जर्नलिस्ट धर्मेन्द्र बिल्लू - जब रियल धर्मेन्द्र ने किया रील धर्मेन्द्र की तरह बदमाशों का पीछा

जर्नलिस्ट धर्मेन्द्र बिल्लू  - जब रियल  धर्मेन्द्र ने किया रील धर्मेन्द्र की तरह बदमाशों का पीछा

मुज़फ्फरनगर । पत्रकारिता करना और खबर को उसके आयाम तक पहुंचाना ही एक श्रेष्ट पत्रकार की कला होती है। पत्रकार ही होता है जिसको समाज मे होने वाली हर घटना पर पैनी नजर रखनी पडती है । पत्रकारिता मे ना कोई छुटटी होती है और ना ही कोई त्योहार हर समय रात दिन काम ही काम । पत्रकार को एक डाकिया की भाति काम करना पडता है यहां की खबर को वहा तक पहुंचाना।

जनपद शामली के गांव डांगरोल मे एक छोटे किसान के सोमपाल सिंह के यहां 5 जुलाई सन् 1975 को जन्म लेने वाले धर्मेन्द्र बिल्लू आज किसी परिचय के मोहताज नही है। वर्तमान में मुजफ्फरनगर में रहकर पत्रकारिता कर रहे धर्मेन्द्र बिल्लू को बचपन में पत्रकारिता में कोई रूचि नही थी। इन्होनें कई जगह काम किया पर हर काम को यह मन न लगने के कारण छोड देते थे। जब धर्मेन्द्र बिल्लू 12 वर्ष के थे तब वह सिसौली में अपने मामा के यहां रहकर वह पढाई कर रहे थे। उस समय ही भारतीय किसान यूनियन का जन्म हुआ था। बचपन में धर्मेन्द्र बिल्लू ने भाकियू मसीहा महेन्द्र सिंह टिकैत के कार्यक्रमों इन्होनें भी किसानो के लिये खूब जय-जयकार की।



धर्मेन्द्र बिल्लू ने बताया कि वो पत्रकारिता से पूर्व बहुत से काम को करके छोड चुके थे। इनके बडे मामा अतर सिंह जो इण्डियन रेलवे कन्सट्रेक्सन कम्पनी में सडक निर्माण विभाग में कार्यरत थे। उनको देखकर धमेन्द्र को भी लगा कि उन्हें अपने मामा के साथ काम करना चाहिये । उन्होनें अपने मामा से आग्रह किया, तो मामा अतर सिंह द्वारा इनको लेवल ऑपरेटर के रूप में पहली नौकरी मिली। जिसमें सैलरी के रूप में 1400 रूपये मिलते थे। 6 माह नौकरी करने के बाद उनको परिवार की याद आने लगी। इसलिये इन्होनें लेवल ऑपरेटर की नौकरी छोड़ दी और घर वापस आ गये । उसके बाद धर्मेन्द्र बिल्लू ने दोबारा पढाई शुरू की और 12 वी तक शिक्षा ग्रहण की। बहुत से टेस्ट भी दिये पर सफलता हाथ नही लगी तत्पश्चात् धर्मेन्द्र बिल्लू ने सोचा कि क्यों न बैंक में नौकरी करने के लिये बैकिंग डिप्लोमा किया जाये इसके बाद धर्मेन्द्र बिल्लू पूना पहुंच गये वहां से बैकिंग डिप्लोमा करने की शुरूआत की पर वहां पर इनका मन नही लगा और बैकिंग डिप्लामों को आधा अधूरा छोड दिया और घर वापस आ गये। इसके बाद एक पैस्टीसाइड कम्पनी में काम शुरू किया वहां पर एक घटना घट जाने के कारण वह नौकरी भी इनको छोडनी पडी।


धर्मेन्द्र बिल्लू ने बताया कि बसपा सरकार में योगराज सिंह को जब मंत्री बनाया गया तो उन्होनें योगराज सिंह को देखकर राजनीति की बारिकियां भी सिखी और राजनीतिक गुण अपने अन्दर समाने का प्रयास किया। योगराज सिंह के यहां पत्रकारों को देखकर पहली बार धर्मेन्द्र बिल्लू को यह एहसास हुआ कि पत्रकारिता एक अच्छा पलेट फॅार्म है जिस पर वह अपनी जिन्दगी की रेल दौडा सकते है और आखिरकार धर्मेन्द्र बिल्लू ने वर्ष 2009 में टीवी 100 न्यूज चैनल से जिला प्रभारी के रूप में पत्रकारिता जगत में अपने जीवन की शुरूआत की। एक वो दिन था और एक आज का दिन है धर्मेन्द्र बिल्लू ने कभी पीछे मुडकर नही देखा और दिनो-दिन पत्रकारिता जगत में अपनी छाप छोडते हुए बुलन्दियों को छूते चले गये।



2013 दंगों के दौरान के अनुभव के बारे में धर्मेन्द्र बिल्लू ने बताया कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे जनपद ही नही और पूरे देश पर कलंक हैं। दंगो के दोरान न्यूज कवरेज करते हुए उन्हे यह अनुभव हुआ कि जब इस समय इतनी मार-काट मची हुई है तो 1947 में कितना बुरा हाल रहा होगा तब कितने लोगों की जाने गयी होगी इस बात का अंदाजा लगाने मात्र से ही रूह कांपने लगती है। 1947 के समय हिन्दू-मुस्लिम दंगे को जिन लोगो ने झेला होगा उन पर क्या बीती होगी यह तो वही जानते होगें।

