Top

नरेंद्र मोदी ने आर्थिक प्रगति को भारतीय संस्कृति से जोड़ा

नरेंद्र मोदी ने आर्थिक प्रगति को भारतीय संस्कृति से जोड़ा

लखनऊ : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्विट्जरलैंड की राजधानी दावोस में विश्व आर्थिक मंच के वार्षिक सम्मेलन में धन को विस्तृत आयाम के साथ प्रस्तुत किया और भारतीय संस्कृति को इसका सबसे बेहतर माध्यम बताया। वेदों-पुराणों और उपनिषदों का उल्लेख करते हुए मोदी ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता को सुनाकर उद्यमियों के विचारों को एक नयी दिशा देने की कोशिश की। मोदी ने कहा कि वेल्थ के साथ वेलनेस, हेल्थ के साथ होलनेस और पार्सपरिटी के साथ पीस का होना बहुत जरूरी है। उन्होंने साम्राज्यवादी देशों और आतंकवाद पर दोहरी नीति अपनाने वालों को भी आड़े हाथों लिया। भारत की आर्थिक प्रगति का ऐसा सुनहरा रूप प्रस्तुत किया जिससे विदेशी निवेश की संभावनाएं और बढ़ गयी हैं। मोदी ने वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए सभी देशों को एक परिवार की तरह आचरण करने की अपील की है। उन्होंने भारत के विकासशील देश होते हुए भी विकसित देशों से कहीं ज्यादा बढ़कर एक दूसरे की सहायता करने की परम्परा पर गर्व व्यक्त किया और कहा कि मानव सभ्यता के तीन बड़े खतरे हैं जिन पर हम सभी को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने उद्यमियों को विश्वास दिलाया कि निवेश करने के लिए भारत इस समय सबसे ज्यादा भरोसेमंद देश है जिसकी अर्थव्यवस्था निरंतर आगे बढ़ रही है।
विश्व आर्थिक मंच के शिखर सम्मेलन में लगभग 20 साल पहले भारत के प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा गये थे। मोदी ने उस समय की अर्थव्यवस्था का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 1997 में जब भारतीय प्रधानमंत्री दावोस की बैठक में आये थे, तब भारत का सकल घरेलू उत्पाद 400 अरब डालर था लेकिन अब यह जीडीपी 6 गुना बढ़ गयी है अर्थात् भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2400 अरब डालर से भी अधिक हो गया है इसका मतलब है कि हमने लगातार तेजी से आर्थिक विकास किया है और अगले सात साल में हमारा सकल घरेलू उत्पाद पांच हजार अरब डालर से भी अधिक हो जाएगा। यह वृद्धि हमारी बेहतर आर्थिक नीतियों और बेहतर माहौल के चलते ही संभव हो सका है। इस बात को वैश्विक परामर्श प्रदाता कम्पनी पी डब्ल्यूसी ने भी स्वीकार किया है। इस कम्पनी के सर्वे के अनुसार भारत निवेश की दृष्टि से पांचवां सबसे आकर्षक बाजार है। मोदी ने कहा कि सच्चाई तो यह है कि निवेश की दृष्टि से भारत सबसे ज्यादा भरोसेमंद देश है और उद्यमियों के लिए यहां पर लाल फीताशाही को खत्म करके लाल कालीन बिछा दिया गया है। इसके तहत उन्होंने जीएसटी जैसे कानून को सबसे बेहतर विकल्प बताया।
मोदी ने संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों और साम्राज्यवादी नीतियों को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी सीमा में रहकर आर्थिक विकास करता है। हमने कभी भी किसी दूसरे देश के संसाधनों को हड़पने की कोशिश नहीं की। उनके साथ सहयोग करने की भावना हमेशा रही है। किसी भी सीमा का कभी अतिक्रमण नहीं किया। मोदी का इशारा चीन की तरफ था जो दूसरे देशों की सीमा पर संसाधनों पर अपनी नजर गड़ाये रहता है। इसके साथ ही मोदी ने संरक्षणवादी आर्थिक नीति को भी गलत बताया और कहा कि कुछ देश संरक्षणवादी आर्थिक नीतियां अपना रहे हैं। यह नीति आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जितनी ही खतरनाक है। इस बार मोदी के निशाने पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी आ गये क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प ने जलवायु परिवर्तन समझौते को नामंजूर कर दिया है। इसके साथ ही अमेरिका में वीजा नीति को लेकर जो परिवर्तन किये जा रहे हैं, उससे दूसरे देशों के नागरिकों के लिए रोजगार के रास्ते बंद हो सकते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक और विश्व आर्थिक मंच. जैसे संगठनों को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं।
