अमन का पैग़ाम है ईद-उल-अजहा

अमन का पैग़ाम है ईद-उल-अजहा

दीन इस्लाम में दो बडे त्योहार होते हैं, ईद-अल-फितर और ईद-उल-अजहा. ईद-अल-फितर मुकद्दस रमजान महीने के खत्म होने के बाद आता है. इसमें भी दो रकात की नमाज पढी जाती है और मुसलमान यह दूआ करते हैं कि जिस तरह रोजे के दिनों में वो खुदा के अहकाम पर कायम रहे वैसे ही वो हमेशा कायम रहेंगे. कल ईद-उल-अजहा का त्योहार है ।


ईद-उल-अजहा का मतलब होता है कुर्बानी की ईद. 'कुर्बानी' का मतलब सिर्फ जानवर जिबह करना नहीं है, बल्कि इससे मुराद वही है जिसे अंग्रेजी में 'डेडिकेशन' यानी समर्पण कहा जाता है. यही ईद-उल-अजहा का (स्पिरिट) मूल भाव है।


यह ईद-उल-अजहा उन्हीं तारीखों मे मनाई जाती है गोया कि हमारे लिए इबादत के ऐतबार से 'छोटा हज' है. हर साल रमजान के बाद एक महीना छोड़कर दूसरे महीने में मक्का में जो हज किया जाता है, उसमें कई मरासिम अकादियतें हैं. जैसे काबा का तवाफ (परिक्रमा) करना, सफा-मरवा के बीच में चलना, अराफात के मैदान में चलना, शैतान को कंकड़ियां मारना,वगैरह-वगैरह ।


लेकिन ईद-उल-अजहा में सिर्फ दो काम किये जाते हैं. पहला, सुबह के वक्त मस्जिद में या ईदगाह में दो रकात नमाज पढ़ना और दूसरा, जानवर की कुर्बानी करना. सबसे पहले ईद-उल-अजहा के मुतल्लिक वो सारी बातें रखना निहायत ही जरूरी है, इसके बाद एक त्योहार के रूप में इसके सामाजिक सरोकारों की बातें रखी जायेंगी।


सुबह की दो रकात नमाज के बाद ईमाम (नमाज पढ़ानेवाला) 'खुत्बा' पढ़ता है. 'खुत्बा' में वही बातें बतायी जाती हैं, जो हक के ऐतबार से तअल्लुक रखती हैं।


इस तरह हर जगह के लोग ईद-उल-अजहा के मौके पर हक की इबादत को याद करते हैं और हर जगह के लोग उसी मूल भावना को अपनाने का निर्णय लेते हैं, जो मक्का में हाजी लोग लेते हैं. हज के दौरान मक्का में हाजी लोग सबसे पहले बिना सिला कपड़ा पहनते हैं, जिसे 'एहराम-सादगी का लिबास' कहा जाता है।


यह एहराम सादा जिंदगी की अलामत है. गोया कि तमाम हाजी अलामती तौर पर यह निर्णय लेते हैं कि वो हमेशा सादा जिंदगी गुजारेंगे. इसी तरह हाजी मक्का पहुंच कर खानेकाबा का 'तवाफ' करते हैं, जो इस बात की अलामत है कि अपनी जिंदगी में वो खुदा को सेंटर बनायेगा और उसके गिर्द जिंदगी गुजारेगा. फिर हाजी सफा-मरवा दो पहाड़ियों दरमियां तेज-तेज चलता है, जो इस बात की अलामत है कि वह खुदा के दीन के लिए दौड़धूप करेगा. फिर हाजी शैतान को कंकड़ मारता है।


यह कंकड़ (स्पिरिचुअल स्टोन) होता है, जो इस बात की अलामत है कि वह अपने अंदर से शैतानियत जैसे कामो को निकाल फेंकेगा और शैतान के बहकावे में नहीं आयेगा. दुनिया में कोई ऐसा बुरा काम नहीं करेगा, जिससे इसलाम और इंसानियत को शर्मिंदा होना पडे. यानी हर तरह की बुराई से लड़ने का जज्बा पैदा करना ही इस कंकड़ी मारने का अकीदी ऐतबार है. फिर तमाम हाजी अराफात के मैदान मे इकट्ठा होते हैं और 'लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक- ऐ अल्लाह मैं हाजिर हूं' कहते हैं।


