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भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं त्रिवेन्द्र सिंह रावत

भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं त्रिवेन्द्र सिंह रावत

उत्तराखण्ड में धर्म इन दिनों उफान पर है। यह ऐसा धर्म है जिस पर किसी को आपत्ति नहीं होती। सभी जाति-धर्म के लोग उत्तरायणी मेला हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं। उत्तर प्रदेश में भी बड़ी संख्या में पर्वतीय लोग रहते हैं और वे उत्तरायणी मेला धूमधाम से मनाते हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत कहते हैं कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं रावत को धर्मयुद्ध में अभी बहुत काम करने हैं। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने अभी सरकार को निर्देश दिया है कि सैकड़ों साल पुरानी राजस्व पुलिस की व्यवस्था को बदला जाना चाहिए। राज्य में राजस्व अधिकारी, जिनमे पटवारी तक शामिल हैं, को पुलिस का अधिकार मिला होता है। इस बारे में एक कहावत है जिसे सच्ची घटना बताया जाता है। एक बार जिलाधिकारी (डीएम) गांव का दौरा करने पहुंचे और गांव की एक असहाय वृद्धा को अपनी तरफ से सौ रुपये दिये। बुढ़िया बहुत प्रसन्न हुई और उसने डीएम को आशीर्वाद दिया 'भगवान तुम्हें पटवारी बना दें। दरअसल बुढ़िया के लिए पटवारी बहुत बड़ा पद था। अब भाजपा की नई सरकार इसमें बदलाव लाए, हाईकोर्ट की ऐसी इच्छा है।
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत गत दिनों गंगोली हाट स्थित जीआईसी मैदान में जन समस्याएं सुन रहे थे। उन्होंने कहा आने वाले दो महीने के भीतर प्रदेश के सभी अस्पतालों में डाक्टर तैनात हो जाएंगे। मार्च 2018 तक प्रत्येक जिले में चार से पांच नये चिकित्सा वाहन (108) उपलब्ध हो जाएंगे। प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को गंभीर बताते हुए उन्होंने कहा था कि विद्यालयों की क्लविंग की जा रही है। अगले वर्ष तक यह काम पूरा हो जाएगा। सरकार बच्चों को विद्यालयों तक पहुंचाने के लिए पुख्ता व्यवस्था कर रही है। राज्य में लड़के-लड़कियों के अंतर को कम किया जा रहा है। खेतों में सिंचाई के लिए लिफ्ट पेयजल योजनाएं शुरू हो रही है। इस प्रकार राज्य के विकास के लिए धर्म युद्ध लड़ा जा रहा है। मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ केन्द्र सरकार के फार्मूले पर चल रहे हैं लेकिन अभी लोकायुक्त की तैनाती नहीं हो पायी है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि तीन माह के अन्दर लोकायुक्त का गठन कर दिया जाए लेकिन अभी गठन नहीं हो पाया है। इससे राज्य सरकार पर दबाव पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को लोकायुक्त के गठन का निर्देश दिया था। लोकायुक्त विधेयक को विधानसभा की प्रवर समिति के सुपुर्द किया गया था। प्रवर समिति अपना प्रतिवेदन विधानसभा को सौंप चुकी है। प्रवर समिति के मुताबिक संशोधित लोकायुक्त विधेयक विधानसभा में पारित नहीं हो सका है। कांग्रेस इस मामले में इसलिए भी सक्रिय है क्योंकि उसी की सरकार ने लोकायुक्त विधेयक तैयार किया था लेकिन तब भाजपा ने उसका विरोध किया था और अब संशोधित करके पारित कराना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक रावत सरकार को यह विधेयक पारित कराना होगा।
इसके साथ ही उत्तराखण्ड के इको सेंसिटिव जोन के लिए तय किये गये मानक देश के मानकों से भिन्न है। इसके चलते सड़कें बनवाने और नयी फैक्ट्री लगाने में बाधा आती है। इकोसेंसिटिव जोन में पर्यावरण संरक्षण का विशेष ध्यान रखा गया है। सरकार इसमें बदलाव करना चाहती है। केन्द्र सरकार से लगातार इसको लेकर पैरवी की जा रही है। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री और सड़क परिवहन मंत्री भी राज्य सरकार से सहमत है। इस प्रकार सेंसिटिवजोन के मानकों में शिथिलता लाना भी मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत की प्राथमिकता में है। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट का राजस्व पुलिस को लेकर सुझाव भी प्रासंगिक है। अभी राज्य के 60 फीसद इलाके में राजस्व पुलिस का ही दबदबा है। पुलिस के प्रदेश मुखिया भी चाहते हैं कि राज्य की पुलिस को कानून-व्यवस्था का अधिकार मिलना चाहिए और पटवारी जैसे राजस्वकर्मी को गिरफ्तारी आदि करने से मुक्ति देकर उनसे राजस्व का काम ही लेना चाहिए। इस प्रकार के क्षेत्र हैं जहां मुख्यमंत्री को धर्म युद्ध लड़ना पड़ रहा है।

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