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भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है

भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है और देश में निष्ठावान अर्थात् ईमानदार लोगों की संख्या घटती जा रही है। इस प्रकार देश में ईमानदार लोग विलुप्त प्रजाति के होते जा रहे हैं। देश में तमाम प्रजातियां हैं जो विलुप्त हो रही हैं, इसलिए उनके संरक्षण के लिए कानून बनाया गया है। विलुप्त प्रजाति के जानवरों, पक्षियों को पकड़ कर रखने, उनका शिकार करने पर प्रतिबंध है लेकिन वहां तो जंगल का मामला है। जंगल का अपना अलग कानून होता है। बहेलिये उन्हें नहीं पकड़ सकते, शिकारी उनका शिकार नहीं कर सकते लेकिन जंगल के कानून में ताकतवर का ही शासन चलता है।
पंजाब के इंफोर्समेन्ट डायरेक्टरेट (आईडी) के सहायक निदेशक निरंजन सिंह जालंधर में कार्यभार देख रहे थे और उस समय राज्य में ड्रग माफियाओं की सघन जांच हो रही थी। उस समय वहां पर भाजपा-अकाली दल की मिली जुली सरकार थी। निरंजन सिंह की गिनती ईमानदार अधिकारियों विलुप्तप्राय ईमानदारी की जाती है। उन्हांेने राज्य मंे ड्रग माफियाओं के संबंध तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुखवीर बादल और उनके साले विक्रम मजीठिया से होने के सुबूत जुटा लिये थे। इस मामले में मुख्य आरोपी जगदीश भोला था। उसी ने यह जानकारी दी थी। आईडी के सहायक निदेशक सबूतों को पुख्ता करके कोई कार्रवाई कर पाते, इससे पहले ही निरंजन सिंह का तबादला कोलकाता के लिए कर दिया गया। उनका तबादला यह कहकर किया गया कि वे बहुत ही योग्य अफसर हैं और पश्चिम बंगाल में शारदा चिटफण्ड घोटाले की जांच मंे उनके जैसे अफसर की जरूरत है। जगदीश भोला को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन विक्रम मजीठिया पर कोई आंच नहीं आयी। प्रकाश सिंह बादल की सरकार के समय 6 हजार करोड़ का यह ड्रग घोटाला हुआ था।
इस तरह के कई वाक्ये याद आते हैं जब हम इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी सुनते हैं कि ईमानदार लोग विलुप्त प्रजाति की तरह होते जा रहे हैं। इनका संरक्षण करना पड़ेगा। यह तो सच है कि हम यह नहीं कह सकते कि सभी भ्रष्ट हो गये हैं, लेकिन बढ़ती बेईमानी और भ्रष्टाचार पर हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है और देश में निष्ठावान अर्थात् ईमानदार लोगों की संख्या घटती जा रही है। इस प्रकार देश में ईमानदार लोग विलुप्त प्रजाति के होते जा रहे हैं। देश में तमाम प्रजातियां हैं जो विलुप्त हो रही हैं, इसलिए उनके संरक्षण के लिए कानून बनाया गया है। विलुप्त प्रजाति के जानवरों, पक्षियों को पकड़ कर रखने, उनका शिकार करने पर प्रतिबंध है लेकिन वहां तो जंगल का मामला है। जंगल का अपना अलग कानून होता है। बहेलिये उन्हें नहीं पकड़ सकते, शिकारी उनका शिकार नहीं कर सकते लेकिन जंगल के कानून में ताकतवर का ही शासन चलता है। बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। शेर उन जानवरों को भी खा सकता है जिन्हें हम संरक्षित करना चाहते हैं। इसके बाद भी हम उन विलुप्तप्राय प्रजातियों को सुरक्षित रखने में सफल हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि उनकी संख्या बढ़ रही है। हम इंसानों को जंगलराज में नहीं रहना है। यहां कानून का राज चलता है तो ईमानदारों को बचाकर रखना ज्यादा आसान होगा।
