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पैग़म्बरे इस्लाम ने गैर मुसलमानों से भाईचारे अच्छे सलूक की हिदायत फ़रमाई है

पैग़म्बरे इस्लाम ने गैर मुसलमानों से भाईचारे अच्छे सलूक की हिदायत फ़रमाई है

अल्लाह ने पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सूरत में जो रहमत की घटाएँ ब्रह्मांड पर उतारी हैं, उसने मुसलमान हो या गैरमुस्लिम और इंसान हो या जानवर, सभी को आबयार किया है और ज़ुल्म व जोर को मिटा कर इंसाफ और इंसानी भाईचारा को बल प्रदान किया है। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने पूरी इंसानियत को हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से जोड़ा, प्यार और भाईचारा के रिश्ता में उन सबको एक दूसरे से जोड़ा और पूरी इंसानियत के साथ रहमदिली की शिक्षा दी। फरमाया जो रहम नहीं करता उस पर रहम नहीं किया जाता। ये भी इरशाद हुआ कि तुम ज़मीन वालों पर रहम करो तो तुम पर वो रहम फरमायेगा, जो आसमान में है, इरशाद हुआ कि तुममें से कोई मुसलमान नहीं हो सकता जब तक वो लोगों के लिए उसी व्यवहार और रवैय्ये को पसंद न करे जो अपने आपके लिए पसंद करता है। ला यूमेनो अहदकुम हत्ता योहिब्बुन्नास मा योहिब्बुन नफसा' आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मुस्लिम और गैर मुस्लिम के विभेद के बिना फरमाया कि वो मोमिन नहीं जो अपना तो पेट भरे और उसका पड़ोसी भूखा रहे। एक रवायत में है कि वो शख्स मोमिन नहीं जिसका पड़ोसी उसके शर (बुराई) से महफूज़ (सुरक्षित) न हो। क़ुरान मजीद में पड़ोसी के लिए दो लफ्ज़ इस्तेमाल किए गए हैं,'' वलजारा ज़िलक़ुर्बा, वलजारा अलजनबे'' यहाँ कुछ मुफस्सरीन के लिए 'जार जनबे' से गैर मुस्लिम पड़ोसी मुराद है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हू के बारे में मरवी है कि उन्होंने बकरी ज़बह करवाई और पड़ोसियों को भेजने की हिदायत की, वापसी पर मालूम किया यहूदी पड़ोसी को उसमें से हिस्सा भेजा गया? जवाब न में मिला तो आपने खास तौर से उस पड़ोसी के यहां बकरी का गोश्त भेजा।

अगर कोई रिश्तेदार गैर मुस्लिम हो तो बहैसियत रिश्तेदार जो व्यवहार मुसलमानों के साथ किया जाता है, वही व्यवहार उस गैर मुस्लिम के साथ भी किया जाएगा। माँ बाप अगर गैर मुस्लिम भी हों तो भी उनके साथ अच्छे व्यवहार में कोई फर्क न आने दिया जाए। इस्लाम में अहले किताब औरतों से शादी की इजाज़त दी गई और बीवी के रूप में उसके वही अधिकार दिये गए हैं जो एक मुसलमान बीवी के हैं। इसी तरह दूसरे गैर मुस्लिम रिश्तेदारों के साथ भी अच्छे व्यवहार और नैतिकता के साथ पेश आने का हुक्म दिया गया है। हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू के बारे में साबित है कि उन्होंने एक मुशरिक भाई को तोहफा भेजा। इमाम मुजाहिद रहिमतुल्लाह अलैहि फरमाया करते थे कि मुशरिक रिश्तेदारों का क़र्ज़ माफ करना सवाब का काम है। उम्मुल मोमिनीन हज़रत सुफ़्फ़ा रज़ियल्लाहू अन्हू ने यहूदी रिश्तेदारों में तीस हज़ार दिरहम बाँटा था। तो करीबी लोगों और रिश्तों के लिहाज़ में इस्लाम ने मुसलमानों और गैर मुसलमानों को एक ही दर्जे (श्रेणी) में रखा है।

