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नरेन्द्र मोदी का सामाजिक चेहरा

नरेन्द्र मोदी का सामाजिक चेहरा

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक क्षमता और कुशलता के तो सभी कायल हो चुके हैं। देश ही नहीं विदेश में भी उन्होंने सिक्का जमाया है लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने मनकी बात के नाम से एक कार्यक्रम शुरू किया है। इस बार 28 जनवरी को उस कार्यक्रम का 40वां संस्करण था। इस कार्यक्रम में मोदी का एक समाज सुधारक का चेहरा दिखाई देता हैं। मोदी ने देश की जनता के सामने जब भी मनकी बात की है, तब वह राजनीति से लगभग हटकर खड़े दिखाई पड़े हैं। वह मूलरूप से राजनेता हैं और एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व कर रहे है जो केन्द्र में सत्ता संभाल रही है तथा 19 राज्यों में भी उसकी अपनी सरकार है अथवा सरकार में वह साझेदार है। इसलिए अपनी सरकार के श्रेय को भी वह इशारों-इशारों में बता देते हैं। इस बार मनकी बात कार्यक्रम में मोदी ने बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों पर जनता का ध्यान केन्द्रित कराया है। बेटी का महत्व दर्शाते हुए उन्होंने कहा कि एक बेटी 10 बेटों के समान है। यह कहने से उनका आशय था कि कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य पाप तुरंत रोका जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी अपनी बात को भारतीय इतिहास और अध्यात्म से जोडकर प्रस्तुत करते हैं। इस बार के कार्यक्रम में मोदी ने स्कन्द पुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि इस पुराण में कहा गया है - दस पुत्र समा कन्या। अर्थात एक बेटी 10 बेटों के समान है। उन्होंने कहा कि भारतीय पौराणिक युग में विदुषियों की भरमार रही है। वेदों की रचना में भी उनका अहम योगदान रहा है जैसे लोपामुद्रा और गार्गी। हमारे समाज में नारी को शक्ति अर्थात दुर्गा का रूप दिया गया है। यही शक्ति आज भी हमारे परिवार को एकता के सूत्र में बांधती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने मौजूदा समय में देश की तीन बहादुर महिलाओं भावना कंठ, मोहना सिंह और अवनी चतुर्वेदी का उल्लेख भी किया हमारे देश के सबसे बड़े लड़ाकू विमान सुखोई-30 में प्रशिक्षण ले रही हैं। महिलाओं के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान का उल्लेख करते हुए श्री मोदी ने यह बताने की कोशिश की है कि बेटियों को बोझ न समझा जाए। हमारे देश में कुछ ऐसे हालात पैदा हुए थे जब बेटियों की रक्षा करना मुश्किल हो गया था। यह हमारे देश का मध्य पूर्व इतिहास था जब बर्बर आक्रमणकारी महिलाओं की इज्जत को लूटते थे। इसलिए लड़कियां बोझ बन गयी थीं। बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियां भी तभी से शुरू हुईं।
इन कुरीतियों के प्रति जागरूकता बढ़ी है लेकिन कन्याभ्रूण हत्या जैसी समस्या को पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका है। ये वही लोग हैं जो परिवार में पुत्र को ही प्रधानता देते हैं और लड़कियों को बोझ समझते हैं। ऐसी गंदी सोच वाले लोग कन्या को जन्म ही नहीं लेने देते। चिकित्सा जगत में काफी विकास हो चुका है जिससे गर्भ में ही पता लगाया जा सकता है कि कन्या भ्रूण है अथवा बालक। इस प्रकार कन्या भ्रूण को समाप्त करवा दिया जाता है। इसमें महत्वपूर्ण है कि चिकित्सक यदि साथ न दें तो यह पता लगाना मुश्किल होगा। सरकार ने भ्रूण परीक्षण पर सख्त कानून भी बनाया है और भ्रूण परीक्षण कर उसकी जानकारी देने पर कठोर दंड भी दिया जाता है लेकिन चंद पैसों के स्वार्थ में डाक्टर अपना ईमान-धर्म बेच देते हैं। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर इतने नर्सिंग होम हैं कि सभी पर निगरानी रखना संभव नहीं है। अल्ट्रासाउंड चिकित्सा की एक महत्व पूर्ण जांच है। गर्भवती की जांच से बच्चे के बारे में सही जानकारी मिलती है ताकि यदि आपरेशन से प्रसव कराया जाए तो सुविधा रहे। इसलिए इस मामले में जागरूकता ही कारगर हो सकती है। लोगों को कन्या अर्थात बेटी का महत्व समझना होगा। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इसी संदर्भ में बताया कि एक बेटी 10 बेटों के समान है और ऐसा कोई कार्य नहीं है जो बेटा कर सके और बेटी न कर सके।
