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हेपेटाइटिस रोग में सतर्कता व बचाव जरूरी

हेपेटाइटिस रोग में सतर्कता व बचाव जरूरी

नई दिल्ली। 'विश्व हेपेटाइटिस दिवस' को मनाने का मकसद लोगों में इस बीमारी की रोकथाम, परीक्षण और उपचार के बारे में जागरूकता फैलाना है। लोगों में जागरुकता न होने के कारण लोग सही समय पर हेपेटाइटिस का टीका नहीं लगवाते हैं, जिसके कारण यह बीमारी बढ़ती जाती है और एक खतरनाक रूप धारण कर लेती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की तरफ से हेपेटाइटिस पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए हर वर्ष 28 जुलाई को 'विश्व हेपेटाइटिस दिवस' मनाया जाता है। 28 जुलाई की तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि यह नोबेल-पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. बारूक ब्लमबर्ग का जन्मदिन है, जिन्होंने हेपेटाइटिस बी वायरस (एचबीवी) की खोज की थी और वायरस के लिए एक नैदानिक परीक्षण और टीका विकसित किया था। उन्हें इस खोज के लिए साल 1976 में चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। विश्व हेपेटाइटिस दिवस साल 2010 से मनाया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा चिह्नित किए गए आठ वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में से यह एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मई 2010 में एक प्रस्ताव पारित कर यह दिवस मनाने की घोषणा की थी। इससे पहले क्रोनिक वायरल हैपेटाइटिस के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विश्व हेपेटाइटिस एलायंस ने साल 2008 में अभियान चलाया था।

'विश्व हेपेटाइटिस दिवस' को मनाने का मकसद लोगों में इस बीमारी की रोकथाम, परीक्षण और उपचार के बारे में जागरूकता फैलाना है। लोगों में जागरुकता न होने के कारण लोग सही समय पर हेपेटाइटिस का टीका नहीं लगवाते हैं, जिसके कारण यह बीमारी बढ़ती जाती है और एक खतरनाक रूप धारण कर लेती है। हेपेटाइटिस होने पर ये शरीर में विभिन्न तरह के दिक्कतों का भी कारण बनती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी की गयी, रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों में हेपेटाइटिस का असर उनकी फर्टिलिटी पर पड़ता है। भारत में हेपेटाइटिस फैलने का मुख्य कारण मां से बच्चे में वायरस का संचारित होना है। भारत में करीब चार करोड़ लोग इस वायरस के संक्रमण से ग्रसित हैं। ये सभी हेपेटाइटिस बी के वायरस से इंफेक्टेड हैं।

डब्लूएचओ के मुताबिक, हेपेटाइटिस लीवर से जुड़ी एक गंभीर संक्रामक रोगों के समूह की वजह से होने वाली सूजन की बीमारी है। यह वायरस मरीज के लिवर को निशाना बनाता है जिसके कारण शरीर स्थायी रूप से प्रभावित होता है। यह बीमारी मनुष्य के साथ बंदरों की प्रजाति के लीवर को भी संक्रमित करती है, जिस कारण से लीवर में सूजन और जलन पैदा होती है। हेपेटाइटिस यकृत की सूजन है, जिसे यकृत के ऊतकों में सूजन वाली कोशिकाओं की मौजूदगी से पहचाना जाता हैं। इसे लक्षणों के मुताबिक अलग-अलग ए, बी, सी, डी और ई भागों में बांटा गया है। हेपेटाइटिस वायरस, अत्यधिक शराब और ड्रग्स का सेवन करने के साथ ही ऑटोइम्यून रोग भी माना जाता है। इसके बढ़ने पर लीवर सिरोसिस या लीवर कैंसर होने की अशंका बढ़ जाती है। हैपेटाइटिस अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों ही रूप में लोगों के लीवर को प्रभावित करती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ो के मुताबिक, दुनिया में हेपेटाइटिस बी यानि क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से दुनिया में सबसे ज्यादा लगभग 257 करोड़ और क्रोनिक हेपेटाइटिस सी से करीब 71 करोड़ लोग पीड़ित है। हर साल लगभग 10 लाख लोग हेपेटाइटिस की वजह से अपनी जान गंवाते हैं। ये संख्या तपेदिक और एचआईवी से होने वाली मौतों से बहुत ज्यादा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हेपेटाइटिस ए और ई दूषित भोजन या पानी की वजह से होता है जबकि हेपेटाइटिस बी, सी और डी आनुवंशिक और अशुद्ध रक्त और दूषित उपकरणों के संपर्क, हेपेटाइटिस बी के पीड़ित के संपर्क में आने से होता है। हेपेटाइटिस का इंफेक्शन तेजी से फैलता है और इसके लक्षण बेहद ही सामान्य होते हैं, जिन्हें पहचानना बेहद मुश्किल होता है। इसमें अत्यधिक थकान, पीलिया (त्वचा और आंखों का पीला होना), गहरे रंग का पेशाब, मितली, उल्टी और पेट दर्द जैसे लक्षण शामिल होते हैं। डब्लूएचओ के मुताबिक, हेपेटाइटिस को 7 प्रकार में बांटा जाता है। जिसमें हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी, ई, एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस और ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस हैं। हिपेटाइटिस-बी का संक्रमण होने के बाद मरीज को ठीक होने में करीब छह महीने का समय लगता है। इसके बाद भी यदि मरीज हिपेटाइटिस-बी पॉजिटिव हो तो इसका मतलब है कि बीमारी गंभीर रूप ले चुकी है और अब यह जीवनपर्यंत रहेगी। गंभीर रूप से संक्रमित होने पर रोगी के लिवर को स्थायी क्षति पहुंचती है। मरीज की लिवर कैंसर की वजह से मृत्यु भी हो सकती है।

