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ये संबंधों की तुरपाई है षड़यंत्रों से मत खोलो

ये संबंधों की तुरपाई है षड़यंत्रों से मत खोलो

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास का दर्द उनकी कविताओं के माध्यम से बाहर आ रहा है। पिछले दिनों एक स्कूल के कार्यक्रम में उन्होंने एक कविता सुनाई जो आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की तरफ इंगित करती है। गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मे केजरीवाल की तरह ही कुमार विश्वास भी शामिल थे और जब कुछ सांसदों ने चुनौती दी कि भ्रष्टाचार की बढ़चढ़ कर बातें करने वाले लोग राजनीति में क्यों नहीं आते? यह बात अरविन्द केजरीवाल, योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और कुमार विश्वास जैसे लोगों को चुभ गयी थी। हालांकि अन्ना हजारे नहीं चाहते थे कि उनके आंदोलनकारी कोई राजनीतिक पार्टी बनाएं लेकिन केजरीवाल ने अपने कुछ साथियों के साथ आम आदमी पार्टी बनायी और दिल्ली विधानसभा चुनाव भी लड़ा। लगभग 9 महीने की यह पार्टी दिल्ली की जनता पर जादू कर गयी और केजरीवाल की पार्टी को 28 विधायक मिल गये थे। सरकार बनाने भर को बहुमत नहीं था और केजरीवाल को मजबूर होकर उस कांग्रेस के साथ सरकार बनानी पड़ी जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप केजरीवाल खुद लगाते थे। ऐसी सरकार कितने दिन चल पाती और केजरीवाल ने सरकार का इस्तीफा दे दिया लेकिन दिल्ली की जनता ने दूसरी बार इस पार्टी को प्रचण्ड बहुमत दिया। विधानसभा सभा की कुल 70 सीटों में 67 सीटें इस पार्टी को मिली थीं। इतनी मजबूत पार्टी आज कैसे बिखरी है, इसके बारे में कुमार विश्वास ने सामयिक कविता सुनाई-
पुरानी दोस्ती को इस नयी ताकत से मत तौलो।
ये संबंधों की तुरपाई है षड़यंत्रों से मत खोलो।
मेरे लहजे की छैनी से गढ़े कुछ देवता जो कल।
मेरे लफ्जों पे मरते थे, वो अब कहते हैं मत बोलो
दरअसल राजनीति को न तो केजरीवाल समझते हैं और न कुमार विश्वास। असली समस्या यही है। केजरीवाल ने सबसे पहले यही गलती की थी कि उन्होंने तत्कालीन लेफ्टीनेंट गवर्नर के दबाव में आकर सरकार का इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उनकी दूसरी गलती 2014 में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ना था। वे स्वयं दिल्ली से चुनाव लड़ते और अपने उम्मीदवार पंजाब, हरियाणा, और दिल्ली तक ही सीमित रखते तो संसद में आम आदमी पार्टी के सांसदों की संख्या सिर्फ चार तक सीमित नहीं रहती। ये चारों सांसद पार्टी को पंजाब से मिले। इसके बाद श्री केजरीवाल अपना इलाज कराने बेंगलुरु चले गये और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण ने कुछ ऐसे सवाल उठाये जो आम आदमी पार्टी की सार्थकता के लिए जरूरी थे। दिल्ली की जनता के साथ देश की जनता भी केजरीवाल की तरफ देखने लगी थी कि राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए वे और उनके साथी क्या करने जा रहे हैं। उस समय कुमार विश्वास केजरीवाल के साथ थे और श्री योगेन्द्र यादव व प्रशांत भूषण ने नया मोर्चा बना लिया था। कई अन्य नामचीन नेता भी अलग हो गये थे। इसके बाद भी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार चल रही है। श्री केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर उन्हें मंत्री जैसी सुविधाएं दे दीं। इनका मामला भी फंस गया है। एक विधायक ने तो पहले ही इस्तीफा दे दिया था बाकी 20 विधायकों को चुनाव आयोग ने अयोग्य करार दे दिया। केजरीवाल पर चुनावी फंड को लेकर उनकी ही पार्टी के नेता ने आरोप लगाए। इन्हीं हालातों में राज्यसभा के लिए आम आदमी पार्टी के तीन लोगों को भेजा जाना था। श्री कुमार विश्वास के समर्थक चाहते थे कि कुमार विश्वास को राज्यसभा में भेजा जाए। इसके लिए उनके समर्थकों ने धरना-प्रदर्शन भी किया था। इस तरह बात और बिगड़ गयी।
