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शिक्षा में गुजरात का ग्रेड: फेल

शिक्षा में गुजरात का ग्रेड: फेल

गुजरात में शिक्षा की हालत का विश्लेषण किया गया, जिसके परिणाम बेहद भयावह हैं। भाजपा सरकार की घोर लापरवाही और उपेक्षा के कारण गुजरात साक्षरता दर में 18वें स्थान पर आ गया। शिक्षा के सभी मानकों पर गुजरात भाजपा सरकार में कमजोर साबित हुआ है। महिला साक्षरता में यह दूसरे राज्यों के मुकाबले 20वें स्थान पर है और यहां शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने में कमी की गयी है। शिक्षा को प्राथमिकता ने देने की भाजपा की नीति के चलते शिक्षा बजट को 4.57 प्रतिशत (यूपीए के अंतिम साल में) से घटाकर 3.65 प्रतिशत (2016-17 में भाजपा के कार्यकाल) कर दिया गया। यह अनुसंधान चौंकाने वाला है और भाजपा के खराब रिकॉर्ड को दर्शाता है।
गुजरात में भाजपा के तथाकथित 'विकास' के बावजूद साक्षरता दर में यह राज्य 18वें स्थान पर है। 2005 और 2015 के बीच, सरकारी स्कूलों में वृद्धि राष्ट्रीय औसत से लगभग 72 प्रतिशत कम रहे। ऐसे खराब प्रदर्शन को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने का कोई मतलब नहीं है। इसके विपरीत, यूपीए के तहत राज्य कहीं इससे आगे थे। कांग्रेस के नेतृत्व वाले असम, हरियाणा और महाराष्ट्र ने गुजरात के मुकाबले कई गुना अधिक नये स्कूल खोले। गुजरात में न सिर्फ नए स्कूलों का निर्माण नहीं हुआ बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी मानकों के अनुसार नहीं है। शिक्षा रिपोर्ट (एएसईआर) की पिछली वार्षिक स्थिति में खास तौर पर बताया गया है कि कक्षा 8 के लगभग दो-तिहाई स्कूली बच्चों को सरल विभाजन या मूल अंग्रेजी पाठ नहीं आता। नीचे की कक्षाओं के बच्चों के आंकड़े तो और भी चिंताजनक हैं, कक्षा 7 के लगभग आधे छात्र अपनी मातृभाषा में भी ठीक से पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। यहां तक कि प्राथमिक क्षेत्र में शिक्षा को मजबूत करने के लिए भाजपा की बहुत प्रशंसित योजना 'गुणोत्सव' भी त्रासदी ही साबित हुई है। 2013 के एएसईआर सर्वेक्षण में पाया गया कि गुजरात ने 2014 के बाद से शिक्षा में कोई प्रगति नहीं की है और सभी प्रमुख सूचकांकों में पिछड़ा ही रहा है।
शिक्षा के मामले में लड़कियों के लिए लगभग न के बराबर अवसर हैं। महिला साक्षरता में गुजरात अन्य राज्यों के मुकाबले 20वें स्थान पर है। राज्य में 15-16 आयु वर्ग की लगभग एक-चौथाई लड़कियां किसी भी स्कूल में दाखिला नहीं लेतीं जबकि हिमाचल प्रदेश में दाखिले का प्रतिशत 97 है। शिक्षा के अधिकार प्रावधानों को भी घटिया तरीके से लागू किया गया है। भाजपा सरकार ने इसे लागू करने में तीन साल बर्बाद कर दिये। इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने अपनी खबर में कहा है कि जून 2017 तक, 15800 छात्र अभी भी नामांकन का इंतजार कर रहे हैं। भाजपा ने परिणामों की परवाह किये बिना ही पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन बनाकर प्रक्रिया को ही जटिल बना दिया। वेबसाइट का सही ढंग से परीक्षण नहीं किया गया, लोगों को पहले से जानकारी नहीं दी गयी और इसके परिणामस्वरूप फैले भ्रम और अव्यवस्था को संभाला नहीं जा सका। चूंकि भाजपा को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी प्रतिमा पर करीब 3,000 करोड़ खर्च करना है तो उसने गुजरात के शिक्षा बजट पर कैंची चलाने में एक पल की भी देरी नहीं की, जो पहले ही अपने कुल खर्च का सिर्फ 13.7 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले राज्यों में असम 21 प्रतिशत और महाराष्ट्र लगभग 19 प्रतिशत खर्च करता था।
भाजपा के उलट असम, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकारों ने काफी बेहतर प्रदर्शन किया था। इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हिमाचल प्रदेश पूरे देश में बुनियादी अध्ययन और गणित सीखने में पहला स्थान हासिल किया है। हिमाचल प्रदेश में 6-14 वर्ष आयु वर्ग के शत प्रतिशत छात्रों ने स्कूल में दाखिला लिया है। भाषा, गणित और अंग्रेजी में स्कूलों की उपलब्धि स्तर राष्ट्रीय औसत से अधिक थी।
उपरोक्त तथ्य गुजरात के 'विकास' मॉडल का स्पष्ट विरोधाभास हैं। जहां गुजरात भाजपा के शासनकाल में लड़खड़ा गया वहीं कांग्रेस शासित राज्य सरकारों ने महत्वपूर्ण प्रगति की। इसलिए भाजपा के दावे खोखले साबित हुए। वास्तव में भाजपा ने गुजरात में शिक्षा की हालत खराब कर दी है।

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