आम गैर मुस्लिमों के साथ इंसानी बुनियादों पर बेहतर नैतिकता और भाईचारे के व्यवहार की हिदायत दी गयी है। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने खुद एक यहूदी नौजवान की अयादत (किसी की बीमारी के वक्त उसका हाल पूछना) को गये, जो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की खिदमत करता था और अख़ीर वक्त में उस पर इस्लाम पेश फरमाया। नौजवान ने अपने पिता की तरफ इजाज़त की नज़र से देखा और पिता के इशारे पर इस्लाम कुबूल कर लिया। मुनाफिक़ की अयादत और मुनाफिकों के सरदार अब्दुल्ला बिन अबी के अंतिम संस्कार के मौक़े पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म का जाना साबित है।

मानव सम्मान के दायित्व के तहत एक यहूदी का जनाज़ा गुजरने पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खड़े हो गए। लोगों ने अर्ज़ किया कि यहूदी का जनाज़ा है, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि आख़िर वो भी तो इंसान था। जंगे खन्दक़ के मौक़े पर एक मुशरिक सैनिक खन्दक़ पार करके मुसलमानों की तरफ आ गया और मारा गया। कुफ़्फ़ारे मक्का ने क़ीमत अदा कर लाश हासिल करनी चाही लेकिन आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ये कीमत नहीं ली और यूं ही उनकी लाश उनके हवाले कर दी। नजरान के ईसाइयों का प्रतिनिधिमंडल मदीना आया तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने बहुत आदर और सम्मान के साथ उन्हें मस्जिद में ठहराया। एक साहब जो बाद में मुसलमान हो गए थे, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के यहां मेहमान हुए घर में जो कुछ था सब कुछ खा गए। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के परिवार वालों को भुखा रहना पड़ा, लेकिन आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कुछ बुरा नहीं माना।

यहूदियों की आदत थी कि वो मौका दर मौक़ा आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को और मुसलमानों को तकलीफ़ पहुँचाते थे लेकिन आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम हमेशा सब्र के साथ ऐसी बातों को सह जाते। एक यहूदी ने मुसलमान से बातचीत के बीच में कहा: उस ज़ात की क़सम जिसने मूसा अलैहिस्सलाम को पूरे आलम पर फ़ज़ीलत अता की, मुसलमानों ने पूछा मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर भी? उसने कहा: हाँ। मुसलमान इस पर गुस्सा हो गये और उसे थप्पड़ मार दिया। हालांकि मुसलमान इस चेतावनी में सही थे, क्योंकि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का सभी रसूलों में अफ़ज़ल होना बाइबल से भी साबित है लेकिन इसके बावजूद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबी को चेतावनी दी और कहा कि क़यामत में मूसा अलैहिस्सलाम सबसे पहले होश में आएंगे। एक यहूदी महिला ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की दावत की और ज़हर खिला दिया। अल्लाह ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की हिफाज़त फ़रमाई लेकिन इतने बड़े जुर्म के बावजूद आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उसे माफ कर दिया। कुछ यहूदी अपनी बदमाशी के बिना पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को 'अलसाम अलैकुम' कहकर संबोधित करते थे, जो बद्दुआ वाला शब्द था। सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हू को इस तरह की बात सुनकर तैश आ जाता, लेकिन आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम कभी नैतिकता का दामन नहीं छोड़ते और जवाब में सिर्फ 'वालेकुम' कहते थे।

गरीबों और बेसहारों की माली मदद के मामले में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने गैर मुसलमानों को नज़रअंदाज़ नहीं किया। जब मक्का में सूखा पड़ा और लोग भूखों मरने लगे तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने पूरे मक्का वालों के लिए अबु सुफियान के ज़रिए पाँच सौ दीनार की बड़ी रक़म भिजवाई कि वो इस रकम को पूरे मक्का वालों पर खर्च करें। कुरान और हदीस में कई जगह कैदियों के साथ अच्छे वयवहार और उन पर खर्च करने की हिदायत की गई है। हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू ने एक यहूदी को भीख मांगते हुए देखा और इसका कारण पता किया, भिखारी ने कहा, जज़िया अदा करने और अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भीख माँग रहा हूँ। हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू उसे अपने साथ लाए, बैतुलमाल से बहुत सारी मदद की और इरशाद किया कि ये इंसाफ की बात नहीं है कि जवानी में हम उनकी कमाई से फायदा उठाएं और बुढ़ापे में उन्हें भीख मांगने के लिए छोड़ दें। इसी तरह क़ुर्बानी और दूसरे सदक़ों से (सिवाय ज़कात के) गैर मुस्लिम भाइयों की मदद की जा सकती है।

