रणाली, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और कल्याणकारी राज्य। केशवानंद भारती केस में दी गई व्यवस्था के बारे में सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश ज्ञानसुधा मिश्रा कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक आवश्यकताओं को देखते हुए संसद को संविधान में संशोधन की सीमित शक्ति प्रदान की है।

केशवानंद भारती के निधन पर देश भर में शोक सभाएं हुईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा, हम पूज्य केशवानंद भारती जी को उनकी सामुदायिक सेवा और शोषितों को सशक्त करने के उनके प्रयासों के लिए हमेशा याद रखेंगे। उनका देश के संविधान और समृद्ध संस्कृति से गहरा लगाव था। वह पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। ओम शांति।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि एक महान दार्शनिक और द्रष्टा के रूप में स्वामी केशवानंद भारती जी का निधन राष्ट्र के लिए अपूर्णीय क्षति है। हमारी परंपरा और लोकाचार की रक्षा के लिए उनका योगदान समृद्ध और अविस्मरणीय है। उनको हमेशा भारतीय संस्कृति के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा। उनके अनुयायियों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना। इसी प्रकार उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने संत केशवानंद भारती के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें दार्शनिक, शास्त्रीय गायक और सांस्कृतिक प्रतीक का एक दुर्लभ मेल बताया। उन्होंने कहा कि संत को सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है जिसमें व्यवस्था दी गई है कि संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है। उप राष्ट्रपति ने कहा कि उनके निधन से हमने एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक नेता खो दिया है। उनका जीवन भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा।

इस मामले में कई चीजें पहली बार हुई थीं। इस मामले की सुनवाई अब तक की सबसे बड़ी पीठ (13 न्यायाधीशों की पीठ) में हुई और 68 दिनों तक सुनवाई हुई जो अब तक का रिकार्ड है। राममंदिर मामले की सुनवाई भी इससे कम दिन हुई। अदालत ने केशवानंद मामले पर 703 पन्नों का फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है, इसलिए यह संशोधित करने योग्य नहीं है। फैसले में कहा गया कि संविधान के हर प्रावधान में संशोधन किया जा सकता है लेकिन वह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि संविधान का आधार और ढांचा पूर्व की तरह ही रहे। न्यायमूर्ति खन्ना ने मूल ढांचे शब्द का इस्तेमाल अपने फैसले में किया और कहा कि न्यायपालिका को संविधान संशोधन की समीक्षा करने और मूल ढांचे के सिद्धांत के खिलाफ होने पर खारिज करने का अधिकार है। इस मुकदमे में 31 अक्टूबर 1972 को बहस शुरू हुई और 23 मार्च 1973 को समाप्त हुई। हालांकि, मामले में आया ऐतिहासिक फैसला महत्वपूर्ण है जिसने छह के मुकाबले सात के बहुमत से उस सिद्धांत को समाप्त कर दिया कि संसद को संविधान के हर हिस्से को संशोधित करने का अधिकार है। फैसले में कहा गया कि संविधान के हर प्रावधान में संशोधन किया जा सकता है लेकिन वह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि संविधान का आधार और ढांचा पूर्व की तरह ही रहे। संविधान को यह गरिमा केशवानंद भारती ने दिलायी थी।

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

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