यह उस वक्त का मंजर है, जब तमाम इंसान मरने के बाद खुदा के सामने 'मैदाने हश्र' (प्रलय के बाद इंसानों के इकट्ठा होने की जगह) में हाजिर होंगे, जहां खुदा हर एक इंसान का हिसाब-व-किताब करेगा और उनके आमाल के हिसाब से उन्हें जन्नत या जहन्नम में भेजेगा. यह तमाम बातें हर जगह के मुसलमान ईद-उल-अजहा के दिन याद करते हैं. वो यादों के माध्य्म से हर मकाम पर वही मूल भावना पैदा करने की कोशिश करते हैं, जो हज में जानेवाले यात्री मक्का में करते हैं।
ईद-उल-अजहा की नमाज के बाद जानवर की कुर्बानी की जाती है. यह कुर्बानी अलामती होती है, जिसके तहत मुसलमानों को यह निर्णय करना होता है कि वो हर कीमत पर हक के रास्ते पर चलेंगे. वो अपने आप को खुदा के काम के लिए वक्फ करेंगे. कुर्बानी का मकसद अलामती तौर पर हर मुसलमान में त्याग और समर्पण की मूल भावना को जगाना होता है।
कुर्बानी के जानवर के लिए सूरत यह है कि वो अगर घर में पालतु तो हो तो और बेहतर होता है. क्योंकि उस जानवर से हमें ज्यादा मुहब्बत होती है, जिसे हम रोज खिलाते-पिलाते हैं. यह इस बात की अलामत है कि हम अपनी सबसे महबूब चीज को भी हक और सचाई की राह में कुर्बान कर सकते हैं, अगर जरूरत पड़ी तो।


ईद के दिन लोग आपस में मिलते हैं और एक दूसरे को गिफ्ट वगैरह देकर आपसी रिश्तों को और मजबूत करते हैं. लोगों के लिए एक दूसरे की सलामती की दुआएं करते हैं. इस तरह ईद का दिन एक सामाजिक मेल मिलाप का दिन बन जाता है, जिससे लोगों के बीच आपसी भाईचारा को बढ़ावा मिलता है और आपस के मतभेद खत्म होते हैं।


ईद के माने होते हैं 'खुशी'. ईद यानी खुशियां मनाने का दिन. एक दूसरे से गले मिलना, बधाइयां देना, गिफ्ट देना और सबको मिठाइयां खिलाना वगैरह, इस बात की गवाही देते हैं कि लोगों के बीच से ज्यादा से ज्यादा मतभेदों को खत्म करने की कोशिश की जाये. एक दूसरे को मुबारकबाद देकर आपस में दोस्ताना तअल्लुक को बढ़ाना ही इन त्योहारों का मकसद होता है।
यह न सिर्फ मुसलमानों के लिए, बल्कि हर धर्म के ऐतबार से होना चाहिए, जिससे कि धर्मों के बीच की दूरी को कम कर आपसी मेल-मिलाप को ज्यदा से ज्यादा बढ़ावा मिल सके. और सच्चाई, हक और इंंसानियत के वजूद को बुलंद किया जा सके।


ईद अगरचे साल में एक बार मनाया जाता है, लेकिन इसका मकसद यह है कि उस दिन लोगों में ऐसी सौहार्दपूर्ण भावना का सूत्रपात हो जो पूरे साल तक कायम रहे. यानी लोगों के दिलों में मोहब्बत की स्पिरिट, शांति के साथ रहने की स्पिरिट, दूसरों के काम आने की स्पिरिट वगैरह को बरकरार रखते हुए आपसी भाईचारे की बुनियाद पर ज्यादा से ज्यदा खुशियां पैदा की जा सके।


ईद-उल-अजहा के ऐतबार से मजीद बात यह है कि दुनिया में अगर सचाई पर कायम रहने के लिए किसी कुर्बानी की जरूरत पड़ी, तो हम सच्चाई को नहीं छोड़ेंगे।