जो गैर मुस्लिम मुसलमानों से लड़ाई करने पर अमादा न हों, इस्लाम की निगाह में उनकी जान और खून की वही क़ीमत है जो मुसलमानों की जान की है। क़ुरान ने धर्म का ध्यान दिये बिना हुक्म दिया है यानी कातिल को मक़तूल के बदले क़त्ल किया जाए, ताकि इंसानियत की हिफाज़त का सामान हो सके। (अलबकराः 178)

दूसरी जगह इरशाद: यानी एक इंसानी जान के बदले क़त्ल पर दूसरी इंसानी जान जो कातिल की हो क़त्ल कर दिए जाने के लायक़ है। (अलमायदाः 45) एक मुसलमान ने एक गैर मुस्लिम को क़त्ल कर दिया तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने क़िसास (बदले) के रूप में उस मुसलमान को क़त्ल कराया और कहा जो गैर मुस्लिम अपने अहद (संकल्प) को पूरा करे मैं उसके अहद (संकल्प) का एहतेराम करूंगा'' अना अकरमा मन वकी बेज़मतहू'

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ऐसा कोई भेदभाव नहीं किया और सिद्धांत तय किया कि मुसलमानों और गैर मुसलमानों के जानों का महत्व समान है 'दमा हम कदमाएना' इसलिए आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने खुद जो ख़ून बहा मुसलमानों का था वही खून बहा एक गैर मुस्लिम का अदा फरमाया। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम की निगाह में धर्म का ध्यान दिये बिना इंसानी जान और ज़िंदगी की क्या अहमियत है।

इस्लाम और पैगंबरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की नज़र में जो आदर और महत्व एक मुसलमान के माल का है, वही महत्व गैर मुस्लिम भाइयों के माल और संपत्ति का है, फरमाया, ''किसी गैरमुस्लिम का माल नाहक तौर पर हासिल करना बिल्कुल जायज़ नहीं है। ये आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उस मौक़े पर बयान फरमाया जब जंगे ख़ैबर में सुलह हो जाने के बाद भी कुछ जोशीले लोगों ने जबरदस्ती से काम लिया, जैसे एक मुसलमान का माल चोरी करने पर हाथ काटने की सज़ा है इसी तरह अगर कोई गैर मुस्लिम का माल चोरी कर ले तो वो भी उसी सज़ा के काबिल होगा।

कुछ काम शरीयत की निगाह में हराम हैं जैसे शराब और सुअर। अगर खुदा नाख्वास्ता कोई मुसलमान अपने पास शराब और सुअर रखे और दूसरा वक्ति उसे तबाह कर दे तो उस पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी, लेकिन अगर मुसलमान ही किसी ऐसे शख्स की शराब और सुअर को ताबह कर दे जिसके धर्म में उसे हलाल समझा जाता है तो उस व्यक्ति को उसकी कीमत अदा करनी होगी। इससे अंदाज़ा किया जा सकता है कि इस्लाम ने मुस्लिम और गैर मुस्लिम दोनों के माल और वित्तीय अधिकारों की रक्षा को समान महत्व दिया है।

