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वित्त मंत्री अरुण जेटली की आयकर पर तिरछी नजर

वित्त मंत्री अरुण जेटली की आयकर पर तिरछी नजर

नई दिल्ली : वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जब से वित्तमंत्री का पद संभाला है, तभी से उनकी निगाह आयकर दाताओं पर है और वह अक्सर यह कहते थे कि इतने बड़े देश में आयकर देने वालों की संख्या इतनी कम क्यों है? विभिन्न आर्थिक सुधारों के माध्यम से वित्त मंत्री अरुण जेटली आयकर देने वालों की संख्या बढ़ाने में सफल भी हुए लेकिन अब भी उन्हें लगता है कि कई लोग आयकर के दायरे से बचे हुए हैं। इस बार (2018) के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आयकर की सीमा में कोई बदलाव नहीं किया है लेकिन 40 हजार रुपये मानक (स्टैण्डर्ड) छूट जरूर घोषित कर दी। इस छूट के बारे में भी उन्होंने निगरानी रखने के लिए कहा है कि स्टैण्डर्ड डिडेक्शन का फायदा आयकर रिटर्न भरने वालों को ही मिलेगा अर्थात् लोगों को अपनी आमदनी के बारे में सच्चाई सरकार के सामने रखनी ही पड़ेगी।
इससे स्पष्ट है कि सरकार आयकर रिटर्न नहीं भरने वालों पर सरकार सख्ती की तैयारी में है। आने वाले दिनों में ऐसे लोगों पर शिंकजा कसा जाएगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि कर कानून में बदलाव किया जाएगा। इसमें ऐसी व्यवस्था की जाएगी, जिससे रिटर्न नहीं भरने वालों को कर में छूट का लाभ नहीं मिलेगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून में कोई रियायत नहीं बरती जाएगी। आयकर रिटर्न नहीं भरने वालों को सरकार की ओर से लागू स्टैंडर्ड डिडक्शन कर छूट का लाभ नहीं मिलेगा। वित्त मंत्री ने बताया कि सभी को कर प्रक्रिया में शामिल होना होगा। ऐसा नहीं करने वालों को कोई रियायत नहीं मिलेगी। इस साल एक अप्रैल से ही सरकार यह कानून लागू करने जा रही है। बजट के अन्य पहलुओं पर भी वित्त मंत्री ने खुलकर बात की।
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि उन्होंने अपने हर बजट में किसानों को कुछ न कुछ जरूर दिया। किसानों के लिए कर्ज आसान बनाया गया है। फसल बीमा योजना लाई गई है। सरकार ने हर बार समर्थन मूल्य बढ़ाया है। अब किसानों को फसल की लागत से डेढ़ गुना कीमत देने की तैयारी है। बजट पर पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम के बयान पर जेटली ने दो टूक शब्दों में कहा, अपने समय में उन्होंने खुद कुछ नहीं किया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नई स्वास्थ्य बीमा योजना पर उठ रहे सवालों का भी खंडन किया। उन्होंने कहा कि इसका मकसद है कि गरीब लोग भी निजी अस्पतालों में इलाज करा सकें।

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