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राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ने डॉ. जाकिर हुसैन को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि पुष्पांजलि अर्पित की

राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ने डॉ. जाकिर हुसैन को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि पुष्पांजलि अर्पित की

नई दिल्ली : राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने आज (08 फरवरी, 2018) राष्ट्रपति भवन में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की जयंती के अवसर पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।
राष्ट्रपति, डॉ. जाकिर हुसैन के परिजनों सहित राष्ट्रपति सचिवालय के अधिकारियों एवं स्टॉफ ने राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में डॉ. जाकिर हुसैन की तस्वीर के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, 'भारत डॉ. जाकिर हुसैन को उनकी जयंती पर याद कर रहा है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान अभूतपूर्व रहा है। उन्होंने एक विद्वान और शिक्षाविद् के रूप में भी अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है।'
डॉ जाकिर हुसैन स्वतंत्र भारत के तीसरे राष्ट्रपति थे। उनका अधिकांश जीवन शिक्षा को समर्पित रहा। सम्पूर्ण भारत को शिक्षित देखना उनका स्वप्न रहा है। वे पद्म विभूषण और भारत रत्न से सम्मानित किये गए। अपनी योग्यता और प्रतिभा के बुते उन्होंने एक शिक्षक से लेकर राष्ट्रपति जैसे उच्य पद तक का सफर तय किया। भारतीय राजनिती और शिक्षा के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा
डॉ जाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी, 1897 को हैदराबाद आंध्रप्रदेश के सुम्भ्रांत परिवार में हुआ। माता नाजनीन बेगम का प्लेग की बीमारी से ग्रस्त होने के कारण 1911 मे इंतकाल हो गया। हुसैन के जन्म के थोड़े समय बाद ही परिवार उत्तर प्रदेश आकर बस गया। कुछ समय बाद हुसैन ने अपने पिता को भी खो दिया। परिवार शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न था जिसकी झलक हुसैन के व्यक्तित्व पर साफ दिखाई पड़ती थी|
शिक्षा के प्रति लगाव उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला था। पिता ने भी कानून के क्षेत्र में अपनी अच्छी जगह प्राप्त की थी। शिक्षा के महत्व को वे भली-भांति जानते थे। यही वजह है कि हुसैन ने माता-पिता को खो देने के बाद भी पिता की इच्छा पूर्ती के लिए अपनी पढ़ाई बिना किसी रुकावट के जारी रखी। प्रारंभिक शिक्षा इस्लामिया हाई स्कूल, इटावा में हुई। फिर कानून की पढ़ाई के लिए ऐंग्लो-मुस्लिम ऑरिएंटल कॉलेज मे दाखिला लिया, जिसे अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता है। यहाँ से M.A. करने के बाद हुसैन जर्मनी चले गए। जर्मनी विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पी.एच.डी की डिग्री प्राप्त की। वे एक प्रतिभाशाली छात्र के साथ-साथ एक कुशल वक्ता भी थे।
1927 में जब वह भारत लौटे उस समय जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी जिसकी नींव उन्होंने जर्मनी जाने से पहले खुद रखी थी, अब बंद होने के कगार पर थी। तब उन्होंने इसे बंद होने से रोकने और इसकी दशा सुधारने के लिए इसका पूर्ण संचालन अपने कंधो पर ले लिया। अगले 20 वर्षों तक उन्होंने इस संस्थान को बहुत अच्छे ढंग से चलाया। अंग्रजो के अधीन भारत मे इस यूनिवर्सिटी ने अपना एक अलग ही मुकाम बनाया। डॉ. हुसैन एक व्यावहारिक और आशावादी व्यक्तित्व के इंसान थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें जामिया मिलिया इस्लामिया का उपकुलपति बना दिया गया। 1926-1948 तक वे जामिया मिलिया इस्लामिया के उपकुलपति रहे। कई विश्वविद्यालयों ने इन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। वे अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कुलपति भी रहे।
1948 में नेहरूजी ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया। 1955-1957 तक वे जिनेवा में सभापति रहे। 1956 में वे राज्यसभा अध्यक्ष बने। करीब एक वर्ष बाद ही 1957 में वह बिहार राज्य के गवर्नर नियुक्त हुए और राज्यसभा की सदस्यता त्याग दी। उन्होंने इस पद पर 1962 तक कार्य किया। 1962 में वह देश के उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए। 1967 मे भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने।
डॉ. हुसैन भारत में शिक्षा सुधार को लेकर हमेशा तत्पर रहे। अपनी अध्यक्षता में इन्होंने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग को शिक्षा का स्तर बढ़ाने के उद्देश्य से गठित भी किया। 1954 मे डॉ हुसैन को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। 1963 में भारत सरकार ने 'भारत रत्न' से भी सम्मानित किया। डॉ हुसैन साहित्य एवं कला प्रेमी थे। शिक्षा के क्षेत्र के अलावा एक राजनेता के रूप मे भी उनके कार्य सदैव याद किये जाते है। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता उदाराष्ट्रवादिता के सिधान्तों को व्यव्हारिक रूप प्रदान किया है। डॉ हुसैन ने बहुत सी किताबे रचित की जिसमे सबसे अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की केपेतिलिज्म, स्केल एंड मैथड्स ऑफ़ इकोनोमिकस, रिपब्लिक, शहीद की अम्मा, अंधा घोडा आदि।
3 मई, 1969 को डॉ.जाकिर हुसैन का असमय देहांत हो गया। वह भारत के पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिनकी मृत्यु अपने कार्यालय में हुई। उनको जामिया मिलिया इस्लामिया के परिसर में ही दफनाया गया। असमय देहावसान के कारण वह अपना कार्यकाल नहीं पूरा कर सके।

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