मुजफ्फरगनर दंगो की अपने साथ घटी एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होनें बताया कि जब 7 सितम्बर 2013 नंगला मंदौड पंचायत न्यूज कवरेज करके जब वो वापस लौट रहे थे। तो कुछ लोगों ने उन्हे घेर लिया जहां से पुलिस द्वारा उन्हे सुरक्षित बाहर निकाला गया था वो पल इनकी जिन्दगी में एक ऐसा पल था उस समय इन्हे ऐसा लगा कि साक्षात मौत इनके सामने खडी थी। दंगो की न्यूज कवरेज के दौरान कई बार ऐसी स्थितियां भी आयी जब इनकी पिटाई तक भी हुई और इनके कैमरे तक भी तौड दिये गये मगर इन्होनें कभी हिम्मत नही हारी और पत्रकारिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण रूप से निर्वाह किया।




धर्मेन्द्र बिल्लू ने खोजी न्यूज को बताया कि एक बार रात को वो और उनके साथी पत्रकार प्रवेश मलिक व पत्रकार बिनेश पंवार के साथ रात्रि में कुछ जरूरी काम से तत्कालीन नई मण्डी इंस्पेक्टर बिनोद सिरोही के पास पहुंचे तो वह उस समय खाना खा रहे थे। अचानक उनके पास एक फोन आया तो उन्हे यह सूचना मिली कि कुछ बदमाशों ने हाईवे पर इनोवा गाडी लूट ली और गाडी लेकर फरार हो गये है। इस बात को सुनते ही इंस्पेक्टर हक्के-बक्के रह गये और खाना छोड दिया उस समय थाने में गाडी भी उपलबध नही थी धर्मेन्द्र बिल्लू को पता चला तो उन्होंने अपने मित्र की एक गाडी मंगा ली और इंस्पेक्टर के साथ वह तीनो भी गाडी मे बैठ लिये। पुलिस द्वारा लगातार सूचना फ्लैश की जा रही थी और लूटी गयी गाडी का नम्बर भी बताया जा रहा था। जब सब लोग जानसठ रोड पर जा रहे थे सहावली गंदे नाले के पास पहुंचते ही लूटी गयी गाडी कूकडा की तरफ से उनकी और मुडी तो धर्मेन्द्र बिल्लू की पैनी निगाहों ने उस गाडी का नम्बर पता होने के कारण पहचान लिया उन्होनें तुरंत अपनी गाडी उस गाडी के पीछे लगा दी और जानसठ फ्लाईओवर के नीचे ओवरटेक करते हुये गाडी को घेर लिया गया। जल्दी-जल्दी में इंस्पेक्टर मंडी अपना असलाह भी थाने में ही भूल गये थे। जिस कारण बदमाश गाडी को भागने में फिर से सफल हो गये। पुलिस और उनके द्वारा फिर से बदमाशों का पीछा किया गया आखिरकार बदमाशों के हौसले पस्त हो गये और वह शेर नगर के जंगल में गाडी छोडकर फरार हो गये और गाडी को पुलिस द्वारा बरामद कर लिया गया। इस बहादुरी भरे काम के लिये तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी द्वारा पहली बार धर्मेन्द्र बिल्लू को पुलिस मीटिग में बुलाया गया और धर्मेन्द्र बिल्लू के अलावा प्रवेश मलिक व बिनेश पंवार को पांच-पांच हजार के ईनाम से पुरुस्कृत किया गया।





धर्मेन्द्र बिल्लू कहते है - कई बार ऐसे भी दौर आये जब उनकी पुलिस के साथ भी झडप हुई कभी-कभी न्यूज कवरेज के दौरान पुलिस उनको रोकने का प्रयास करती थी मगर उन्होने अपने कदम कभी पीछे नही हटाये क्योंकि मीडिया समाज का आईना है। मीडिया का काम है वह समाज को पुलिस की हर कार्यशैली जनता के सामने प्रस्तुत करें। हालांकि उनका कभी ये ध्येय नही रहा कि वह पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह लगाये। आज की पत्रकारिता के सवाल पर धर्मेन्द्र बिल्लू ने जवाब देते हुए कहा आज के युग में पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के लिये नये-नये संस्थान खोले जा रहे है और नये-नवेले सपने दिखाये जा रहे है। बेरोजगार युवको को भी पत्रकारिता के क्षेत्र मे आने के लिये लालयित किया जा रहा है। जो गलत है पत्रकारिता के क्षेत्र मे उसे ही आना चाहिये। जो पत्रकारिता करने लायक हो। बिनेश पंवार को पत्रकारिता जगत में अपना गुरू मानने वाले धर्मेन्द्र बिल्लू ने बताया कि पहले छोटी-छोटी खबरों को भी पत्रकार बडी सावधानी के साथ प्रमाणिकता के आधार पर जांच प्रक्त कर आगे भेजते थे मगर अब ऐसा नही रहा गैर अनुभवी द्वारा खबर को बगैर पुष्टि किये अपने चैनल पर चला दिया जाता है या समाचार पत्र में छाप दिया जाता है जो पत्रकारिता के नाम पर कलंक का काम करती है।





धर्मेन्द्र बिल्लू ने मुजफ्फरगनर में पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी धर्मेन्द्र बिल्लू पत्रकारिता के लिये ही नही बल्कि एक रक्तदाता के रूप में अपनी एक पहचान रखते है इन्होनें अब तक 11 बार रक्तदान करते हुए लोगो के जान बचाने का काम किया है।























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