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शिक्षा के क्षेत्र में योगी सरकार का बड़ा कदम

शिक्षा के क्षेत्र में योगी सरकार का बड़ा कदम

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ की सरकार भाजपा के चुनाव के दौरान लिये गये संकल्प के अनुसार काम कर रही है। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य प्रदेश में पांच हजार अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोला जाना है। इसके अलावा प्रदेश में शिक्षा विभाग को देखने वाले उपमुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा ने भी शिक्षा क्षेत्र में कुछ ऐसे बदलाव करने की बात कही हैं जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षा सत्र के नियमित होने में मदद मिलेगी। डा. दिनेश शर्मा ने इस साल बोर्ड परीक्षाओं को नकल विहीन कराने की बात कही है और इसके लिए तैयारियां भी हो रही है। पूरे प्रदेश में एनसी ई आर टी पाठ्यक्रम लागू करने और परीक्षा नियत समय में कराने के साथ अगले शैक्षिक सत्र को अप्रैल से शुरू किया जाएगा। हालांकि इसके अलावा भी शिक्षा के क्षेत्र में कुछ समस्याएं हैं जिनमें से एक के बारे में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी आगाह किया है। यह मामला है शिक्षकों का एक साथ कई जगह नौकरी करना। इन सबसे शिक्षा प्रभावित होती है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है।
योगी की सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है कि उत्तर प्रदेश में पांच हजार अंग्रेजी माध्यम के स्कूल सरकारी स्तर पर शुरू किये जाएं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में अन्य समस्याओं के साथ एक बड़ी समस्या यह भी है कि वहां बच्चों को अंग्रेजी का ज्ञान प्राइमरी स्तर पर बिल्कुल नहीं हो पाता है। यही कारण है कि गांवों में भी अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूल बच्चों की भीड़ जुटा लेते हैं। वहां की व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं होती। शिक्षक - शिक्षिका को बहुत कम वेतन देकर तैनात कर लिया जाता है, फिर भी लोग अपने बच्चों को पढ़ाते हैं क्योंकि वहां से बच्चे कुछ न कुछ अंग्रेजी सीख ही जाते हैं। शुरू से मिला अंग्रेजी का ज्ञान आगे चलकर बहुत मददगार साबित होता है। यह देखा गया है कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में ज्यादा सफलता प्राप्त करते है? इसीलिए योगी ने यह फैसला किया है जो भविष्य के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है।
मुख्यमंत्री योगी के इस फैसले से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहमत नहीं है। पिछले दिनों लखनऊ में संघ के नेताओं की एक बैठक से यह बात सामने आयी थी। इस बैठक में आरएसएस के बड़े नेता दत्तात्रेय बोले, भाजपा और आरएसएस के समन्वयक डा. कृष्ण गोपाल, संगठन के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव शिवप्रकाश के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ, उपमुख्य मंत्री केशव प्रसाद मौर्य और उपमुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा भी मौजूद थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पाण्डेय और संगठन के सचिव सुनील बंसल ने भी अपने विचार रखे थे। संघ का मानना है कि प्राइमरी स्तर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी की जगह मातृभाषा जैसे मराठी, तेलुगू, हिन्दी, गुजराती आदि होना चाहिए। कुछ हद तक यह बात सही भी है क्योंकि मातृ भाषा में बच्चा ज्यादा समझ सकता है। इसके अलावा क्षेत्र विशेष में इससे अनावश्यक तनाव भी पैदा हो जाता है। जैसे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने दार्जिलिंग घाटी में बांग्ला भाषा को प्राइमरी शिक्षा से अनिवार्य करके नगा समुदाय को नाराज कर दिया था। इसके बावजूद अंग्रेजी की प्राइमरी स्तर से शिक्षा की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी डिजिटल इंडिया की बात कर रहे है तो इसके लिए भी अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है। मेरी समझ से मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ का यह प्रयास उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी साबित होगा लेकिन बच्चों को हिन्दी का भी पर्याप्त ज्ञान मिले, इसकी तरफ से भी आंख मूंदने से काम नहीं चलेगा। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों को हिन्दी का इतना लचर ज्ञान होता है कि कुछ कहते नहीं बनता। उनसे हिन्दी की गिनती 13 बोलो तो वे समझ ही नहीं पाएंगे और थर्टीन कहते ही समझ लेंगे। ऐसे हालात भी नहीं होने चाहिए।
उपमुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा शिक्षा विभाग देख रहे हैं। उन्होंने कहा है कि माध्यमिक शिक्षा परिषद में अगले सत्र में एनसीई आरटी का पाठ्यक्रम लागू हो जाएगा। माध्यमिक शिक्षा में पाठ्यक्रम की एकरूपता न होने से प्रतियोगी परीक्षाओं में दिक्कत आती है। प्राइमरी से लेकर माध्यमिक तक ही वास्तविक विषय ज्ञान होता है। इसके बाद तो उपाधियां मिलती हैं जैसे स्नातक, परास्नातक विधि, प्रबंधन आदि। प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा मंत्री के नाते डा. दिनेश शर्मा ने गतदिनों कहा था कि एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू करने के लिए हाई स्कूल स्तर पर सामान्य विज्ञान, विज्ञान एवं गणित विषय का चयन किया गया। इंटर मीडिएट स्तर पद भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान , जीव विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, नागरिक शास्त्र और समाज शास्त्र विषयों में यह पाठ्यक्रम लागू होगा। इसके लिए पुस्तकों को तय कर लिया जाएगा। एक जैसा पाठ्यक्रम होगा तो प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन भी उसी तरह किया जाएगा। समान पाठ्य क्रम से प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रतिस्पद्र्धात्मक दक्षता बनी रहेगी।
शिक्षा में गुणवत्ता का अभाव सबसे ज्यादा चिंतनीय रहा है। डा. दिनेश शर्मा कहते हैं कि भाजपा की सरकार जिस समय बनी थी, उसी दौरान बोर्ड की परीक्षाएं हो रही थीं। इसके बावजूद सरकार ने तत्काल कुछ कदम उठाये थे लेकिन पूरी तरह नकल विहीन परीक्षाएं नहीं करायी जा सकीं। इस बार यह प्रयास होगा कि परीक्षाएं नकल रहित हों। फर्जी छात्रों का प्रवेश रोकने के लिए कक्षा 9 और 11 में छात्रों का पंजीकरण आधार से लिंक कर दिया गया है। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं में नकल रोकने की पूरी तैयारी हो गयी है। परीक्षाएं सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में होंगी। उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी रोकने के लिए पचास जिलों में क्रमांकित कापियां भेजी जाएंगी। डा. शर्मा ने बताया कि इस बार पिछले वर्ष की तुलना में 2965 परीक्षा केन्द्र कम बनाये गये है, इससे वहां निगरानी रखने में आसानी होगी। इस प्रकार परीक्षाओं में छात्र-छात्राओं की प्रतिभा का सही मूल्यांकन हो सकेगा।
प्रदेश में शिक्षकों की भर्ती करने की बात भी कही गयी है क्योंकि पर्याप्त शिक्षक न होने से शिक्षण कार्य प्रभावित होता है। इसके अलावा शिक्षक अगर अपने दायित्व को ठीक से नहीं निभा रहे हैं, तब भी शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। शिक्षकों को लेकर एक गंभीर बात यह सामने आयी है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई शिक्षक कई जगह से वेतन ले रहे हैं। इन्हें एक तरह से 'भूत' शिक्षक कहा जा सकता है, अर्थात ऐसे शिक्षक जिनका वजूद तो एक है लेकिन नौकरी कई जगह कर रहे है। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में 80 हजार से ज्यादा ऐसे प्रोफेसर्स हैं जो एक साथ कई जगह पढ़ा रहे है। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने गत पांच जनवरी को आल इंडिया सर्वे आफ हायर एजूकेशन की वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि देश भर के विश्व विद्यालयों और महाविद्यालयों में लगभग 15 लाख अध्यापक कार्यरत हैं। इनमें 12.5 लाख अध्यापकों को आधार कार्ड से जोड़ा गया है अभी ढाई लाख अध्यापकों को भी आधार लिंक से जोड़ा जाएगा। आधार से जोड़ने पर ही पता चला कि 80 हजार से ज्यादा शिक्षक एक से ज्यादा महाविद्यालयों में नौकरी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी ऐसे शिक्षकों की पर्याप्त संख्या होगी।
योगी की सरकार इस पर भी गौर कर रही है। शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बदलना एक दम से तो असंभव है लेकिन इस दिशा में यदि प्रयास हो रहे हैं तो उम्मीद बंधती है। प्राइमरी से उच्च शिक्षा तक प्रयास तो शुरू हुए, यह कम संतोष की बात नहीं है।

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