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यूपी में पुलिस पर प्रहार, सख्ती करे तो अपराधी, पिटे तो पनिशमेंट

यूपी में पुलिस पर प्रहार, सख्ती करे तो अपराधी, पिटे तो पनिशमेंट

लखनऊ। रात के अंधेरे में सुनसान रास्तों और जंगलों में जान का जोखिम उठाकर अपराध उन्मूलन के लिए बदमाशों से लोहा लेते हुए सरकार का इकबाल बुलन्द करने वाली 'खाकी' आज खुद का वजूद बचाने के लिए पशोपेश में है। यूपी में 'एग्रीसिव पुलिसिंग' के सहारे सरकार की खूब वाहवाही हुई, लेकिन फर्ज की खातिर कुर्बानियों का इतिहास समेटने वाली यही 'खाकी' आज अपनों के साथ होटलों पर पिटती नजर आ रही है। थप्पड़ों की बरसात के साथ ही गालियां खाने के बाद भी विरोध तक नहीं करने वाली पुलिसकर्मियों को दोषी बनाकर व्यवस्था की बलि चढ़ाया जा रहा है। पिछले दिनों ही यूपी में कुछ ऐसा देखने को मिला, जिसने बुलन्द हौसले के परवाज भरती 'खाकी' का मनोबल गिरा और निचले स्तर पर पुलिस में 'बगावत' के सुर सुनाई दिये। आखिर वो क्या वजह है कि खाकी को पीटने वालों के साथ पूरा समाज खड़ा और अपने परिवार के बीच बेइज्जती झेलने वाले पुलिसकर्मियों को दोषी मानकर उन पर कार्यवाही की जा रही है। इसको लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश पुलिस में जांबाज पुलिस अफसरों और कर्मचारियों की कुर्बानियों की कहानियों की भरमार है। वर्तमान में यूपी में हर बार अपराध उन्मूलन में पुलिस ने गजब का जौहर दिखाने का काम किया। 'खाकी' को कानून व्यवस्था के लिए कीमत भी कम चुकानी नहीं पड़ी है। अगर बात मौजूदा सरकार के डेढ़ साल की करें तो पुलिस ने करीब 70 बदमाशों को एनकाउंटर में ढेर कर सरकार का इकबाल बुलन्द करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी, लेकिन इस डेढ़ साल में पुलिस की इस रिकार्ड उपलब्धि में अपनों को खोने का दर्द भी छिपा है। इन एनकाउंटर में कैराना में कुख्यात बदमाश साबिर जंधेड़ी से मुठभेड़ के दौरान बागपत निवासी सिपाही अंकित तोमर सहित चार पुलिसकर्मियों की शहादत हम देख चुके हैं। इनसे पहले बदमाशों से लोहा लेते हुए यूपी पुलिस में सेवा देने वाले इंस्पेक्टर गोविंद सिंह (मऊ), डिप्टी एसपी जिया उल हक (प्रतापगढ़), इंस्पेक्टर आरपी द्विवेदी (इलाहाबाद), आरक्षी दिनेश प्रताप व गिर्राज किशोर (फिरोजाबाद), आरक्षी सुभाष चन्द्र (बागपत), इंस्पेक्टर नीरज वालिया (हरदोई), इंस्पेक्टर राजकुमार सिंह (फर्रुखाबाद), आरक्षी सतीश यादव (फिरोजाबाद), डिप्टी जेलर अनिल त्यागी (बनारस), एसआई मनोज मिश्रा (बरेली), इंस्पेक्टर अनिल कुमार (प्रतापगढ़) और होमगार्ड महादेव प्रसाद मिश्र (प्रतापगढ़) अलग अलग मुठभेड़ों में अपना फर्ज निभाते हुए शहीद हो गये। इतना ही नहीं अपै्रल 2016 में मुठभेड में दादरी थाने में तैनात दरोगा अख्तर खान भी बदमाशों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गये। मूलरूप से अलीगढ़ के रहने वाले अख्तर खान वर्ष 1998 में बतौर सिपाही पुलिस में भर्ती हुए थे। साल 2012 में मऊ में कुख्यात बदमाशों की गोली से शहीद इंस्पेक्टर गोविंद सिंह की कुर्बानी भी लोगों को याद है। मूल रूप से वाराणसी के रहने वाले गोविंद कुख्यात अपराधी धीरज सिंह व उसके साथी के साथ हुई मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। खतौली कोतवाली में तैनात इंस्पेक्टर उदय प्रताप सिंह छह मार्च, 2006 को नावला कोठी के पास बदमाशों से हुई मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। यहां उनकी प्रतिमा स्थापित की गई थी। बदायूं के बिनावर थाना क्षेत्र के गांव घट बेहटी में दबिश के दौरान पुलिस टीम पर बदमाशों ने फायरिंग कर दी। गोली लगने से दारोगा सर्वेश यादव शहीद हो गए। वह मूल रूप से एटा जिले के बिधौलीकलां थाने के गांव अहरमई के रहने वाले थे। वहीं मेरठ के कंकरखेड़ा क्षेत्र में वाहन चेकिंग के दौरान दुर्घटना में शहीद हुए क्षेत्र के मुजफ्फरनगर जनपद के गांव लाक निवासी सिपाही रोहित दुर्घटनावश शहीद हो गये। पुलिसकर्मियों की शहादत की ये कहानियां केवल बानगी भर हैं, लेकिन जब एक पुलिस कर्मचारी बदमाशों की गोली का शिकार बनता है तो उसकी इस कुर्बानी को लेकर समाज में पलभर के लिए एक बेचारगी झलकती है, कुछ लोग उसकी शहादत पर भी सवाल खड़े करने लगते हैं, अब जबकि यही पुलिस कर्मचारी बदमाशों को आमने सामने की मुठभेड़ में ढेर करता है तो उसको प्रात्साहित करने से भी समाज मुंह फेर लेता है। हम ये नहीं कहते कि बेकसूर को एनकाउंटर के नाम पर मारा जाये, लेकिन पुलिस कर्मचारी के लिए समाज को मानवीय दृष्टिकोण से सोचना होगा। लखनऊ का विवेक तिवारी हत्याकांड सुर्खियों में है, एक पुलिस कर्मचारी की पिस्टल से चली गोली ने एक जान ले ली, जमकर हो हल्ला मचा, जब एक पुलिस कर्मचारी शहीद होता है तो हम उसको इंसाफ दिलाने, उसके परिवार की पीड़ा को हरने के लिए कितना आगे आ पाते हैं?