हाईकोर्ट ने इसका रास्ता भी बताया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट को यह टिप्पणी मेरठ विकास प्राधिकरण में प्लाट आवंटन के एक मामले को लेकर की थी। कोर्ट ने प्रमुख सचिव शहरी विकास को जांच में दोषी पाये गये अफसरों के खिलाफ विभागीय एवं आपराधिक कार्रवाई एक साल के भीतर पूरी करके दण्डित करने का निर्देश दिया और विकास प्राधिकरण में किये गये प्लाट के आवंटन को निरस्त करते हुए जांच विजिलेंस से कराने का आदेश दिया। कोर्ट ने सरकार से ईमानदारों और निष्ठावान लोगों को प्रोत्साहित करने की योजना पर अमल करने और भ्रष्टाचारियों को दंडित करने का निर्देश दिया। सरकार कोर्ट के इस निर्देश पर किस प्रकार अमल करेगी, यह तो भविष्य मंे ही बताया जा सकता है। कोर्ट की इस टिप्पणी में विशेष बात ईमानदारों को संरक्षण देने की है। यह तो सभी जानते हैं कि अपराध करने वालों को सजा दी जाती है। अपराध चाहे आर्थिक हो या सामाजिक उसका आरोप पुख्ता होने पर अदालत से सजा मिलती है। पुलिस अपराधी को गिरफ्तार करती है। ज्यादातर अपराधी इसलिए छूट जाते हैं क्योंकि उनके खिलाफ कोई गवाही नहीं देता और जो हिम्मत करता भी है, उसे रास्ते से हटा दिया जाता है। कोर्ट का आशय इस तरह के निष्ठावान और ईमानदारों की तरफ भी है। ईमानदारों को बचाने की तरफ अभी सरकार का ध्यान ही नहीं है क्योंकि सारा ध्यान बेईमानों और अपराधियों को पकड़ने पर लगा रहता है।
इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में पिछले दिनों देखा गया। यहां के इनायत नगर थाना क्षेत्र के पलिया प्रतापशाह गांव में लगभग एक वर्ष पहले चार युवकों ने जनकराज सिंह की जुबान ही काट डाली। उन्होंने कहा कि अब देखते हैं जितेन्द्र तिवारी हत्या के मुकदमे में तुम कैसे गवाही देते हो।
सवाल उठता है कि पुलिस भले ही इन आरोपियों को पकड़ कर थाने मंे बंद कर दे लेकिन क्या दूसरा कोई जनकराज सिंह सच बोलने की हिम्मत दिखा सकेगा। इस तरह के लोगांे की सुरक्षा करना भी उतना ही जरूरी है जितना आरोपी को गिरफ्तार करना आवश्यक है। स्थानीय पुलिस को इसका पहले से ध्यान रखना चाहिए था। अब शासन-प्रशासन लाख कहे कि गवाही देने वाले को पूरी सुरक्षा दी जाएगी लेकिन सिवाय अपनों को छोड़कर कोई गवाही देने नहीं जाएगा। यह बात किसी एक घटना से जुड़ी नहीं है बल्कि देश की व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार से नजदीकी ताल्लुक रखती है। कौन नहीं जानता कि उनके पड़ोस में नाजायज काम करने वाला आलीशान गाड़ी पर चल रहा है और बेशुमार दौलत का मालिक है लेकिन उसके गलत कार्यों के बारे मंे शिकायत करने की उसे हिम्मत नहीं पड़ती। बड़े-बड़े नेताओं-अफसरों के बारे मंे उंगली पर गिनने भर को जो शिकायतें की गयीं और कई मामलों मंे कार्रवाई भी हुई है तो इसमें राजनीतिक पहुंच के लोगों का 'दिखावटी साहस' रहा है। वे भी अपनों के भ्रष्टाचार के बारे में जुबान नहीं खोलते हैं।
आम जनता की बात छोड़ दीजिए, यह प्रवृत्ति ग्राम पंचायत से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद तक है। जनप्रतिनिधि बनते ही सम्पत्ति में तूफान की गति से इजाफा होता है। सरकारी-अर्धसरकारी विभागों के क्लर्क तक कमाऊ पद पर कोठियां खड़ी कर लेते हैं जिनके आय का हिसाब सरकार आसानी से लगा सकती है। व्यापार करने वालों के पास आमदनी छिपाने के रास्ते हैं लेकिन इनमंे से किसी की शिकायत जनता के बीच का ईमानदार नहीं कर सकता। नेताओं-अफसरों के बीच जो ईमानदार हैं, उनको तरह-तरह से परेशान किया जाता है। हरियाणा के एक ईमानदार अफसर अशोक खेमका का जिक्र करके हम इस आलेख का समापन कर रहे हैं क्योंकि यह बहुत विस्तृत विषय है। हरियाणा मंे अशोक खेमका ने श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के अनियमित जमीन सौदे का खुलासा किया था। उस समय केन्द्र में यूपीए की सरकार थी और हरियाणा मंे भी कांग्रेस के भूपेन्द्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अशोक खेमका को कई तरह से प्रताड़ित किया गया लेकिन ईमानदार को संरक्षण देने की बात उस समय भी देखने को नहीं मिली जब केन्द्र में की सरकार है और हरियाणा मंे भाजपा की। सहकारिता विभाग में अशोक खेमका को कई अनियमितताएं मिलीं थीं लेकिन उनका तबादला दूसरे विभाग में कर दिया गया।
इसलिए हाईकोर्ट इलाहाबाद की इस टिप्पणी पर हमे गौर करना पड़ेगा कि अब ईमानदार लोग विलुप्त प्रजाति के होते जा रहे हैं और उनके संरक्षण की जरूरत है।

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