नफरत की दीवार गिराने में कामयाब रही तारीख 9 नवम्बर

नफरत की दीवार गिराने में कामयाब रही तारीख 9 नवम्बर

एक तारीख जो कुछ फैसलों के कारण हकीकत में बड़ी तारीख बनकर रह जाती है। ऐसी ही एक तारीख 9 नवम्बर आज सदा सदा के लिए एक तारीख बन गयी है। यह तारीख हमेशा ही नफरत की दीवार को गिराने की हकीकत लेकर सामने आयी है। आज अयोध्या का सदियों पुराना मुकदमा आपसी सद्भाव और भाईचारे की मिसाल बनकर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के साथ निपटा तो 9 नवम्बर की यह तारीख आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सबक और चैप्टर बनकर दर्ज हो गयी है। ना जाने कितनी सदी तक इस तारीख का जिक्र नये नये किस्सों के रूप में भावी पीढ़ियों के समाने आयेगा। यह तारीख हिन्दुस्तान की उस गंगा जमुनी तहजीब की भी गवाह बनी है, जबकि राम की नगरी अयोध्या में कल कल बहती सरयू नदी राम आरती और घंटे घडियाल की गूंज के बीच अजान के सुरों पर इठलाती नजर आयेगी। आज मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के इस शहर के आंचल में राम मन्दिर के साथ ही मस्जिद को भी संभाला गया है। हिन्दुस्तान के संविधान की यही खूबसूरती है, जो उसको दुनिया में अलग बनाती है। 9 नवम्बर भारतीय इतिहास के लिहाज से अयोध्या केस के निपटारे के साथ ही भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक दोस्ताना माहौल में खुले करतापुर काॅरीडोर के लिए भी याद रहेगा।






सिख धर्म के पथ प्रदर्शक गुरू नानक देव जी महाराज के 550वें प्रकाश पर्व पर भारत और पाकिस्तान के बीच नफरत की दीवार गिरी और दुनिया को इंसानियत का पैगाम देने वाले गुरू नानक देव के आखिरी जीवन काल का गवाह रहे दरबार साहिब करतापुर के दर्शन के लिए एक नया रास्ता खुला। सीमाओं के बंधन में बंधे भारत और पाकिस्तान के बीच करतापुर काॅरीडोर बर्लिन की दीवार गिरने जैसा ही ऐतिहासिक पल बनकर सामने आया है।






9 नवम्बर 2019 के दिन जहां अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण के साथ ही मस्जिद के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ और देश भाईचारे की लहर में झूमता नजर आया, तो वहीं भारत और पाकिस्तान के बीच खुले नए कॉरिडोर से होकर पहले भारतीय सिख श्रद्धालुओं का जत्था करतारपुर पहुंच गया। यह कॉरिडोर भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर प्रकरण को लेकर बने तनाव के बावजूद भी सहयोग की एक अनोखी मिसाल बनकर सामने आया है। इस कदम के सहारे बने दोस्ताना माहौल में भारतीय सिख श्रद्धालु पाकिस्तान में पड़ने वाले अपने सबसे पवित्र स्थलों में से एक गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर की यात्रा कर सकेंगे। बंटवारे के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच तल्ख रिश्तों के कारण सिख श्रद्धालुओं को करतारपुर गुरुद्वारे के दर्शन के लिए बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। इसीलिए सिख समुदाय की लंबे समय से मांग थी कि सड़क मार्ग के जरिए भारतीय पंजाब में स्थित डेरा बाबा नानक साहब को पाकिस्तान में पड़ने वाले दरबार साहिब से जोड़ा जाए और यात्रा को आसान बनाया जाए। भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के महीनों में जिस तरह के कड़वे संबंध रहे हैं, उसे देखते हुए करतारपुर कॉरिडोर का खुलना बहुत बड़ी बात है। खास कर, जब भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील किया, उसके बाद से तनाव एक नए स्तर पर चला गया। करतारपुर गुरुद्वारे की स्थापना खुद सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक ने की थी, जो भारत-पाकिस्तान सीमा से सिर्फ चार किलोमीटर दूर है। उनकी जिंदगी के आखिरी साल इसी जगह पर गुजरे। लेकिन जब 1947 में देश का बंटवारा हुआ तो करतारपुर पाकिस्तान में चला गया।