अब जब ये पुलिस अपनों के साथ होटलों में या रेस्टोरेंट में पहुंचते हैं तो इनके साथ दुव्र्यवहार होने पर उसकी प्रतिक्रिया व्यक्त करने पर इनको ही निशाने पर ले लिया जाता है। समाज हो या विभाग, शासन हो या प्रशासन सभी की नजरों में दोषी केवल पुलिस वाला, यूपी में दो ताजा उदाहरण हैं, मेरठ में एक भाजपा सभासद के रेस्टोरेंट में मुकदमें को लेकर चर्चा के बाद खाना खाने पहुंचे दरोगा को बुरी तरह से पीटा गया, इस पिटाई की वीडियो को वायरल कर दिया गया। कार्यवाही किस पर होनी चाहिए थी, लेकिन दरोगा को दबाव में लाइन हाजिर कर दिया। हालांकि भाजपा सभासद को भी जेल भेजा गया, लेकिन इस प्रकरण में पिटने वाले दरोगा का दोष क्या रहा, ये समझ से परे है? ऐसे ही एक मामले में लखनऊ में हलचल है। एडीजी लाॅ एण्ड आॅर्डर आनन्द कुमार के स्टाफ अफसर एएसपी राजेश सिंह के साथ भी होटल में ऐसा ही कुछ हुआ। वो अपने परिवार के साथ होटल में खाना खाने पहुंचे थे, कार में उनके बच्चे साथ थे। वो कार से उतर पाते इसी बीच उनकी कार पर किसी के द्वारा कुछ भारी चीज फेंककर मारने की आवाज हुई, इससे बच्चे डर गये। वो कार से उतरे तो वहांा कोई नजर नहीं आया। ये देखकर एएसपी राजेश सिंह रेस्टरोंट पर पहुंचे और वहां तैनात कर्मचारियों से इस होटल पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज दिखाने के लिए कहा, तो कर्मचारियों ने उनका परिचय लेने के बाद भी बदतमीजी की, ये देखकर एएसपी राजेश सिंह ने गोमतीनगर थाने फोन कर पुलिस बुला ली। इतने पर भी ये लोग पुलिस को सहयोग करने के बजाये, भिड़ने लगे। यहां भी मामला भाजपा नेता के आने पर बिगड़ा और इन लोगों ने एएसपी पर शराब के नशे में बवाल करने का आरोप लगाते हुए इसको राजनीतिक मुद्दा बना दिया। इसी प्रकार मेरठ में दरोगा रेस्टोरेंट मालिक की हर बदतमीजी बर्दाश्त करता रहा, उसके थप्पड़ और लात व गाली भी खाई, जबकि सरकार की ओर से आत्मरक्षा के लिए दी गयी उसकी पिस्टल उसकी कमर पर लटकी हुई थी, लेकिन यहां इस दरोगा ने अपनी मान सम्मान की रक्षा करने के बजाये पिटना ही मुनासिब समझा, क्योंकि उसके अंदर 'विवेक तिवारी कांड' का भय था। कहीं आत्मरक्षा में वो कुछ करे और 'अपराधी' बनाकर उसको जेल पहुंचा दिया जाये। ये स्पष्ट संकेत है कि विवेक हत्याकांड से पुलिस बैकफुट पर है।

इन घटनाओं से पुलिस का मनोबल टूटता नजर आ रहा है। विवेक तिवारी हत्याकांड में सिपाहियों पर कार्यवाही के बाद निचले स्तर पर पुलिस में उठे बागवती सुरों की हलचल हमने देखी है तो शासन उसे महसूस कर चुका है। ऐसे में यदि इस तरह सार्वजनिक स्थानों पर पुलिसकर्मियों के अपमानित होने के बाद भी 'खाकी' को ही बलि का बकरा बनाया जाता रहा, तो क्या अगले दिनों में यूपी में 'एग्रीसिव पुलिसिंग' बदमाशों के खिलाफ कायम रह पायेगी। इन घटनाओं को देखा जाये तो ऐसा नजर आता है कि पुलिस कर्मचारी एक साफ्ट टारगेट बने हुए हैं। यहां ये भी सवाल उठते हैं कि आखिरकार होटल-रेस्टोरेंट चालक कितने शरीफ हैं। उनके होटल मानकों के लिहाज से कितने सही हैं? भले ही पुलिस यूपी में बदमाशों पर हावी है, लेकिन हकीकत ये है कि पुलिस अपना फर्ज निभाते हुए जान जोखिम में डालकर बदमाशों को मारे तो 'अपराधी' और यदि 'खाकी' पर हाथ डालकर पीटने वालों का विरोध करे तो भी मुल्जिम की तरह कठघरे में खड़ी नजर आती है।

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