चाहे इसके लिए दूसरी चीजों को क्यों न छोड़ना पड़े. ईद का दिन इस ऐतबार से भी अहम है कि यह सबक देता है कि सच्चाई ही सुप्रीम है, सच्चाई जिंदगी का सबसे अहम मकसद है और आदमी को चाहिए कि वह कुर्बानी देकर भी सच्चाई पर खड़ा रहे. वह हर हाल में भी सच्चाई से पीछे न हटे।
हर मजहब में त्योहारों के दिन मुकर्रर किये गये हैं. इन त्योहारों का असल मकसद यही होता है कि मेल-मिलाप का माहौल पैदा किया जाये, शांति के साथ रहने का सबक दिया जाये. इस्लाम के दोनों त्योहारों का मकसद भी यह होता है।


यह दुश्मन को भी दोस्त बनाने का दिन होता है. इस दिन अपनी बरसों की रंजिश और दुश्मनी को भुलाकर आपस में गले मिलकर यह संदेश देना चाहिए कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा और तमाम ऐसे रास्ते खुले हैं, जहां से दोस्ती को फिर से जिंदा किया जा सकता है।
इससे एक मिसाल तो कायम होगा ही, साथ ही लोगों में लोगों के प्रति प्यार और मुहब्बत पैदा होगी, जो इंसानियत के वजूद को और मजबूत बनायेगी. ईद-उल-अजहा का पैगाम यही है कि आदमी अपने आप को खुदा के साथ जोड़े. वह हर इंसान के साथ शांति और सौहार्द के साथ रहे और सच्चाई को अपनी जिंदगी में सबसे आला मकाम दे. हक पर कायम रहते हुए इंसानियत का झंडाबरदार बने, ताकि दुनिया में अमन व सकून कायम किया जा सके।


सबको साथ चलने का पैगाम देनेवाला त्योहार


ईद-उल-अजहा' दीन इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार है. यह त्योहार सुन्नत-ए-इब्राहीमी और ईदे-कुर्बां के नाम से भी जाना जाता है. जिस तरह से ईद-उल-फित्र रमजान महीने में रोजे रखने की खुशी में मनाया जाता है, ठीक उसी तरह से ईद-उल-अजहा भी हज पूरा करने की खुशी में मनाया जाता है. ईद-उल-अजहा के दिन सभी मुस्लिम भाई सबसे पहले ईदगाह में जाकर ईद की खास नमाज अदा करते हैं और उसके बाद अपने-अपने घरों में पाले हुए जानवरों की कुर्बानी करते हैं।
दीन इस्लाम में जिल हिज्जा महीने की बड़ी मान्यता है. इस महीने के पहले दस दिनों में ही हजरत आदम (अलै.) की दुआ कुबूल हुई. हजरत इब्राहीम ने अल्लाह की राह में अपने प्यारे बेटे हजरत इस्माईल की कुर्बानी पेश की. इसी अशरे (कालखंड) में इन दोनों हजरात ने काबा शरीफ की बुनियाद रखी।


इन्हीं दिनों में हजरत दाऊद (अलै.) को मगफिरत (मोक्ष) अता हुई. हजरत मुहम्मद (स.अ.) ने फरमाया कि दुनिया के जितने दिन हैं, उनमें सबसे ज्यादा बुजुर्गी वाला इस महीने का पहला अशरा है. आपने फरमाया कि अगर कोई आदमी इन दस दिनों की ताजीम करे, तो खुदा तआला उस शख्स को दस बुजुर्गियां अता करता है।
हर त्योहार के मनाये जाने के पीछे कोई न कोई वजह या वाकया होता है, वैसे ही ईद-उल-अजहा के पीछे भी है. इस्लाम के एक पैगम्बर हजरत इब्राहीम को खुदा की तरफ से हुक्म हुआ कि यदि तुम मुझसे सच्ची मोहब्बत करते हो, तो अपनी सबसे ज्यादा प्यारी चीज की कुर्बानी करो।


हजरत इब्राहीम के लिए सबसे प्यारी चीज थी, उनका बेटा हजरत इस्माईल. ‍लिहाजा, हजरत इब्राहीम अपने प्यारे बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान करने के लिए तैयार हो गये. गौरतलब है कि इस्माईल भी खुशी-खुशी कुर्बान होने को तैयार हो गये. हजरत इब्राहीम जब अपने बेटे को लेकर जा रहे थे, तभी रास्ते में शैतान मिला और उसने कहा कि वह इस उम्र में क्यों अपने बेटे की कुर्बानी दे रहे हैं. उसके मरने के बाद बुढ़ापे में कौन आपकी देखभाल करेगा? हजरत इब्राहीम यह बात सुनकर सोच में पड़ गये और उनका मन बहकने लगा. लेकिन कुछ देर बाद वह संभले और कुर्बानी के लिए तैयार हो गये।


