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पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को झटका

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को झटका

लखनऊ। कांग्रेस ने 2014 के बाद से जिन राज्यों में अपनी स्थिति सुधारी थी, उनमें एक पश्चिम बंगाल भी था। पश्चिम बंगाल में सरकार चला रहीं ममता बनर्जी मूल रूप से कांग्रेसी ही हैं और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के नाम से पार्टी बना रखी है। इस प्रकार सामान्य रूप से लोग सत्ता के साथ जुड़ जाते हैं और कांग्रेस के साथ भी यही हुआ। उसके कार्यकर्ता ममता बनर्जी के साथ चले गये। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस तीसरे स्थान पर चली गयी थी क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद वहां लगभग ढाई दशक राज करने वाला वाममोर्चा दूसरे स्थान पर आ गया। इस बीच नरेन्द्र मोदी की लहर उत्तर और मध्य भारत होती हुई पूर्वी भारत तक पहुंच गयी और पश्चिम बंगाल में अब भाजपा ही तृणमूल कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वन्द्वी है। कांग्रेस के लिए सोमेन मित्रा ने अथक प्रयास करके उसे तीसरे स्थान पर ही बरकरार रखा और वाममोर्चा चौथे स्थान पर चला गया। कांग्रेस के लिए पश्चिम बंगाल में यह बड़ी उपलब्धि थी। सोमेन मित्रा के निधन से कांग्रेस वहां नेतृत्व विहीन हो गयी है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में झटका खाने वाली कांग्रेस के लिए यह बड़ा आघात है।

पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष सोेमेन मित्रा का 29 जुलाई की देर रात निधन हो गया। वे कई बीमारियों से ग्रस्त थे और कोलकाता के एक प्राइवेट अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। लोकसभा के पूर्व सदस्य और कांग्रेस के दिग्गज नेता सोमेन मित्रा का जन्म 31 दिसम्बर 1941 को हुआ था। इस प्रकार 78 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। इन दिनों कोरोना का संक्रमण बहुत तेजी से फैल रहा है। सोमेन मित्रा की कोरोना जांच भी हुई थी और उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई थी। उनके निधन से पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को अपूर्णीय क्षति हुई है।

सोमेन मित्रा बंगाल में कांग्रेस के प्रभावशाली नेता के साथ-साथ मंझे हुए राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर जाने जाते थे। अधीर रंजन चौधरी की जगह उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई थी, लेकिन दुनिया को ऐसे समय अलविदा कह गए जब बंगाल में कांग्रेस पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।

सोमेन मित्रा छात्र राजनीति से सियासत में आए और 1970 के दशक में अपनी जबरदस्त पहचान बनाई। वह 1972 में सियालदह विधानसभा सीट से विधायक बने थे और सात बार इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। उन्होंने 2008 में कांग्रेस पार्टी छोड़कर अपनी नई पार्टी बनाई, लेकिन एक साल के बाद 2009 में टीएमसी का दामन थाम लिया। मित्रा 2009 में टीएमसी से सांसद चुने गए, लेकिन 2014 में ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया और कांग्रेस में वापसी कर गए। कांग्रेस ने 2018 में बंगाल में पार्टी की कमान मित्रा को सौंपी।

सोमेन मित्रा का जन्म 31 दिसंबर 1941 को पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) के जेसोर जिले में हुआ था। वो अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। सोमेन मित्रा ने छात्र जीवन में सियासत में कदम रखा और पांच दशक तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में मजबूती के साथ बने रहे। मात्र 26 साल की उम्र में 1972 के चुनाव में वो विधायक चुने गए और 1977 को छोड़कर लगातार इस सीट से जीतते रहे।

सोमेन मित्रा को कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व का करीबी माना जाता था। वो तीन बार कांग्रेस के पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष रहे और 1996 में लेफ्ट के खिलाफ 82 सीटों को जिताने में सोमेन मित्रा की अहम भूमिका रही। ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाई और 1998 में चुनाव जीतने में सफल रही तो मित्रा ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, 2008 में मित्रा ने कांग्रेस छोड़कर प्रगतिशील इंदिरा कांग्रेस के नाम से अपने पार्टी बनाई थी।

मित्रा ने 2009 के लोकसभा चुनावों से पहले ममता बनर्जी की टीएमसी के साथ अपने संगठन का विलय कर दिया और लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। हालांकि, ममता के साथ मतभेद होने के बाद उन्होंने कांग्रेस में वापसी की। 2018 में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की कमान उन्हें सौंपी गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट के साथ गठबंधन का विरोध किया। इसके बाद कांग्रेस अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी।

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

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