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मनोभूमि को उर्वर बनाते प्रश्न :हृदयनारायण दीक्षित

मनोभूमि को उर्वर बनाते प्रश्न :हृदयनारायण दीक्षित

उपनिषद् अनूठे हैं। आनंद का ऐसा आख्यान भारत छोड़ अन्यत्र नहीं मिलता। प्राचीन यूनानी दर्शन में बेशक उपनिषदों जैसी अभिव्यक्तियां हैं। लेकिन वे ज्ञान की सूचना ही देती हैं और सूचना ज्ञान का पर्याय नहीं होती। भारतीय इतिहास के उत्तर वैदिक काल में सृष्टि और सृष्टि के रचनाकार पर तमाम जिज्ञासाएं थीं। तर्क थे, प्रतितर्क थे। प्रश्न ही प्रश्न थे। जीवन जगत् के रहस्य जान लेने की बेचैनी थी। यजुर्वेद के ऋषि तब तक 'प्रश्नो' की महत्ता बता चुके थे। वैदिक साहित्य में अनेक देवताओं की स्तुतियां हैं। ऋग्वेद के ऋषियों ने श्रद्धा व नमस्कार को भी देवता बताया था। यजुर्वेद के ऋषि ने 'प्रश्नों' को देवता बताया। ऐसा उचित भी है प्रश्न ही ज्ञान यात्रा के प्रेरक हैं। भारत की प्रश्न परंपरा अद्वितीय है। विश्व प्रसिद्ध गीता दर्शन भी अर्जुन के प्रश्नों का परिणाम है। उसके सैकड़ों वर्ष पहले कठोपनिषद् रची जा चुकी थी। इस उपनिषद् में नचिकेता नाम के एक युवक के प्रश्न हैं। काल के देवता यम द्वारा उनके प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। यम ने उन्हें सुयोग्य प्रश्नकर्ता बताया था। भारत की प्रज्ञा प्रश्नाकुलता में ही रमती रही है।
विज्ञान और दर्शन आधुनिक काल की आंखे हैं। प्रश्न है कि विज्ञान और दर्शन का जन्म कब हुआ? इनके विकास के मूल तत्व क्या हैं? विज्ञान और दर्शन का जन्म प्रश्नों के गर्भ से ही हुआ। हमारी जिज्ञासा है कि विश्व का पहला प्रश्न क्या था? आदिम मनुष्य वस्त्रहीन थे। गृहविहीन साधनहीन भी थे। जल प्राथमिक आवश्यकता है जीवन की। किसी ने अपने सहयोगी से ही पहला प्रश्न पूछा होगा पानी कहां है? चाल्र्स डारविन ने सृष्टि के विकास की खोज में आश्चर्यजनक परिश्रम किया था। उनके मन में अनेक प्रश्न थे। भाषा बोली के विकास को लेकर भी एक प्रश्न था। उन्होंने संभावना व्यक्त की है कि बोली को समझने की आवश्यकता यौन इच्छा को लेकर हुई है। दुनिया के प्राचीनतम शब्द साक्ष्य, ऋग्वेद के ऋषियों के मन में आए सैकड़ों प्रश्न हैं। एक मनोरम प्रश्न है कि सृष्टि में उगे प्रकाशपुंज को सबसे पहले किसने देखा- को ददर्श प्रथमं जायमान? इस प्रश्न का अंतिम भाग और भी सुंदर है- मैं यह बात नहीं जानता, जो जानते हैं वे कृपया उत्तर दें। यहां प्रश्न के साथ अपने अज्ञानबोध का सहज स्वीकार भी है। ऋग्वेद में ज्ञान की पूर्णता का दम्भ नहीं है। यहां सृष्टि रहस्य जानने की विनम्र जिज्ञासा है।
ऋग्वेद का नारदीय सूक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है। सृष्टि सृजन की जिज्ञासा वाले इस सूक्त की पूरी कथा प्रश्नाकुल है "जब न सत् था, न असत् था। न लोक थे। न रात्रि थी, न दिन। तब सबको आच्छादित करने वाला था क्या? कौन जानता है कि यह सृष्टि कहां से किस कारण आई? क्या सृष्टि का अध्यक्ष भी यह बात जानता है कि नहीं जानता?" यहां हजारों वर्ष प्राचीन भारतीय प्रश्नाकुलता की झांकी है। हम सब दैनिक जीवन में अनेक प्रश्नों से जूझते हैं- जैसे टेªन कितने विलम्ब से है? सहयोगी मित्र रास्ते में हैं, वे सड़क जाम में तो नहीं फंसे? घर के भीतर भी प्रश्नों का ही वातावरण रहता है - जैसे आज भोजन में क्या बना है? क्रिकेट के खेल में किसने कितने रन बनाए हैं? टी0वी0 में कौन सा धारावाहिक चालू है? पत्नी नाराज क्यों है? पत्नी के पास भी इसी तरह के अनेक प्रश्न हैं? इसी बहाने मैं अपने प्रश्न रख दूं तो कोई विषयांतर नहीं होगा। सुनता आया हूं कि अमुक को अच्छी नींद आती है? और अमुक को नींद नहीं आती। मेरा प्रश्न है कि क्या नींद कहीं बाहर से आती है? या नींद हमारी मनोरचना का ही परिणाम है? यह प्रश्न मुझे बेचैन करता है और बेचैनी व नींद में पुरानी शत्रुता है।