हेपेटाइटिस-बी के इलाज से आमतौर पर 90 प्रतिशत वयस्क ठीक हो जाते हैं लेकिन 10 प्रतिशत में बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। संक्रमण की चपेट में आने वाले 90 प्रतिशत शिशुओं को गंभीर हेपेटाइटिस हो जाता है। गंभीर संक्रमण आमतौर पर ऐसे लोगों को होता है जो बचपन में हेपेटाइटिस-बी वायरस की चपेट में आ चुके हों। हेपेटाइटिस-बी वायरस से संक्रमित होने पर हो सकता है कि आपको कोई लक्षण नजर ही न आए। संक्रमित व्यक्ति से अन्य लोगों को भी संक्रमण फैल सकता है, चाहे उनमें बीमारी के लक्षण दिखाई न भी दे रहे हों। कई दिनों या हफ्तों तक रोगी बीमार महसूस कर सकता है। उसकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब भी हो सकती है। यदि शरीर हेपेटाइटिस-बी वायरस से सफलतापूर्वक लड़ लेता है तब इस बीमारी के कारण सामने आए लक्षण कुछ हफ्तों या महीनों में गायब हो जाते हैं।

जब मरीज का शरीर इस संक्रमण से लड़ते-लड़ते हार जाता है तो ऐसे में यह बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। हेपेटाइटिस के कई मरीजों में इस बीमारी की वजह से कोई लक्षण सामने नहीं आते, न ही वे बीमार दिखाई देते हैं लेकिन फिर भी उनके लिवर को नुकसान होना शुरू हो चुका होता है। साथ ही उनके शरीर से दूसरों तक संक्रमण भी फैल सकता है। संक्रमण होने के बाद शुरुआती संकेत ये हो सकते हैं- भूख कम होना, कम परिश्रम पर अधिक थकान महसूस करना, बार-बार बुखार होना, मांसपेशियों व जोड़ों में दर्द रहना, मितली आना, उल्टियां होना आदि। त्वचा पर पीलापन आना, गहरे पीले रंग का मूत्र होना आदि लक्षण भी सामने आते हैं। इसीलिए सभी नवजात शिशुओं को हेपेटाइटिस-बी का टीका लगाया जाना जरूरी है और 6 माह की उम्र तक टीकाकरण के तीनों चरण पूरे हो जाने चाहिए। वे बच्चे जिनकी उम्र 19 साल से कम है और जिन्हें बचपन में हेपेटाइटिस के टीके नहीं लगाए गए हों, उन्हें 'कैच अप' डोज दिए जाने चाहिए। सामुदायिक टीकाकरण करवाया जा सकता है जिसमें शिविर लगाकर एक ही स्थान के लोगों का टीकाकरण किया जाए। हेपेटाइटिस एक संक्रामक रोग है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ये छूने मात्र से फैल जाता है। इसलिए परिवार के किसी सदस्य को यह रोग होने पर उसे बिल्कुल अलग रखने की जरूरत नहीं होती है हालांकि परिवार के अन्य सदस्यों को संक्रमणमुक्त रखने के लिए सावधानियां आवश्यक है।

(नाज़नींन-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

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