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हमारी एकता जब-जब टूटी है तब-तब हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है

हमारी एकता जब-जब टूटी है तब-तब हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है

नई दिल्ली : हमारे देश के संविधान में सबसे शीर्ष स्थान राष्ट्रपति का होता है। इसके बाद दूसरा स्थान उपराष्ट्रपति का है। राष्ट्रपति हमारे गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के नाम संदेश देते हैं। इस बार जब हम गणतंत्र दिवस की 68वीं वर्षगांठ मना रहे थे तो उसकी पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बहुत सामयिक संदेश दिया। संयोग से इस बार उत्तर प्रदेश ने अपना स्थापना दिवस मनाया। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रामनाईक ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार को भी यूपी का गौरवशाली दिन मनाने का सुझाव दिया था, लेकिन अखिलेश यादव ने उस पर ध्यान नहीं दिया। अब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार है जिनका मानना है कि जो व्यक्ति या समाज अपने इतिहास को संजोकर नहीं रख पाता वह अपने भूगोल की भी रक्षा नहीं कर पाता है। योगी ने अपनी सरकार के लगभग एक वर्ष के कार्यकाल में इतिहास के प्रति लोगों में ललक पैदा करने और गौरवशाली इतिहास को याद रखने के लिए कई आयोजन भी किये हैं। लखनऊ में राजा सुहेल देव सिंह का विजयोत्सव मनाया गया था। इससे पूर्व राजा सुहेल देव के बारे में पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग ही जानकारी रखते थे। योगी ने इसके बाद अयोध्या में दीपावली की पूर्व संध्या पर उसी तरह का आयोजन किया जैसा अयोध्या में लंका विजय के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का आगमन हुआ था। अब 25 जनवरी को यूपी स्थापना दिवस मनाया जिसमें उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू मुख्य अतिथि थे और नायडू ने सार्थक सीख दी है। दोनों शीर्ष नेताओं का विशेष रूप से यही कहना था कि हमारे देश में उपद्रव और हिंसा, तोड़फोड़ की जो वारदातें हो रही हैं। उनको किसी भी स्तर से रोका जाना चाहिए। देश के सभी लोगों में मतभेद होते हुए भी एकता का भाव जगाना होगा। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का इशारा तो फिल्म पद्मावत को लेकर चल रहे हिंसक विरोध की तरफ भी था जिसका बहुत भद्दा प्रभाव गणतंत्र दिवस समारोह में आये विदेशी मेहमानों पर पड़ा है।
राष्ट्रपति रामनाथ कोंविद ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि असहमति के बावजूद उदारपूर्ण व्यवहार अपनाने की जरूरत है। हम किसी की भी गरिमा का उपहास न करें और प्रतिनिधियों का चुनाव सावधनी पूर्वक करें। राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो के जीवन को खुशहाल बनाना लोकतंत्र की सफलता की परख होती है। देश में गरीबी और बेरोजगारी है इस अभिशाप को हमें जड़ से मिटाने का प्रयास करना होगा। यह हमारा पुनीत कर्तव्य है। इसको जब हम पूरा कर लेंगे तभी संतोष मिलेगा। उन्होंने कहा कि हम देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। इसमें युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होगी और हमारे युवा अपनी कल्पना, आकांक्षा और आदर्शों के बल पर देश को आगे ले जाने की क्षमता रखते हैं। देश के प्रति सभी नागरिकों का कर्तव्य है और उन्हें जो अधिकार दिये गये हैं उनमें समन्वय रखना होगा। निस्वार्थ भावना वाले नागरिकों और समाज से ही एक निस्वार्थ भावना वाले राष्ट्र का निर्माण संभव होगा। इस प्रकार जब हम राष्ट्र निर्माण का अहम उद्देश्य लेकर आगे बढ़ेंगे तो हम बेहतर विश्व बनाने में भी योगदान कर सकते हैं। वह ऐसा विश्व होगा जिसमें सौहार्द की भावना दिखाई पड़ेगी, प्रकृति के साथ शांतिपूर्वक संबंध होगा और हमारा वसुधैव कुटुम्बकम सार्थक हो सकेगा।