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क्या खिसक गया वोट बैंक

क्या खिसक गया वोट बैंक

हालिया लोकसभा चुनाव में महागठबन्धन की करारी हार के बाद विभिन्न राजनैतिक दलों को अब ये बात समझ आ रही है कि गठबन्धन में शामिल सपा, बसपा और रालोद अपने-अपने दलों के परम्परागत वोट उस क्षेत्र में जहां सहयोगी दल के प्रत्याशी मैदान में थे, उनके पक्ष में ट्रांसफर कराने में असफल रहे। इसी के चलते महागठबन्धन को हार का मुंह देखना पडा।

चुनावी नतीजों पर गौर करने के बाद राजनीतिक समीक्षक ही नहीं, बल्कि आमजन को भी यह बात पूरी तरह समझ में आ गयी है कि भले ही विरोधी विचारधारा और भिन्न सिद्धान्तों वाले राजनैतिक दलों ने शीर्ष स्तर पर सियासी गठजोड़ कर लिया था, लेकिन वे अपने पराम्परागत वोटर्स को समझाने में पूरी तरह विफल रहे या सीधी भाषा में कहें तो गठबन्धन के सहयोगी दलों ने पूरे और सच्चे मन से अपने परम्परागत वोटर्स को यह समझाने की कोशिश ही नहीं की कि जहां उनके दल का प्रत्याशी चुनावी मैदान में नहीं है, उन्हें गठबन्धन के सहयोगी दलों के प्रत्याशियों को वोट करना है।

पश्चिम यूपी में जाटों के वोटबैंक दम पर राजनीति करने वाली राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजीत सिंह जाट लैण्ड़ के रूप में विख्यात् मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से खुद चुनावी मैदान में थे इसके साथ ही उनका पुत्र और पार्टी का महासचिव जयंत चौधरी अपनी परम्परागत सीट बागपत से चुनावी समर में थे और सहयोगी दलों के परम्परागत वोट उनके पक्ष में रहे, जबकि उन्हीं का वोटबैंक जाट मतदाता बडी तादाद में उनसे छिटक जाने के कारण वे हार गये। इसका सीधा सा मतलब है कि बसपा का परम्परागत दलित वोट रालोद के पक्ष में ट्रांसफर न होकर भाजपा की झोली में चला गया और भाजपा का प्रत्याशी जीत गया। इसी तरह लोकसभा में बुरी तरह पराजित हुई सपा के प्रत्याशी जहां-जहां चुनावी मैदान में वहां भी मायावती अपने परम्परागत दलित वोटर्स को सहयोगी पार्टी के प्रत्याशियों के पक्ष में ट्रांसफर कराने में असफल रहीं या यूं कहें कि उन्होंने इसके लिए पूरे मन से कोशिश ही नहीं की और दलित वोटर्स सपा के साथ अपनी पुरानी दुश्मनी (गेस्ट हाऊस काण्ड़)को भुला नहीं पाया और भाजपा की झोली में चला गया। हालांकि अपनी समीक्षा बैठक में सबसे पहले गठबन्धन से किनारा करते हुए सहयोगी दलों पर अपने परम्परागत वोट बसपा के पक्ष में ट्रांसफर नहीं करा पाने का आरोप लगाया है।

इसी तरह जाट बाहुल्य लोकसभा क्षेत्रों में भी रालोद के बड़े और छोटे चैधरी भी अपने परम्परागत वोटर्स के मन से सपा के प्रति कालिख (कवाल काण्ड़) धोने में असफल रहे, जिसके चलते जहां-जहां गठबन्धन की सहयोगी सपा के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे, वहां-वहां जाटों का वोट सपा को नहीं मिला और भाजपा के खाते में चला गया। लगभग इससे मिलती-जुलती सच्चाई सपा के साथ भी जुड़ी हुई है। सपा का परम्परागत यादव वोट भी गठबन्धन के सहयोगी दलों को न जाकर भाजपा प्रत्याशियों की जीत का कारण बना है। बसपा मुखिया मायावती ने बिलकुल यही आरोप जड़ते हुए गठबन्धन से किनारा किया है।

हालांकि राजनीतिक जानकारों की मानें तो 17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में गठबन्धन का सबसे अधिक लाभ बसपा को ही मिला है। इसका सीधा सा प्रमाण है, वर्ष 2014 में एक भी प्रत्याशी के नहीं जीतने के कारण लोकसभा से बिलकुल गायब हो चुकी बसपा के दस प्रत्याशी जीतकर लोकसभा में पहुंचे हैं। आज स्थिति ये है कि लोकसभा में विपक्षी दलों में बसपा नम्बर पर पहुंच गयी है। मगर शायद मायावती जाहिरा तौर पर इससे संतुष्ट नहीं हैं, उनकी महत्वाकांक्षा कुछ अधिक ही है। या इसका दूसरा से सियासी मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि शायद वो ये समझ रही है कि मुस्लिम वोट जो कभी कांग्रेस से खिसक कर सपा से साथ जुड़ गया था, उसका समाजवादी से मोह कम हो गया है और यूपी के मुस्लिम वोटर्स का झुकाव बसपा की ओर हुआ है। शायद मुस्लिम वोटर्स का रिझाने की रणनीति पर मायावती पहले से काम कर रही थी, इसी के चलते बसपा ने सबसे ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशियों पर दांव खेला और बसपा के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचने वाले सांसदों में मुस्लिमों की संख्या अधिक है और अब वे आगामी विधानसभा चुनाव में मुस्लिम-दलित गठजोड़ के सहारे यूपी फतेह की योजना बना रही है।

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