हजरत इब्राहीम को लगा कि कुर्बानी देते समय एक पिता की भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली. जैसे ही हजरत इब्राहीम ने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलायी, उनकी जगह एक दुम्बा कुर्बान हो गया. ऐन कुर्बानी के वक्त खुदा ने हजरत इस्माईल की जगह दुम्बा भेज दिया था. इस तरह हजरत इब्राहीम की कुर्बानी कुबूल हुई. खुदा की ओर से यह महज एक इम्तिहान था, जिसमें पैगम्बर हजरत इब्राहीम पूरी तरह से पास हुए।


यह वाकया इस्लाम की तारीख में अजीम मिसाल बन गया कि अपनी मुहब्बत, जज्बात और एहसास को अल्लाह की खुशी के लिए कुर्बान कर दो. तभी से हर साल इसी दिन उस अजीम कुर्बानी की याद में मुसलमान भाई ईद-उल-अजहा का त्योहार मनाते हैं. अल्लाह की राह में हलाल जानवरों की कुर्बानी करते हैं।


यह कुर्बानी ईद-उल-अजहा की नमाज के बाद से शुरू होकर जिल हिज्जा महीने की बारहवीं तारीख की शाम तक की जा सकती है. यानी जो शख्स ईद के दिन कुर्बानी न कर पाये, तो वह दूसरे या तीसरे दिन भी कुर्बानी कर सकता है।


कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से किये जाते हैं. एक हिस्सा अपने घर वालों के लिए, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्त-अहबाब के लिए एवं तीसरा हिस्सा गरीबों और यतीमों में बांटा जाता है. ईद-उल-फितर पर जिस तरह से सदका और जकात दी जाती है, ठीक उसी तरह से ईद-उल-अजहा पर मुसलमान भाई कुर्बानी के गोश्त का एक हिस्सा गरीबों में तकसीम करते हैं. इस्लाम में हर त्योहार पर गरीबों का ख्याल जरूर रखा जाता है. ताकि उनमें कमतरी का एहसास पैदा न हो और गरीब मुसलमान भी अच्छी तरह से त्योहार मना सकें।


ईद-उल-अजहा मनाये जाने के पीछे हज की खुशी भी है. हज, इस्लाम के पांच प्रमुख स्तंभों में से एक है. हज हर उस मुसलमान पर फर्ज है, जिसके पास उसके सफर का जरूरी खर्च और बीवी-बच्चों के लिए इतना खर्च हो कि वह उसके पीछे आराम से अपना गुजर कर सकें. हज का फरीजा (पुनीत कर्त्तव्य) और अरकान मक्का शहर, मीना और अराफात के मैदान में जिल हिज्जा महीने की आठ से बारह तारीख तक पूरे किये जाते हैं।


हज के इस फरीजा को अदा करने के लिए दुनियाभर से मुसलमान सऊदी अरब के शहर मक्का और मदीना मुनव्वरा के लिए सफर करते हैं. हमारे देश से भी हजारों लोग इस फरीजा अदा करने के लिए मक्का और मदीना का सफर करते हैं. जिल हिज्जा महीने की दस तारीख को मक्का में हाजी लोग हज के तमाम अरकान पूरे करने के बाद मीना के मैदान में खुदा की इबादत करते हैं और कुर्बानी करते हैं।
ईद जहां सबको साथ लेकर चलने का पैगाम देता है, वहीं यह भी तालीम देता है कि इंसान को खुदा का कहा मानने, सच्चाई की राह में अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार रहना चाहिए. यदि इस त्योहार से उनके दिल में कुर्बानी का अजीम जज्बा पैदा न हो, तो इस त्योहार की कोई अहमियत नहीं है. जो इंसान अपने अल्लाह में पक्काअकीदा रखता है, उस पर अल्लाह रहमतें बरसाते हैं ।


~ वहीदुद्दीन खान

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