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श्रीलंका की सत्ता फिर महिन्द्रा को

श्रीलंका की सत्ता फिर महिन्द्रा को

नई दिल्ली। देश के साथ ही विदेश में भी जिस नेतृत्व की धाक जम जाती है, जनता की नजर में वही हीरो होता है। श्रीलंका में महेन्द्रा राजपक्षे ने भी अपने देश को तो संभाला ही है, साथ ही उनकी विदेश नीति भी राष्ट्र के सम्मान को बढाने वाली रही है। जनता ने आम चुनाव में इसी बात को ध्यान में रखते हुए फैसला दिया है। श्रीलंका में तमिलों की संख्या भी चुनावी समीकरण बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। महिंदा राजपक्षे का भारत के प्रति नजरिया सकारात्मक रहा है। श्रीलंका के प्रभावशाली राजपक्षे परिवार द्वारा नियंत्रित श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) ने मतगणना के शुरुआती परिणामों में ही बढत हासिल कर ली थी। उसी समय एसएलपीपी संसदीय चुनाव में भारी जीत की ओर अग्रसर थी। सिंहली बहुल दक्षिण क्षेत्र से 6 अगस्त तक पांच परिणामों की घोषणा की गयी थी। इनमें एसएलपीपी को 60 प्रतिशत से अधिक मत मिले थे। दूसरे दिन साफ हो गया कि महिन्द्रा राजपक्षे ही फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे।एसएलपीपी की निकटतम प्रतिद्वंद्वी एक नयी पार्टी है जिसकी स्थापना सजीथ प्रेमदासा ने की है। प्रेमदासा ने अपनी मूल पार्टी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) से अलग होकर नयी पार्टी बनायी है। चुनाव परिणामों के अनुसार यूएनपी चैथे स्थान पर है। आधिकारिक परिणामों से पता चलता है कि मार्क्सवादी जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) ने भी यूएनपी की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। तमिल बहुल उत्तर क्षेत्र में, मुख्य तमिल पार्टी को जाफना में एक क्षेत्र में जीत मिली है जबकि राजपक्षे की सहयोगी ईलम पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (ईपीडीपी) ने जाफना जिले के एक अन्य क्षेत्र में तमिल नेशनल एलायंस (टीएनए) को हराया है।

श्रीलंका संसदीय चुनाव के परिणाम की घोषणा हो गई। चुुनाव में श्रीलंकाई राष्ट्रपति गोताबाया राजपक्षे और उनके गठबंधन की पार्टी को जीत मिली है। इस गठबंधन को दो तिहाई बहुमत मिला है। इस बहुमत के जरिए पार्टी संविधान में संशोधन की शक्ति प्राप्त हो गई है। श्रीलंका के संसदीय चुनाव में श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) और उसके सहयोगियों ने दो तिहाई बहुमत से जीत हासिल की है। देश की 225 सदस्यीय संसद में एसएलपीपी और उसके सहयोगियों ने 150 सीटों पर जीत दर्ज की है। कोरोना वायरस महामारी के बीच श्रीलंका में 5अगस्त 2020 को आम चुनाव हुए थे । हमारे देश में उसी दिन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन हो रहा था। भूमि पूजन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों से सम्पन्न हो रहा था। देश भर की निगाहें अयोध्या पर टिकी थीं । ऐसे मौके राजनीति में कभी कभी ही मिलते हैं। इसलिए पीएम नरेन्द्र मोदी ने भूमि पूजन के बाद संबोधित भी किया। मोदी जी वैश्विक राजनय का बहुत सम्मान करते हैं, इसलिए श्रीलंका के संसदीय चुनावों को भारत की मीडिया भले ही तरजीह नहीं दे रही थी लेकिन पीएम मोदी की नजर वहां भी थी और जैसे ही 6 अगस्त को चुनाव नतीजों ने संकेत दिया कि महिन्द्रा राजपक्षे की पार्टी जीत की तरफ आगे बढ रही है, मोदी जी ने फौरन राजपक्षे को बधाई दी। यह बधाई इस बात के लिए भी थी कि कोरोना जैसी महामारी के बीच श्रीलंका में चुनाव सम्पन्न हो गये ।