प्रश्नों से ऊबने वाले मित्रों के लिए शुभकामना है। वे प्रश्नहीन जीवन में आनंदमगन रहें लेकिन ऋग्वेद के एक कवि ने देवताओं से दिलचस्प स्तुति की है "हे देव! मुझे ऐसे मित्रों से दूर रखों जो प्रश्न और जिज्ञासा में रमण नहीं करते। ऋषि प्रश्नों में आनंदित न रहने वाले मित्रों से दूर ही रहना चाहता है। इसलिए निजी जीवन के दो दैनिक प्रश्नों के आनंद में आप सबको साझा देता हूं। मुझसे प्रतिदिन लगभग दो सौ लोग मिलते हैं। मैं घर के भीतर सहयोगी से प्रश्न करता हूं "जो आए हैं उनमें पीड़ित ग्रामीण कितने हैं? उनके प्रति मेरे मन में सहज प्रीति है। फिर पूछता हूं कि परिवार और पत्नी की बीमारी के प्रमाण पत्र सहित स्थानान्तरण कराने के लिए आए हुए भद्र महानुभावों की संख्या क्या है? बता दूं कि ऐसे लोगों से मैं चिढ़ता हूं। फिर पूछता हूं कि क्या आगंतुकों में कुछ पुराने मित्र या सहपाठी भी है?यदि हां तो संख्या क्या है? मैं इस श्रेणी के मित्रों से मिलकर ऊर्जा पाता हूं। पूरी संख्या में असुविधाजनक महानुभावों की संख्या ज्यादा होती है। मैं विवशतापूर्वक सबसे मिलता हूं। मुस्कराता भी हूं। अंतिम प्रश्न मैं स्वयं से करता हूं कि मैं अप्रिय को आदर क्यों देता हूं। प्रिय और श्रेयस्कर को ही आदर क्यों नहीं देता? यह प्रश्न काफी पुराना है लेकिन अनुत्तरित है।
प्रश्न हमारी मनोभूमि को किसान की तरह खोदते हैं। बार-बार हल चलाते हैं। मनोभूमि को उर्वर बनाते हैं। प्रश्न बीज पौध बनाते हैं, फिर कली फिर पुष्प और फिर बीज। बीज, पौध, कली, फूल और फिर बीज का चक्र प्रकृति के उद्भव वाले दिन से ही चल रहा है? प्रश्न स्वाभाविक ही है कि इस चक्रीय गतिशीलता की मूल ऊर्जा क्या है? सूरज लाखों बरस से ताप दे रहे हैं। ताप के लिए ईंधन की जरूरत होती है। प्रश्न उठता है कि इस ईंधन की मात्रा क्या है? क्या सूर्य के पास ईंधन का अनंत भंडार है? अनंत न हुआ तो क्या सूर्य का ईंधन किसी न किसी दिन समाप्त होने वाला है? प्रति प्रश्न पैदा होता है कि तब विश्व का क्या होगा? विज्ञान के इतिहास में ऐसी घटना के उल्लेख नहीं हैं लेकिन प्रश्नों का क्या? वे उगते, उठते हमारी मनोभूमि को बेचैन बनाया ही करते हैं। क्या प्रश्नाकुलता का विकास आधुनिक काल में ही हुआ है? मैं स्वयं उत्तर देता हूं कि नहीं। संसद और विधानमण्डलों में भी प्रश्नाकुल बेचैनी घटी है। संप्रति प्रश्न की तुलना में अपनी निजी बात जोरदार ढंग से या प्रायः चिल्लाकर कहने का चलन बढ़ा है।
भारत की प्रश्नाकुलता सहस्त्रों बरस पुरानी है। उत्तरवैदिक काल प्रश्नाकुल अग्निधर्मा है। उपनिषदों में गुरूकुल आश्रमों की चर्चा है। कह सकते हैं कि इन आश्रमों में प्रश्नों की खेती होती थी। वृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार गार्गी के प्रश्न से याज्ञवल्क्य भी तमतमा गए थे कि गार्गी ब्रह्म का कारण नहीं पूछते। यह अति प्रश्न है। भारत में प्रश्न थे, प्रति प्रश्न थे, अनुपूरक प्रश्न थे और अतिप्रश्न भी। कश्मीर आश्रम के पिप्पलाद महान तत्ववेत्ता थे। भारत में उनके तत्वज्ञान की धूम थी। ऋषि भरद्वाज के पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्री सौर्यायणी, कौशल निवासी आश्वलायन, विदर्भ के भार्गव और ऋषि कत्य के प्रपौत्र कबन्धी विद्वान तत्वखोजी थे लेकिन ब्रह्म आस्तिक थे। इन 6 महानुभावों ने पिप्पलाद के ज्ञान की प्रशंसा सुनी थी। तब चर्चा थी कि पिप्पलाद ब्रह्म तत्व के जानकार हैं। ब्रह्म जिज्ञासा की शांति के लिए छहो महानुभाव विनम्रतापूर्वक पिप्पलाद के आश्रम पहुंचे। पिप्पलाद ने उन्हें एक वर्ष तक आश्रम में रहने और एक वर्ष बाद प्रश्नों के उत्तर देने का आश्वासन दिया। सूर्य उगे, सूर्य गए। एक वर्ष बीत गया। छहो महानुभावों ने जीवन जगत से जुड़े 6 प्रश्न पूछे। पिप्पलाद ने उनके उत्तर दिये। इसी प्रश्नोत्तर से बनी प्रश्नोपनिषद्। प्रश्नोपनिषद् यानी प्रश्नों की उपनिषद्। आप सबके मन में स्वाभाविक ही प्रश्न होंगे कि वे प्रश्न क्या थे? उनके उत्तर क्या थे? इस प्रश्नोत्तर को समेटना यहां संभव नहीं। संप्रति इतना काफी है कि भारत में प्रश्नों की भी एक उपनिषद् है।

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