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हैदराबाद की हवा में वामपंथ का चिंतन

हैदराबाद की हवा में  वामपंथ का चिंतन

दक्षिण भारत की हवा सुगंधित है लेकिन विद्रोही स्वभाव भी रखती है। वहां चंदन के जंगल हैं जिनमें भुजंग लिपटे रहते हैं। इस तरह के वातावरण से राजनीति कैसे अछूती रह सकती है। आजादी के कुछ ही वर्ष बाद दक्षिण भारत में स्थानीय राजनीति ने वर्चस्व स्थापित कर लिया और कांग्रेस को बाहर कर दिया। अब कांग्रेस का युग खत्म हो गया और भाजपा का शुरू हुआ है तो चन्द्रबाबू नायडू की बगावत सामने आ गयी है। तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना में स्थानीय दल ही काबिज हैं। देश में वामपंथ का कभी अच्छा प्रभाव था लेकिन वे तीन गढ़ों तक ही सीमित रह पाये और अब तो सिर्फ केरल बचा है। पश्चिम बंगाल को बहुत पहले सुश्री ममता बनर्जी ने छीन लिया था। इसी साल हुए विधानसभा चुनावों में त्रिपुरा को भाजपा ने छीन लिया। इसलिए वामपंथ की सबसे बड़ी पार्टी माकपा ने चिंतन के लिए हैदराबाद को चुना। यहां पर 18 अप्रैल से माकपा पोलित ब्यूरो की आम बैठक में इस बात पर विचार किया जा रहा है कि वामपंथ को कैसे मजबूत किया जाए। माकपा ने 2004 में जब यूपीए से समझौता किया था, उस समय उसके पास सबसे ज्यादा 43 सांसद थे लेकिन अगले लोकसभा चुनाव अर्थात् 2009 में माकपा ने यूपीए का साथ छोड़ दिया, तब उसके पास सिर्फ 15 सांसद रह गये थे। भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा तब माकपा को सिर्फ नौ सांसद मिले थे और मौजूदा समय में हालात ये हैं कि राज्यसभा में भी माकपा के पास सिर्फ पांच सांसद बचे हैं।
इन हालात पर माकपा आगामी 22 अप्रैल तक क्या फैसला करती है, यह बैठक के बाद ही पता चलेगा लेकिन पार्टी के अंदर मतभेदों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि पार्टी किसी ठोस नतीजे पर पहुंचेगी। बैठक में प्रमुख एजेण्डा यही रहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में माकपा को क्या रणनीति अपनानी चाहिए। त्रिपुरा में भाजपा के हाथों परजय के बाद पार्टी के नेता इस बात को तो एकमत होकर स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें भाजपा का मुकाबला करना है लेकिन इस मुकाबले के लिए क्या कांग्रेस समेत सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों से हाथ मिलाया जाए अथवा कांग्रेस को छोड़कर अन्य दलों का सहयोग लिया जाए। इसके अलावा यह भी विचार हो रहा है कि सीपीएम को अपने दम पर भाजपा का मुकाबला करना चाहिए। माकपा इस मामले में दो भागोें में स्पष्ट रूप से विभाजित नजर आती है। माकपा पोलित ब्यूरो के मौजूदा महासचिव सीताराम येचुरी का मानना है कि हमें कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा का मुकाबला करना चाहिए लेकन पोलित ब्यूरो के पूर्व महासचिव प्रकाश करात इससे सहमत नहीं हैं। वह चाहते हैं कि अकेले दम पर मुकाबला हो।
माकपा पोलित ब्यूरो के महासचिव सीताराम येचुरी के समर्थक बढ़ते जा रहे हैं। इसके बावजूद मतभेद को समाप्त नहीं माना जा सकता। हैदराबाद में बैठक के दौरान महाराष्ट्र के एक प्रतिनिधि ने इसी मामले पर गुप्त मतदान कराने की मांग उठा दी। हालांकि माकपा की बैठक में किसी फैसले के लिए यह अनोखी मांग है। गुप्त मतदान को लेकर भी चर्चा हो रही है। माकपा की कांग्रेस (बैठक) में इस तरह की मांग कभी की नहीं गयी थी, इसलिए सभी लोग आश्चर्यचकित थे। हालांकि महाराष्ट्र के उस सदस्य ने जब हाल ही में वहां किसानों के प्रदर्शन का जिक्र किया तो सभी ने उसकी बात को गंभीरता से लिया। महाराष्ट्र के प्रतिनिधि ने कहा कि माकपा की किसान शाखा अखिल भारतीय किसान सभा उस प्रदर्शन मंे प्रमुख थी। अखिल भारतीय किसान सभा ने राजनीतिक सरोकारों से ऊपर उठकर किसानों को एकजुट करने में सफलता प्राप्त कर ली। माकपा किसानों'-मजदूरों की पार्टी मानी जाती है और हमारी किसान सभा ने सभी वर्ग के किसानों को मुंबई पहुंचा दिया था। इसलिए यदि पार्टी ने धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के बीच फर्क किया तो इस मौके का फायदा भाजपा उठाएगी। इस प्रकार महाराष्ट के उस माकपा प्रतिनिधि ने सीताराम येचुरी की रणनीति का ही समर्थन किया है और उसने गुप्त मतदान की बात भी इसीलिए कही है ताकि सभी लोगों की राय स्वतंत्र रूप से जानी जा सके। इसका मतलब कई लोग अपनी बात खुलकर नहीं कह पा रहे हैं।