पीएम नरेन्द्र मोदी ने की इमरान खान की सराहना

सीमा पर भारत की तरफ होने वाले उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया। उन्होंने भारतीय श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की सराहना की। यह पहला अवसर है, जबकि पीएम नरेन्द्र मोदी ने किसी भी सार्वजनिक मंच से पडौसी देश पाकिस्तान के किसी शासक की इस तरह खुले मन से प्रशंसा की। पाकिस्तान हमेशा ही भारतीय राजनीति में एक मुद्दा बना रहा है। ऐसा ही दोस्ताना माहौल उधर पाकिस्तान में भी नजर आया। इस मौके पर ऐसा ही एक भव्य कार्यक्रम पाक सीमा पर हुआ, जिसमें भारत की तरफ से आने वाले सिख श्रद्धालुओं का स्वागत किया गया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भारत और पाकिस्तान के बीच करतारपुर कॉरिडोर खुलने को बर्लिन की दीवार गिरने से जोड़ा। यह संयोग है कि जिस दिन करतारपुर कॉरिडोर को खोला गया है, उसी दिन बर्लिन दीवार गिरने की 30वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा कि यह उसी तरह दक्षिण एशिया को बदल सकता है जिस तरह 1989 की घटनाओं ने यूरोप को बदला था। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस 9 नवम्बर को ऐतिहासिक तारीख बताते हुए कहा कि यह तारीख दुनिया में नफरत की दीवारों को गिराने की साक्षी बनी रही है। बर्लिन की दीवार को तोड़ने के साथ ही आज भारत और पाकिस्तान के बीच करतारपुर काॅरीडोर खुलना और अयोध्या के विवाद का निपटारा होना भी इसी तारीख के हिस्से आया है। यह सुखद है और सराहनीय भी।





कम है नफरत की उम्र, क्योंकि हर दीवार गिरती है


हिन्दुस्तान में आज सामाजिक नफरत को मिटाकर दो आपसी सद्भाव और विश्वास के बीच दो नये रास्ते उसी प्रकार से खुले हैं, जिस प्रकार 3 दशक पूर्व जर्मनी में लोगों ने नफरत की प्रतीक दीवार को गिराकर बन्द रास्तों को खोला, उसी प्रकार हिन्दुस्तान में करतापुर काॅरीडोर और अयोध्या प्रकरण का पटाक्षेप होना भी नये भारत को जन्म देने वाला इतिहास रचने में सहायक हो रहा है। बर्लिन की दीवार पश्चिमी बर्लिन और जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य के बीच एक अवरोध थी जिसने 28 साल तक बर्लिन शहर को पूर्वी और पश्चिमी टुकड़ों में विभाजित करके रखा। इसका निर्माण 13 अगस्त 1961 को शुरु हुआ और 9 नवम्बर, 1989 के बाद के सप्ताहों में इसे तोड़ दिया गया। बर्लिन की दीवार अन्दरुनी जर्मन सीमा का सबसे प्रमुख भाग थी और शीत युद्ध का प्रमुख प्रतीक थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब जर्मनी का विभाजन हो गया, तो सैंकड़ों कारीगर और व्यवसायी प्रतिदिन पूर्वी बर्लिन को छोड़कर पश्चिमी बर्लिन जाने लगे। बहुत से लोग राजनैतिक कारणों से भी समाजवादी पूर्वी जर्मनी को छोड़कर पूँजीवादी पश्चिमी जर्मनी जाने लगे। इससे पूर्वी जर्मनी को आर्थिक और राजनैतिक रूप से बहुत हानि होने लगी। बर्लिन दीवार का उद्देश्य इसी प्रवासन को रोकना था। इस दीवार के विचार की कल्पना वाल्टर उल्ब्रिखत के प्रशासन ने की और सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने इसे मंजूरी दी। बर्लिन की दीवार बनने से यह प्रवास बहुत कम हो गया। इस दीवार का बनना समाजवादी गुट के प्रचार तंत्र के लिए बहुत बुरा साबित हुआ। पश्चिम के लोगों के लिए यह समाजवादी अत्याचार का प्रतीक बन गई। दीवार पार करते लोगों को गोली मार दी जाती थी। 1980 के दशक में सोवियत आधिपत्य के पतन होने से पूर्वी जर्मनी में राजनैतिक उदारीकरण शुरू हुआ और सीमा नियमों को ढीला किया गया। पूर्वी और पश्चिमा बर्लिन दोनों ओर से लोगों के बड़े बड़े समूह बर्लिन की दीवार को पारकर एक-दूसरे से मिले और लोग धीरे-धीरे दीवार के टुकड़े तोड़कर यादगार के लिए ले गए। बाद में बड़े उपकरणों का प्रयोग करके इसे ढहा दिया गया। बर्लिन दीवार के गिरने से पूरे जर्मनी में राष्ट्रवाद का उदय हुआ। 3 अक्टूबर 1990 को जर्मनी फिर से एक हो गया।

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