इसी संदर्भ में मोदी ने दहेज प्रथा का उल्लेख किया। दहेज प्रथा भी बेटियों को बोझ बना देती है। बेटी को पढ़ाने-लिखाने में उतना ही पैसा खर्च होता है जितना बेटों की पढ़ाई में व्यय करना पड़ता है। बेटी जब बड़ी होती है तो उसकी शादी के लिए सुयोग्य वर तलाश करना पड़ता है। लड़के वाले लम्बी-चैड़ी दहेज की मांग करते हैं। लड़की वाले तो अपनी सामथ्र्य के अनुसार अपनी बेटी को सामान देते ही हैं लेकिन नकद रूपये के रूप में दहेज देना मुसीबत बन जाता है। प्रधानमंत्री ने इस दहेज प्रथा को समाप्त करने का युवाओं से अनुरोध किया है। अभी कुछ दिन पहले ही बिहार में लाखों की संख्या में लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर दहेज प्रथा के उन्मूलन का संकल्प लिया था। यह एक अच्छी पहल है। लोगों में जागरूकता पैदा करने का प्रयास हर राज्य में होना चाहिए। दहेज की परम्परा अब सिर्फ हिन्दुओं तक ही सीमित नहीं रह गयी है। मुस्लिम समाज में कहा जाता था कि वहां दहेज नहीं बल्कि लड़की को ही वर पक्ष की तरफ से 'मेहर' मिलती है लेकिन इस परम्परा को कायम रखते हुए भी अप्रत्यक्ष रूप से दहेज मांगा जाता है। कई मुस्लिम महिलाओं को इसके लिए प्रताड़ित भी किया गया और तलाक की नौबत आयी। दहेज लेना और देना दोनों को अपराध बनाया गया लेकिन दहेज की प्रथा और मजबूत होती जा रही है।
इसके लिए युवाओं को ही आगे बढ़ कर आना होगा। दहेज प्रथा को वही समाप्त कर सकते हैं। सबसे पहली जरूरत तो बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाने की है। शिक्षा प्राप्त कर यदि बालिकाएं आत्म निर्भर हो जाती हैं, चाहें वे अच्छी नौकरी करें अथवा अपना रोजगार करें तो विवाह के समय उनको दहेज की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है। लड़कों के माता-पिता यह समझ जाते हैं कि यह तो दहेज की एक नदी है जो अनवरत प्रवाहमान रहेगी। शादी के समय दहेज तो सीमित होता है और उसका स्रोत निरंतर सूखता जाता है। इसलिए लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना बहुत जरूरी है। महिलाएं अब हर क्षेत्र में काम करती हुई नजर भी आने लगी हैं। उनके माता-पिता को दहेज की चिंता भी नहीं रह गयी है लेकिन इस समस्या को पूरी तरह तभी खत्म किया जा सकेगा। जब लड़के इस बात को समझें कि शादी में उन्हें दहेज नहीं लेना है। लड़के इस बात पर जोर देते हैं कि उन्हें बिना दहेज शादी करनी है तो परिवार के लोग किसी प्रकार का दुराग्रह नहीं कर सकेंगे। कुछ युवाओं के लिए तो यह और भी ज्यादा जरूरी है कि वे आत्म निर्भर बनें। यदि युवा आत्मनिर्भर नहीं है तो वह अपने परिवार पर दबाव नहीं बना पाएगा। इस प्रकार बेटे और बेटी दोनों को ही दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए आगे बढ़ना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में बाल विवाह को समाप्त करने का भी अनुरोध किया है। यह परम्परा अब कुछ राज्यों में ही देखी जा सकती है और वहां भी बाल विवाहों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है। इसके बाद भी जहां कहीं बाल विवाह हो रहे हैं तो उन्हें रोका जाना चाहिए। सिर्फ कानून बनाकर सामाजिक कुरीतियों को रोकना संभव नहीं है। इसके लिए समाज में जागरूकता लानी होगी। बाल विवाह की परम्परा भी इसी लिए नाममात्र को रह गयी है क्योंकि बच्चों के माता-पिता यह समझने लगे कि जिन्हें जीवन भर एक-दूसरे का साथ निभाना है, वे एक-दूसरे के बारे में कुछ भी नहीं समझते हैं और आगे चलकर कोई समस्या सामने आती है तो संयुक्त परिवार भी तो उनके साथ नहीं रह सकता। मोदी की यह सामाजिक सीख उन लोगों को भी माननी चाहिए जो उनकी राजनीति से सहमत नहीं हैं।

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