महाराष्ट्र के इस प्रतिनिधि ने सीताराम येचुरी की राय के अनुसार ही गुप्त मतदान का मुद्दा उठाया जबकि माकपा के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि संशोधनों को शामिल करने के लिए गुप्त मतदान कराया जाए। माकपा की इस कांग्रेस में करीब एक हजार प्रतिनिधि और आमंत्रित सदस्य हिस्सा ले रहे हैं और 22 अप्रैल को ही कोई नतीजा मालूम होगा। माकपा के पूर्व महासचिव प्रकाश करात और उनके समर्थक कांग्रेस के साथ किसी प्रकार के तालमेल के खिलाफ है लेकिन माकपा के अन्य सदस्य यह भी जानते हैं कि पार्टी ने 2004 में यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देकर गलती की थी और कई नेता चाहते थे कि माकपा को सरकार में शािमल होना चाहिए। इसी तरह जब 2009 में माकपा ने यूपीए से अलग होने का फैसला किया तब भी कई नेता इसके खिलाफ थे। प्रकाश करात जैसे नेता ही यूपीए से अलग होने के निर्णय में अगुवाई कर रहे थे। माकपा के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी ने इसका खुलकर विरोध भी किया और पार्टी के निर्देश को ठुकराते हुए वे यूपीए सरकार में लोकसभा के अध्यक्ष बने रहे थे। सोमनाथ बाबू का फैसला सही माना गया था और उस चुनाव में माकपा 43 सांसदों से फिसलकर 15 सांसदों पर आ गयी थी। इसलिए माकपा को इस तरह की रणनीति बनानी होगी जिससे उसके सांसद बढ़ें और इसके लिए ज्यादा समय नहीं बचा है, गुप्त मतदान की मांग पर विचार करने के लिए संचालन समिति ही अधिकृत है जिसका चुनाव पार्टी कांग्रेस द्वारा किया जाता है। हालांकि येचुरी कहते हैं कि हमारी कांग्रेस में सामान्य चलन यही है कि यदि कोई व्यक्ति संशोधन पर जोर देता है तो मतदान कराया जाता है सामान्य स्थिति में संचालन समिति सभी संशोधनों पर विचार करती है और पार्टी कांग्रेस को प्रस्ताव देती है।
माकपा के सामने दिक्कतें हैं क्योंकि भाजपा के खिलाफ कथित धर्मनिरपेक्ष दलों में तृणमूल कांग्रेस भी शामिल है और पश्चिम बंगाल में उसी से उनका मुकाबला होता है। कांग्रेस भी त्रिपुरा और केरल में मुख्य विपक्षी दल थी इसके बावजूद माकपा ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इसलिए सीताराम येचुरी के रुख का समर्थन करने वाले प्रतिनिधियों का यह भी कहना है कि बगैर किसी चुनावी गठबंधन के कांग्रेस के साथ तालमेल के दरवाजे खुले रखे जाएं अर्थात् अभी कोई गठबंधन न हो और गैर कांग्रेस, गैर भाजपाई दलों से सम्बन्ध बढ़ाकर बड़ा मोर्चा बनाया जाए लेकिन कांग्रेस को भी साथ लाने की बात कही जाए। इस प्रकार कांग्रेस से तालमेल के दरवाजे खुले रहेंगे। येचुरी के इन समर्थकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखण्ड इकाइयों के लोग भी यही चाहते हैं। उधर, कांग्रेस से किसी प्रकार का समझौता न करने वाले प्रकाश करात के समर्थक कहते हैं कि आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के वामपंथी चाहते है पार्टी अकेले दम पर भाजपा का मुकाबला करे।
बहरहाल, अभी तक हाथ उठाकर और मुट्ठी तानकर लाल झंडा वाले अपने फैसले करते रहे है लेकिन आंध्र प्रदेश की हवा का असर ऐसा पड़ा कि उन्हें गुप्त मतदान के बारे में भी सोचना पड़ रहा है। यहां पर चन्द्रबाबू नायडू की राजनीति भी कुछ इसी तरह की रही है कि कूटनीति के बिना सत्ता नहीं हासिल की जा सकती है। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी में यही कूटनीति चल रही है। देखना यह है कि माकपा को उबारने का श्रेय कौन ले जाता है?

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