Top

आओ समाज को नशामुक्त बनायें, 26 जून अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस विशेष......

आओ समाज को नशामुक्त बनायें, 26 जून अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस विशेष......

नशा! एक ऐसी बीमारी है जो कि युवा पीढ़ी को लगातार अपनी चपेट में लेकर उसे कई तरह से बीमार कर रही है। नशीली वस्तुओं और पदार्थों के निवारण हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसम्बर 1987 को प्रस्ताव संख्या 42/112 पारित कर हर वर्ष 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस मनाने का निर्णय लिया था। समाज में दिन-प्रतिदिन शराब, मादक पदार्थों व द्रव्यों के सेवन की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोकने के लिए सामाजिक न्याय विभाग द्वारा अभियान चलाया गया। इस आयोजन का उद्देश्य समाज में बढ़ती हुई मद्यपान, तम्बाकू, गुटखा, सिगरेट की लत एवं नशीले मादक द्रव्यों, पदार्थों के दुष्परिणामों से समाज को अवगत कराना था।

अगर सिगरेट पीना आपके शौक और जीवनशैली का हिस्सा है, तो सावधान हो जाइए। सिगरेट का यह शौक सिर्फ आपकी सेहत का ही दुश्मन नहीं है, बल्कि आपको नपुंसक भी बना सकता है। यह बात शोधकर्ताओं द्वारा इस पर किए गए शोध में साफ हुई है। यह शोध बीजेयू इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित भी हो चुका है। रिपोर्ट के अनुसार सिगरेट या अन्य धूम्रपान का सेवन पुरुषों के लिए अत्यधिक खतरनाक है। इससे पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या में कमी आ सकती है। इससे शुक्राणुओं का डीएनए तक पूरी तरह से नष्ट हो सकता है।






संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में भारत भी हेरोइन का बड़ा उपभोक्ता देश बनता जा रहा है। 2001 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में भारतीय पुरुषों में अफीम सेवन की उच्च दर 12 से 60 साल की उम्र तक के लोगों में 0.7 प्रतिशत प्रति माह देखी गई। अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस के अवसर पर मादक पदार्थ एवं अपराध से मुकाबले के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का कार्यालय यूएनओडीसी एक नारा देता है। आज देश में शराब का सेवन करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, साथ ही बढ़ रही है मद्यपान के कारण मौत से जूझने वालों की संख्या। 15 से 20 प्रतिशत भारतीय आज शराब पी रहे हैं। 20 साल पहले जहाँ 300 लोगों में से एक व्यक्ति शराब का सेवन करता था, वहीं आज 20 में से एक व्यक्ति शराबखोर है।

कुछ बच्चे फेविकोल, तरल इरेजर, पेट्रोल कि गंध और स्वाद से आकर्षित होते हैं। कई बार कम उम्र के बच्चे आयोडेक्स, वोलिनी जैसी दवाओं को सूंघकर इसका आनंद उठाते हैं। कुछ मामलों में इन्हें ब्रेड पर लगाकर खाने के भी उदाहरण देखे गए हैं। कई बार तो बच्चे घर के ही सदस्यों से नशे की आदत सीखते हैं। उन्हें लगता है कि जो बड़े कर रहे हैं, वह ठीक है। लोग सोचते हैं कि वे युवा नशा कैसे करेंगे जिनके पास खाने को भी पैसा नहीं होता है। आपको जानकर शायद ताज्जुब हो कि नशा करने के लिए सिर्फ मादक पदार्थों की ही जरूरत नहीं होती बल्कि वाइटनर, नेल पॉलिश, पेट्रोल आदि की गंध, ब्रेड के साथ बाम जैसी चीजों से भी लोग नशा करते हैं, जो बेहद खतरनाक होता है।

मादक पदार्थों के नशे की लत आज के युवाओं में तेजी से फैल रही है। कई बार फैशन की खातिर दोस्तों के उकसावे पर लिए गए ये मादक पदार्थ अक्सर जानलेवा होते हैं। नशे के लिए उपयोग में लाई जानी वाली सुइयाँ एचआईवी का कारण भी बनती हैं।

महिलाओं में नशे की प्रवृत्ति का आना समस्या की गंभीरता दर्शाता है। पिछले दो दशकों में मद्यपान करने वाली महिलाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। विशेष कर उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग की महिलाओं में यह एक फैशन के रूप में आरंभ होता है और फिर धीरे-धीरे आदत में शुमार होता चला जाता है। सर्वेक्षणों की मानें तो करीब 40 प्रतिशत महिलाएँ इसकी गिरफ्त में आ चुकी हैं। महानगरों और बड़े शहरों की कामकाजी महिलाओं के छात्रावासों में यह बहुत ही आम होता जा रहा है।

अमेरिका में किए गए अनुसंधानों से पता चला है कि गर्भपात का खतरा शराब का सेवन करने वाली महिलाओं में अधिक रहता है। गर्भवती महिलाओं में शुरू के दिनों में 12 प्रतिशत अधिक खतरा होता है। शिशु के मस्तिष्क में विकृति की सम्भावना औरों के मुकाबले मद्यपान करने वाली महिलाओं के शिशुओं में 35 प्रतिशत तक अधिक होती है। मद्यपान से स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है, निर्णय क्षमता घट जाती है। गुर्दे, यकृत और गर्भाशय संबंधी अनेक रोग हो जाते हैं। इससे न केवल महिलाओं का स्वास्थ्य चैपट होता है बल्कि उनकी समाज में छवि भी धूमिल होती है। शराबी महिलाएँ बलात्कार तथा यौन उत्पीड़न का अधिक शिकार होती हैं।

नशे के कारोबार से जहां कुछ लोग दिनोंदिन अमीर बनते जा रहे है, वहीं हमारी पूरी पीढ़ी का भविष्य ही दांव पर लग रहा है। तो आईये! आज अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस पर शपथ लें कि आओ समाज को नशामुक्त बनायें।

epmty
epmty
Top