श्रीलंका में इससे पहले दो बार महामारी के कारण चुनाव टाल दिए गए थे। गोटबाया राजपक्षे ने चुनाव से पहले ही दो तिहाई बहुमत से जीत का भरोसा जताया था। वे बतौर राष्ट्रपति अपनी शक्तियों को बढ़ाना चाहते हैं ताकि वे संविधान में बदलाव कर पाएं। उनका कहना है कि संविधान में बदलाव कर वे छोटे से देश को आर्थिक और सैन्य रूप से सुरक्षित कर पाएंगे। इन नतीजों के बाद पूरी संभावना है कि वे अपने बड़े भाई और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को दोबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाएंगे। दोनों भाइयों को 2009 में एलटीटीई को देश से खत्म करने के लिए जाना जाता है। चरमपंथी संगठन एलटीटीई अल्पसंख्यक तमिलों के लिए अलग राज्य के लिए लड़ाई लड़ रहा था और 2009 में जब गृहयुद्ध खत्म हुआ तो उस वक्त महिन्द्रा राजपक्षे राष्ट्रपति थे। उन पर यातना और आम नागरिकों की हत्या के आरोप भी लगे हैं। इसके बावजूद श्रीलंका की जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया। चुनाव आयोग द्वारा जारी टैली के मुताबिक, 225 सदस्यों वाली संसद में श्रीलंका पोदुजना पेरामुना और गठबंधन ने 150 सीटों पर जीत दर्ज की है। राष्ट्रपति राजपक्षे को संसद में दो तिहाई बहुमत मिलने से वे काफी ताकतवर हो गए हैं। उनका कहना है अब वे आर्थिक और सैन्य रूप से देश को सुरक्षित करने का अपना एजेंडा लागू कर सकते हैं। मतदान 5अगस्त को हुआ था। मतों की गिनती अगले दिन सुबह शुरू हुई। मतों की गिनती शुरू होते ही एसएलपीपी के संस्थापक बेसिल राजपक्षे ने कहा कि पार्टी नयी सरकार बनाने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसी दिन श्रीलंकाई समकक्ष महिंदा राजपक्षे को उनकी पार्टी के संसदीय चुनाव में शानदार प्रदर्शन के लिए बधाई दी। श्रीलंका के प्रभावशाली राजपक्षे परिवार द्वारा नियंत्रित श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) घोषित किए गए शुरुआती परिणामों के अनुसार संसदीय चुनाव में भारी जीत की ओर अग्रसर थी। मोदी ने ट्वीट कर कहा, ''आपसे बात करना सुखद रहा। एक बार फिर आपको बहुत सारी शुभकमनाएं। हम साथ मिलकर द्विपक्षीय रिश्ते को आगे बढ़ायेंगे और अपने रिश्तों को नई ऊंचाई पर पहुंचाएंगे। आधिकारिक परिणामों से पता चलता है कि मार्क्सवादी जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) ने भी यूएनपी की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। तमिल बहुल उत्तर क्षेत्र में, मुख्य तमिल पार्टी को जाफना में एक क्षेत्र में जीत मिली है जबकि राजपक्षे की सहयोगी ईलम पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (ईपीडीपी) ने जाफना जिले के एक अन्य क्षेत्र में तमिल नेशनल एलायंस (टीएनए) को हराया है। बेसिल राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे के छोटे भाई हैं। प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे उनके सबसे बड़े भाई हैं। राष्ट्रपति को उम्मीद है कि वह संविधान में संशोधन करते हुए राष्ट्रपति पद की शक्तियों को बहाल कर सकेंगे।ध्यान रहे 2015 में संविधान में संशोधन करते हुए राष्ट्रपति के अधिकारों में कटौती की गयी थी। उस समय श्रीलंका की संसद ने राष्ट्रपति की शक्तियों को कम करने और राष्ट्रपति के कार्यकाल को दो बार तक सीमित करने से जुड़ा एक अहम संशोधन पारित किया है।तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना ने चुनाव के दौरान इस

संशोधन को लागू करने का वादा किया था। पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने सत्ता में रहते हुए अपनी शक्तियों में काफी इजाफा कर लिया था। उन्हें जनवरी 2015 में हुए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। उनके बाद मैत्रिपाला सिरीसेना ने सरकार बनाते ही भ्रष्टाचार के खघ्लिाफ मुहिम छेड़ दी थी। राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना के समर्थकों ने संसद भंग करने के राष्ट्रपति के अधिकार को खघ्त्म करने के पक्ष में भी वोट कियाथा। अब बाजी पलट गयी है।गोतबाया राजपक्षे राष्ट्रपति के अधिकारों में उसी तरह से फिर बढोत्तरी कर सकते हैं।

महिंदा राजपक्षे ने 2010 में राष्ट्रपति चुने जाने के दौरान पुलिस, लोक सेवा और न्यायपालिका से आगे जाकर अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए शीर्ष जजों को नियुक्त कियाथा।महिंदा राजपक्षे साल 2010 में दोबारा राष्ट्रपति चुने गये थे। इसके बाद राष्ट्रपति के दो कार्यकाल की सीमा खत्म कर दी थी और इसी साल उन्होंने तीसरी बार चुनाव लड़ा था जिसमें उन्हें सिरिसेना से शिकस्त झेलनी पड़ी।

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

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