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उत्तराखंड में पलायन चिंताजनक

उत्तराखंड में पलायन चिंताजनक

लखनऊ। आयोग की पहली रिपोर्ट के अनुसार 2011 में उत्तराखंड के 1034 गांव खाली थे जबकि साल 2018 तक 1734 गांव खाली हो चुके थे। राज्य में 405 गांव ऐसे थे, जहां 10 से भी कम लोग रहते हैं। प्रदेश के 3.5 लाख से अधिक घर वीरान पड़े हैं, जहां रहने वाला कोई नहीं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के गृह जनपद पौड़ी में ही अकेले 300 से अधिक गांव खाली थे। खाली पड़े गांवों को भूतिया गांव कहे जाने लगा है।

उत्तराखंड में कोरोना संक्रमण का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। इसी के साथ प्राकृतिक तबाही भी बढ गई है। बंगापानी तहसील के टांगा गांव में 20 जुलाई की सुबह आई आपदा के कई घंटे बीत जाने के बाद रेस्क्यू टीम केवल पांच लोगों के शव ही निकाल पाई थी। इस प्रकार की आपदाएं आती ही रहती हैं। प्राकृतिक आपदाओं ने भी लोगों में भय पैदा किया है। एक तरफ भारत और चीन के बीच लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी ) पर तनाव के हालात बने हुए हैं। इन सबके चलते उत्तराखंड से सटी चीन की सीमा के पास से पलायन की चिंताजनक स्थिति सामने आई है। उत्तराखंड में भारत और चीन करीब 350 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। यहां सीमा से सटे गांवों में आबादी लगातार कम हो रही थी और अब कई गांव खाली तक हो गए हैं। सीमांत गांवों में आबादी क्यों घट रही है, यह भारत के लिए चिंता का कारण है।

माइग्रेशन कमीशन के डेटा के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय सीमा से 5 हवाई किलोमीटर के दायरे में बसे कम से कम 16 गांव खाली हो चुके हैं। यहां कोई परिवार अब बाकी नहीं है। बॉर्डर सुरक्षा का यह मामला पिछले दिनों उस मीटिंग में भी उछला, जिसमें उत्तराखंड के सीमा और आईटीबीपी के चीफ शामिल थे। इस मीटिंग में बॉर्डर के नजदीकी गांवों में रिवर्स माइग्रेशन, सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी और बिजली की उपलब्धता को लेकर चर्चा हुई थी और मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट के तहत 10 करोड़ का फंड भी जारी किया था। इस पहाड़ी इलाके में जीवन यापन संबंधी कई समस्याएं हैं और यहां किसी तरह का इन्फ्रास्ट्रक्चर गांवों तक पहुंचा नहीं है। बाराहोती और माना पास चमोली जिले में हैं और यहां निति और माना घाटी में सीमा पर बसे ग्रामीणों को लगातार सड़क, ट्रांसपोर्ट और संचार सुविधाएं देने के वादे किए जा रहे हैं ताकि वो पलायन न करें। चमोली की डीएम स्वाति भदौरिया की रिपोर्ट्स कह रही हैं कि यहां भौगोलिक स्थितियां कठिन हैं इसलिए बसें नहीं चल सकतीं लेकिन छोटी गाड़ियों की व्यवस्था की जा रही है।