सबसे अहम मसला किसी धर्म के दूसरे धर्मों और धर्म वालों के साथ सहिष्णुता और अन्य धर्मों के प्रति सम्मान का है। इस्लाम की निगाह में इस बात की कोई गुंजाइश नहीं कि दूसरी क़ौमों के साथ धार्मिक और मामलों में 'लो और दो' का मामला किया जाय। मुसलमान अपने विश्वास, धार्मिक कामों और संस्कृति के मामले में इस तरह सौदेबाज़ी को कूबुल नहीं कर सकते। ये सहिष्णुता नहीं आत्मा को बेचना और विश्वास का बेचना है- सहिष्णुता का अर्थ ये है कि दूसरों की धार्मिक भावनाओं का लिहाज़ रखे और उनके धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप न करे। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि इस्लाम ने मानवता को काफी हद तक धार्मिक सहिष्णुता, धैर्य और आपसी सम्मान की शिक्षा दी है और सहअस्तित्व के सिद्धांत पर रहने का तरीका सिखाया है। क़ुराने मजीद ने एलान कर दिया कि धर्म के मामले में कोई जबरदस्ती नहीं (अलबकराः 256) धार्मिक सहिष्णुता की बेहतरीन मिसाल वो समझौता है जो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मदीना आने के बाद मुसलमानों, यहूदियों और मुशरिकीन के बीच कराया था। और इस समझौते के तहत प्रत्येक को अपने धर्म पर चलने की पूरी पूरी आजादी दी थी। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की इन्हीं शिक्षा की रौशनी में फ़ुक़्हा ने गैर मुस्लिमों के उस अधिकार को स्वीकार किया कि अगर किसी देश में रिआया के रूप में जीवन बसर कर रहे हैं तो उन्हें अपने निजी और सामाजिक मामलों में धार्मिक क़ानून के मुताबिक़ चलने की आज़ादी होगी। प्रसिद्ध हनफ़ी फ़क़ीह साहबे हिदाया ने लिखा है कि अगर आतिश परस्तों (आग की पूजा करने वाले) के यहां अपने महरम से शादी की गुंजाइश हो और मुस्लिम देश में कोई आतिश परस्त उन महरम रिश्तेदारों से शादी कर ले तब भी मुसलमान हुकूमत को उसके निजी जीवन की मामलों में दखल देने की गुंजाइश नहीं होगी। यहां तक ​​कि अगर कोई एक पक्ष अपने मामले हमारी अदालत में लाए तब भी हम ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते जब तक कि दोनों पक्ष इस्लामी अदालत से संपर्क नहीं करें। इसलिए इस्लामी युग में और खुद हमारे देश की मुस्लिम बादशाहतों के दौर में हमेशा 'अल्पसंख्यक के पर्सनल लॉ' की रक्षा की गयी है।

इसी बड़ेपन का व्यवहार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इबादतगाहों के बारे में कियी है। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने जंग के मौक़े पर इबादतगाहों से संबंधित धार्मिक व्यक्तियों को क़त्ल करने से मना किया। हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिमतुल्लाह अलैहि अपने गवर्नरों को हिदायत देते थे कि चर्च या साइनागाग तबाह न किया जाए। हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू जब बैतुल मोक़द्दस तशरीफ़ ले गए और चर्च के प्रबंधकों की इजाज़त बल्कि इच्छा पर एक चर्च में नमाज़ अदा की तो इस चर्च के लिए एक विशेष दस्तावेज़ तैयार फ़रमाया कि कहीं मुसलमान उनके अमीर के नमाज़ अदा करने की वजह से जबरन उसे अपनी इबादतगाह बनाने की कोशिश न करें।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की इन्हीं शिक्षाओं और खुल्फाए राशिदीन (चारों खलीफा) के व्यवहारिक नमूनों को सामने रख कर फ़ुक़्हा ने गैर मुसलमानों के साथ धार्मिक सहिष्णुता और धार्मिक स्वतंत्रता के हुक्म दिए हैं और मुसलमानों के लिए इस बात को नाजायज़ करार दिया गया है कि जबरन क़ब्ज़ा की हुई जमीन पर नमाज़ पढ़ने या मस्जिद बनाएं, इसलिए जो लोग मुसलमानों के बारे में इस तरह की बातें कहते हैं कि उन्होंने गैर मुस्लिमों के पूजा स्थलों पर जबरन कब्जे कर और मस्जिदें बनाई हैं, वो सिर्फ गलतफहमी और गलत बयानी पर आधारित है।



मौलाना खालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी

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