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने असहमति के बावजूद उदारपूर्ण व्यवहार और किसी दूसरे की गरिमा का उपहास न उड़ाने की सीख विशेष रूप से दी है। उन्होंने अपने आशय को थोड़ा और साफ करते हुए कहा कि इतिहास की किसी घटना के बारे में हम असहमत हो सकते हैं ऐसे में उदारतापूर्ण व्यवहार को ही हम भाईचारा कहते हैं। यह संकेत साफ-साफ पद्मावत फिल्म के विरोध को लेकर था। संजय लीला भंसाली विवादास्पद फिल्में क्यों बनाते हैं यह सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण है लेकिन इसके साथ कई अन्य महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ जाते हैं। एक सवाल हमारे इतिहास को लेकर भी है। वैदिक काल का इतिहास तो हमारे वेद-पुराणों में ऋषि-मुनियों ने लिखा और उस समय हमारी जीवन पद्धति कैसी थी इसके बारे में बताया गया है लेकिन मध्यकालीन इतिहास के बारे में काफी भ्रम है। मुगलकालीन इतिहास को नवाबों के सेवकों और बाद में अंग्रेजों ने लिखा है जो मुगल बादशाहों की बाहवाही का ही बखान करता है। रानी पद्मावती की कहानी भी 13वीं'14वीं शताब्दी की है और मलिक मोहम्मद जायसी ने 15वीं सदी में पद्मावत काव्य की रचना की थी। इसलिए इतिहास को अपनी-अपनी तरह से लोग पेश करते हैं। इस मामले में महत्वपूर्ण यह है कि फिल्मों को लेकर जब एक संस्था सेंसर बोर्ड बनी है जिसने फिल्म को दिखाने का प्रमाण पत्र दिया है और देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने इसके विरोध में दायर याचिकाएं खारिज कर दीं तो विरोध करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इसीलिए अहसमति के बावजूद उदारपूर्ण व्यवहार करने को कहा है। मतभेद तो राजनीति को लेकर भी है सामाजिक संस्थाओं को लेकर भी है और धार्मिक क्रिया-कलापों को लेकर भी लेकिन उदारतापूर्ण व्यवहार अगर हम नहीं अपनाते हैं तो आपसी संघर्ष में ही उलझे रहेंगे।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सरकारों की भूमिका को विशेष रूप से जिम्मेदार बताया है क्योंकि गतिविधियों को नियंत्रित एवं कार्यान्वित कराने की जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकारों की होती है। इसलिए युवाओं से विशेष रूप से अनुरोध किया है कि वे अपना प्रतिनिधि सावधानी के साथ चुनें। यही सरकार का गठन करते हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता जागरूक मतदाताओं पर निर्भर करती है। इस बात को हमे बहुत गंभीरता से समझना पड़ेगा। चुनाव के समय हम बिना सोचे-समझे किसी को प्रतिनिधि बना देते हैं। इसके बाद लगभग चार साल तक पछताते रहते हैं। ऐसी स्थिति हमारे सामने इसलिए आती है क्योंकि हमने सोच-समझ कर प्रतिनिधि नहीं चुने हैं। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस पर कहा कि हम रामराज्य की बात तभी कर सकते हैं जब यहां के लोग, सभी लोग निडर हों, भ्रष्टाचार न रहे और एक-दूसरे के प्रति नफरत की भावना न दिखाई पड़े। उन्होंने कहा कि भारत किसी एक धर्म का देश नहीं है धर्म तो पूजा का एक रास्ता है। आपको जिसकी पूजा करना है उसकी करिये। गणेश जी की पूजा करना चाहो तो गणेश जी की पूजा करो, अल्लाह की पूजा करना चाहो तो अल्लाह की करो और जीसस क्राइस्ट की पूजा करनी हो तो जीसस की करो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन एक-दूसरे के धर्म को समझिए। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं है बल्कि यह जीवन जीने का एक रास्ता है। इसी प्रकार श्रीराम का नाम भी मजहब से नहीं जोड़ना चाहिए। राम एक आदर्श पुरुष हैं। इसलिए महात्मा गांधी ने कहा था कि रामराज्य का निर्माण होना चाहिए। रामराज्य का मतलब है जहां न भय हो, न झूठ हो, न भ्रष्टाचार हो न अत्याचार हो और न भेदभाव हो वही रामराज्य है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी रामराज्य की यही परिभाषा दी है।
इस प्रकार हमारे राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ने उदारवादी व्यवहार की जो सीख दी है उस पर अमल करने की जरूरत है। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुजातीय देश राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ने उदारवादी व्यवहार की जो सीख दी है उस पर अमल करने की जरूरत करने की जरूरत है।भारत जैसे बहुधर्मी और बहुजातीय देश में में मतभेद का होना स्वाभाविक है। मत भिन्नता रखते हुए भी हम एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान कर सकते हैं। हमारे लोकतंत्र ने शांतिपर्ण विरोध का अधिकार दिया है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। इन दोनों तरीकों से हम अपनी बात भी कह सकते हैं और विरोध भी जता सकते हैं लेकिन एकता को हर हालत में बनाये रखना होगा। हमारी एकता जब-जब टूटी है तब-तब हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। इसी के चलते हम गुलामी की जंजीरों में भी जकड़ गये थे। इसलिए अब उस गलती को दोहराने की भूल न करें।

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