अब कुमार विश्वास अपने को आम आदमी पार्टी का आडवाणी बता रहे हैं। इटावा में हुए एक कवि सम्मेलन में कुमार विश्वास ने कविताओं के माध्यम से समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव को भी समाजवादी पार्टी का आडवाणी बताया। समाजवादी पार्टी में पारिवारिक कलह जिस तरह चली और अखिलेश यादव ने पार्टी को अपने नियंत्रण में लिया तो शिवपाल यादव के योगदान को कुमार विश्वास उसी तरह का मान रहे हैं जैसा उन्होंने आम आदमी पार्टी को संगठित करने में दिया है। शिवपाल यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने में परिश्रम किया है, इसे श्री मुलायम सिंह खुले आम कहते हैं। इसी प्रकार भाजपा में श्री लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी को संगठित करने के लिए जो कार्य किया उसे कोई भुला नहीं सकता। भाजपा को पहली बार केन्द्र में और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी सरकार बनाने का अवसर मिला था तो यह श्री आडवाणी की ही देन थी। यह सच है लेकिन राजनीति के कई चेहरे हैं। समाजवादी पार्टी ने जहां शिवपाल यादव को अलग करके चुनाव में नुकसान उठाया है वहीं भाजपा ने श्री आडवाणी को किनारे करके राजनीति में बड़ी सफलता प्राप्त की है। श्री कुमार विश्वास को ये दोनों पक्ष देखने पड़ेंगे।
कुमार विश्वास की बातों से अब यह साफ-साफ झलकता है कि वह राज्य सभा में न भेजे जाने से दुखी हैं और इसके लिए अरविन्द केजरीवाल को दोषी मान रहे हैं। कुमार भावुकता का सहारा ले रहे हैं। यह सही है कि उन्होंने केजरीवाल के साथ दोस्ती निभाई थी। उनकी कविताओं ने लोगों को आम आदमी पार्टी और केजरीवाल से जोड़ा था। उनकी कविताएं केजरीवाल को बहुत अच्छी लगती थीं लेकिन अब केजरीवाल को कविताएं नहीं दिल्ली की सरकार की चिंता है। इस बीच उन्होंने गुजरात में भी चुनाव लड़ा। वहां उन्हें विधायक नहीं मिल पाये लेकिन पार्टी ने अपनी उपस्थिति तो दर्ज करायी। सबसे ज्यादा सफलता तो पंजाब में मिली है जहां आम आदमी पार्टी मुख्य विपक्षी दल बन गयी है और उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में नगर पंचायत के सदस्य बनाने में भी आप को सफलता मिली है। इसीलिए उत्तर प्रदेश से संजय सिंह उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। कुमार विश्वास ने गुजरात चुनाव के समय एक अच्छा ट्वीट किया था। कुमार ने लिखा था कि आज के चुनाव का एक सबक यह भी है कि भारतीय राजनीति में सड़क पर उतरकर संवाद-संघर्ष का समय लौट रहा है। चरण पादुका व चैकड़ी राजनीति का समय ढल रहा है। संवाद के महारथियों के लिए यह मैदान मुफीद है जबकि अंतःपुर के शकुनियों के लिए नव-भारत का वोटर द्वार बंद कर रहा है।
अब कुमार विश्वास को यह तय करना है कि वह राजनीति में किस तरह से रहना चाहते हैं। वे संवाद के महारथी हैं और मानते हैं कि उनके लिए राजनीति का मैदान मुफीद है लेकिन अपनी पार्टी में वे किनारे कर दिये गये हैं। उनके संवाद की शक्ति को केजरीवाल ने अनदेखा कर दिया है। समाजवादी पार्टी में वे शिवपाल यादव को अपने जैसा मानते हैं और भाजपा में वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का उदाहरण पेश करते हैं। समय के साथ राजनीति न करने वालों की यही स्थिति होती है। कुमार विश्वास को जल्दी ही अपनी राजनीतिक डगर तय करनी पड़ेगी। उनमें जनता को आकर्षित करने का गुण है लेकिन राजनीति में कबीर बनने की कोशिश में कुमार विश्वास इसी तरह से भटकते रहेंगे। राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है।

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