उत्तराखंड से लगी चीन की सीमाओं पर तैनात भारतीय सुरक्षा बलों के लिए ये ग्रामीण आबादी बेहद अहम रही है। जोशीमठ में भोटिया जनजाति के लोगों के हवाले से जो खबरें मिलती हैं, उनके अनुसार इस समुदाय के लोग अपने मवेशियों को चराने के लिए बाराहोती तक अर्थात करीब 100 किलोमीटर तक की यात्रा करते हैं और सीमा के किनारों तक जाते रहते हैं। ये लोग बताते हैं कि अक्सर चीनी आर्मी के सैनिक बाराहोती इलाके में पैट्रोलिंग करते दिखते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि चीनी सैनिक अक्सर उनके ठिकानों को तबाह कर उनका राशन बर्बाद कर देते हैं लेकिन भारतीय सुरक्षा बलों की मदद से उन्हें राशन आदि मुहैया हो पाता है। आईटीबीपी चाहती है कि बाराहोती में ग्रामीण लगातार जाते रहें ताकि इस इलाके में भारतीयों की मौजूदगी बनी रहे। सिर्फ ग्रामीण आबादी ही नहीं, ये गड़रिये असल में भारतीय सेना के लिए स्थानीय इंटेलिजेंस का काम भी करते हैं। ये गड़रिये बताते हैं कि 1962 के युद्ध से पहले भारत की इन सीमाओं के ग्रामीण चीनी सीमा के जरिये तिब्बतियों के साथ व्यापार किया करते थे। यहां से गुड़ और चावल बेचा जाता था और बदले में तिब्बतियों से घी और ऊन खरीद ली जाती थी लेकिन 62 के युद्ध के बाद ये सिलसिला खत्म हो गया। इसका असर ये हुआ कि यहां की आबादी पारंपरिक पेशे से अलग हो गई। अब यहां के लोग सरकारी नौकरियां चाहते हैं और मैदानी इलाकों में रहना चाहते हैं क्योंकि यहां जीना वैसे भी कठिन है और सुविधाओं के नाम पर न मोबाइल नेटवर्क है और न ही बिजली। सिर्फ खेती किसानी ही यहां जीने का सहारा है, जिसके भरोसे कई लोग लंबे समय तक जी नहीं सकते। सरकारी स्तर पर इस आबादी का पलायन रोकने के लिए मोबाइल टावर लगवाने और बुनाई की मशीनें देने जैसी कोशिशें हो रही हैं, लेकिन यहां लगातार आबादी का घटते जाना भारतीय सेना के लिए चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि चीनी मूवमेंट और रणनीति के लिहाज से ये ग्रामीण सेना के लिए बेहद जरूरी रहे हैं। ऐसे में, चीन अपनी विस्तारवादी सोच के चलते यहां भी सीमाएं हथियाने की कोई चाल न चल दे, चिंता इसलिए भी जरूरी है।

विकट भौगोलिक संरचना वाले उत्तराखंड में पलायन बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। जब से उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया है, तब से निरंतर पलायन बढ़ता ही जा रहा है। पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के हजारों गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, वहीं 400 से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां 10 से भी कम नागरिक हैं। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा था कि प्रदेश सरकार पलायन रोकने के लिए हर संभव उपाय करेगी, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि सरकार ने इसके लिए हमारी सरकार द्वारा शुरू की गई अधिकतर योजनाएं बंद कर दीं।

पलायन आयोग की ओर से मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार अकेले अल्मोड़ा जिले में ही 70 हजार लोगों ने पलायन किया है। सूबे की 646 पंचायतों के 16207 लोग स्थाई रूप से अपना गांव छोड़ चुके हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट में 73 फीसदी परिवारों की मासिक आय 5000 रुपये से कम बताई गई है। आयोग ने मूलभूत सुविधाओं के अभाव को पलायन की मुख्य वजह बताया है। अब इसमें कोरोना महामारी और चीन से तनाव के कारण भी जुड गये हैं। ध्यान रहे कि 17 सितंबर 2017 में पलायन आयोग का गठन किया गया था और आयोग ने साल 2018 में सरकार को अपनी पहली रिपोर्ट सौंपी थी। आयोग की पहली रिपोर्ट के अनुसार 2011 में उत्तराखंड के 1034 गांव खाली थे जबकि साल 2018 तक 1734 गांव खाली हो चुके थे। राज्य में 405 गांव ऐसे थे, जहां 10 से भी कम लोग रहते हैं। प्रदेश के 3.5 लाख से अधिक घर वीरान पड़े हैं, जहां रहने वाला कोई नहीं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के गृह जनपद पौड़ी में ही अकेले 300 से अधिक गांव खाली थे। खाली पड़े गांवों को भूतिया गांव कहे जाने लगा है। आयोग के अनुसार पलायन के मामले में इस बार भी पौड़ी और अल्मोड़ा जिले शीर्ष पर रहे हैं।

पलायन करने वालों में 42.2 फीसदी 26 से 35 उम्र वर्ग के युवा हैं। पलायन आयोग के अध्यक्ष एसएस नेगी ने कहा था कि रोजगार के साधनों का अभाव युवाओं के पलायन का मुख्य कारण है। रोजगार के नाम पर पहाड़ों पर कुछ भी नहीं है, जिसके कारण युवा रोजी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों का रुख करने को विवश हो रहे हैं।

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

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