इन सभी बातों पर किसी देश का नाम न लेते हुए मोदी ने कहा कि मानव सभ्यता के लिए तीन बड़े खतरे हैं जिनसे हम सभी को सावधान रहना होगा। उन्होंने कहा कि पहला खतरा तो जलवायु परिवर्तन का है। ग्लेशियर खिसक रहे हैं और अन्टार्कटिका की बर्फ पिघल रही है इससे कई द्वीप डूब रहे हैं, मौसम अचानक बदल रहा। दावोस में ही कड़ाके की ठंड इसका प्रमाण है। इस जलवायु परिवर्तन के लिए कोई भी अपने को जिम्मेदार नहीं मान रहा है। कोई कहता है कि कार्बन उत्सर्जन कम करना चाहिए लेकिन कुछ देश इसके खिलाफ हैं। ध्यान रहे कि जेनेवा में जब यह बात उठी थी तो मोदी ने कहा था कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में कथित विकसित देश ही आगे हैं और भारत जैसे विकासशील देश में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बहुत कम है। श्री मोदी ने दावोस में इसी बात को अप्रत्यक्ष रूप में कहा और सचेत किया कि जलवायु परिवर्तन की उपेक्षा करने से पूरी दुनिया को कष्ट उठाना पड़ेगा। उन्होंने दूसरी समस्या आतंकवाद की बतायी। मोदी ने कहा कि दूसरा बड़ा खतरा आतंकवाद का है लेकिन अच्छे और बुरे आतंकवाद का भेद उससे भी ज्यादा खतरनाक है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रकार पाकिस्तान की तरफ साफ-साफ इशारा किया जो अपने देश में तालिबानी आतंकवाद को आतंकवाद मानता है लेकिन भारत में उसके देश के माध्यम से जो आतंकवादी घटनाएं होती हैं, उन्हें वह जिहाद की संज्ञा देता है। संयुक्त राष्ट्र संघ में तो मोदी ने पाकिस्तान का नाम लेते हुए यह बात कही थी। इसलिए दावोस में मोदी अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद का उल्लेख किस संदर्भ में कर रहे हैं, यह समझने में किसी को भूल नहीं हुई होगी।
मोदी ने मानव सभ्यता के लिए तीसरा खतरा आत्मकेन्द्रित होने को बताया। यह संकेत विश्व के विकसित देशों की तरफ है जो सिर्फ अपना हित देखते हैं। इसी संदर्भ में मोदी ने भारत की प्राचीन विचारधारा का बार-बार उल्लेख किया और कहा कि जब तक हम 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संत निरामया और सर्वे पश्यंति भद्राणि की भावना नहीं रखेंगे, तब तक मानव सभ्यता को ऊपर नहीं उठाया जा सकता। हमारे भारत की भावना रही है कि सभी सुखी रहें, सभी निरोग रहें, सभी सज्जन बने लेकिन कुछ देशों की यह भावना नहीं है। वे अपना ही विकास चाहते हैं, अपने को ही सुखी रखना चाहते और अपने को ही निरोग रखना चाहते हैं। इससे वसुधैव कुटुम्बम की भावना नष्ट होती है। भारत ने इन भावनाओं को विस्तृत फलक पर देखा है। हमने वेल्थ अर्थात् धन के साथ वेलनेस (कल्याण) की भावना रखी है। हमारे पास पैसा है तो हम दूसरे की मदद भी करते हैं, दान देते हैं। मोदी ने दूसरे देशों को बाढ़ या भूकम्प जैसी आपदा के समय मदद करने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा इसी तरह हमने हेल्थ को होलनेस के साथ जोड़ा है अर्थात् स्वास्थ्य की रक्षा भी समग्रता के साथ होनी चाहिए। कुछ लोगों तक ही यह सीमित नहीं रहनी चाहिए। मोदी ने कहा कि पर्सपरिटी अर्थात् समृद्धि के साथ पीस अर्थात शांति नहीं होती तो मानव सभ्यता पतन की ओर जाएगी। इसलिए हमे समग्र मानव सभ्यता के बारे में आज सोचने की जरूरत है।
इस प्रकार मोदी ने दावोस में आर्थिक गतिविधियों को मानव सभ्यता के साथ जोड़कर दुनिया को एक नयी सोच दी। उन्होंने भारत में आर्थिक निवेश को आकर्षित करने के साथ भारत को विश्व का मार्गदर्शक बनाकर भी पेश किया और अपनी सरकार, अपनी पार्टी का उल्लेख भी किया। मोदी ने कहा कि आज के तीन साल पहले भारत के मतदाताओं ने पहली बार किसी एक पार्टी को सरकार बनाने का अवसर दिया जिसने बहुलतावादी देश में सबका साथ, सबका विकास का लक्ष्य अपने सामने रखा है। इसी लक्ष्य से भारत हर दिशा में प्रगति कर रहा है। दुनिया के देशों में जाति-धर्म के नाम पर झगड़े हो रहे हैं, इस संदर्भ को मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से उठाया और कहा कि हमे आगे आने वाली पीढ़ी को जवाब देना है तो मानव सभ्यता के सामने जो तीन बड़े खतरे हैं, उनका मिलजुलकर सामना करना होगा।

epmty
epmty
Top