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ब्रेन स्ट्रोक जानलेवा हो सकता है

ब्रेन स्ट्रोक जानलेवा हो सकता है

अनियमित खानपान, हाइपरटेंशन और धूम्रपान की वजह से ब्रेन स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन ज्यादातर लोग अब भी इसकी गंभीरता से अनजान हैं। इलाज के बेहतर विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को समय पर सही उपचार मिलने में परेशानी होती है। बे्रन स्ट्रोक के बारे में कुछ प्रमुख जानकारी, आइए जानते हैं। न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल हर छठा आदमी अपनी जिंदगी में कभी न कभी स्ट्रोक की समस्या से रूबरू होता है। हर छठे सेकंड में एक व्यक्ति की मौत स्ट्रोक से होती है। 60 से ऊपर की उम्र के लोगों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक होता है। 15 से 59 आयुवर्ग में मृत्यु का पांचवां सबसे बड़ा कारण है। अगर आप इसके लक्षणों को जानते हैं और समय पर चिकित्सा के उपाय किए जाते हैं तो मरीज को बचाने में काफी सहूलियत हो सकती है।
क्या होती है प्रॉब्लम
ब्रेन स्ट्रोक का सबसे सामान्य लक्षण होता है शरीर के किसी एक ओर के हिस्से में कमजोरी या लकवा जैसी स्थिति होना। स्ट्रोक होने पर ऐसा भी संभव है कि मरीज अपनी इच्छानुसार एक ओर के हाथ-पैर भी न हिला सके और कोई संवेदना भी महसूस न हो।
मरीज को बोलने में भी दिक्कत आ सकती है, और चेहरे की मांस पेशियां कमजोर हो जाती हैं जिससे लार बहने लगती है। सुन्न पडऩा या झुरझुरी होना भी इसका सामान्य लक्षण होता है।
स्ट्रोक आने के बाद 70 फीसदी मरीज अपनी सुनने और देखने की क्षमता खो देते हैं। साथ ही 30 फीसदी मरीजों को दूसरे लोगों के सहारे की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर 20 फीसदी हृदय मरीजों को स्ट्रोक की समस्या होती है।
स्ट्रोक के दो प्रकार
स्किमिक स्ट्रोक
धमनियों में चर्बी की मात्रा अधिक होने से वह पतली हो जाती है, जिससे ब्लॉकेज आ जाती है। इससे स्ट्रोक पड़ता है। इसे स्किमिक स्ट्रोक कहते हैं।
ब्रेन हेमरेज
यह स्ट्रोक ब्लड प्रेशर अधिक होने से होता है। इसमें ब्रेन के अन्दर रक्त नलिकाओं में लिकेज आ जाता है, जिससे ब्रेन हेमरेज हो जाता है। ब्रेन हेमरेज में ब्रेन के अन्दर भी लीकेज होता है और उसके सतह पर भी।
इन लक्षणों न करें नजरंदाज
कई बार बड़े स्ट्रोक से पहले छोटा स्ट्रोक पड़ता है, जिसमें कुछ समय के लिए आंख की रोशनी चली जाती है और फिर लौट आती है। या फिर अंग का कोई हिस्सा कमजोर हो जाता है और फिर ठीक हो जाता है। ऐसा चक्कर व तेज सिर दर्द हो सकता है, जो जिंदगी में पहली बार हुआ हो। पीडि़त को सांस लेने में भी तकलीफ हो सकती है और वह अचेत भी हो सकता है।
क्यों होता है ऐसा
न्यूरो विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी की वजह से दिमाग की किसी रक्त नलिका में रक्त का जमाव हो जाता है। इसके कारण रक्त का बहाव नहीं हो पाता। इससे उस रक्त नालिका से जुड़े शरीर के अन्य भाग काम करना बंद कर देते हैं। सर्दियों में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की संख्या गर्मियों की अपेक्षा बढ़कर लगभग दोगुनी हो जाती है। इसके पीछे कारण ये होता है कि सर्दियों में रक्त गाढ़ा हो जाता है। शरीर को गर्म रखने के लिए रक्तचाप भी बढ़ जाता है। इसके अलावा ठंड के मौसम में लोग बेहतर स्वास्थ्य के लिए ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन लेने लगते हैं, जिससे कॉलेस्ट्रॉल काफी तेजी से बढ़ता है, और रक्त प्रवाह में अवरोध बनता है।
स्ट्रोक की स्थिति में क्या करें
मरीज को स्ट्रोक के साढ़े चार घंटे के अंदर ही अस्पताल पहुंचाने की कोशिश करें। अच्छा होगा कि पहले घंटे के अंदर ही सही चिकित्सक के पास पहुंचें। हार्ट अटैक की तरह बे्रन स्ट्रोक में भी पहला घंटा गोल्डर ऑवर माना जाता है। जांच व इलाज में देरी से ब्रेन को गंभीर नुकसान भी हो सकता है। अगर मरीज को सही इलाज मिल जाए तो कभी-कभी स्ट्रोक से पूरी तरह उबरा जा सकता है। यह मुमकिन न हो, तब भी इलाज से मरीज को बहुत कुछ अपने लायक बनाया जा सकता है। ध्यान रखें कि मरीज के पहले 48 से 72 घंटे बहुत नाजुक होते हैं।
अस्पताल में उपचार प्रक्रिया
अस्पताल पहुंचने पर क्लीनिकल परीक्षण के बाद मस्तिष्क का सीटी स्कैन या एमआरआई किया जाता है। इस जांच से यह मसला सुलझ जाता है कि लकवा खून का दौरा रुकने से हुआ है या धमनी फटने से। डॉक्टर धमनियों के माध्यम से दवाइयां देते हैं, जो मस्तिष्क में जाकर रक्त के थक्के के तोड़ देती हैं। ऐसी दवाएं भी दी जाती हैं जिनसे मस्तिष्क की सूजन कम हो। कोशिश यह रहती है कि मस्तिष्क का कम-से-कम नुकसान हो और जीवन के लिए जरूरी क्रियाएं सुचारू रूप से चलती रहें। सांस चलाए रखना, शरीर को समुचित मात्र में द्रव और पोषक तत्व देने के लिए नाक से प्लास्टिक की ट्यूब से द्रव रूप में आहार देना, मूत्राशय में केथेटर लगाना, मल-त्याग पर नियंत्रण न रहने की स्थिति में साफ-सफाई, समय से करवट दिलाना, पेशियों की नियमित मालिश और व्यायाम जैसी अनेक चीजों पर ध्यान देने की सख्त जरूरत होती है। तुरंत इलाज मिल जाने पर मरीज के लाखों रुपये का खर्च भी बच जाता है। मरीज 2 से 3 दिन में पूरी तरह से स्वस्थ होकर घर जा सकता है।
दिनचर्या में रखें ध्यान
आमतौर पर लोग यह सोचते हैं कि अगर स्ट्रोक हो भी गया, तो तीन घंटे का वक्त इलाज मिलने के लिए काफी होता है। इसलिए वे इसकी ज्यादा परवाह नहीं करते। लेकिन, कुछ ही लोग इतनी भाग्यशाली होते हैं कि उनके ऊपर दवा काम कर जाती हैं, लेकिन हर कोई उनकी तरह भाग्यशाली नहीं होता। इसे रोकने का एक ही तरीका है और वह है-बचाव। ऐसे लोगों को अपने लाइफ स्टाइल में बदलाव लाना चाहिए ताकि वे स्ट्रोक की स्टेज के आसपास भी न पहुंच पाएं।
हाई ब्लड प्रेशर, डायबीटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से ग्रस्त लोग नियमित जांच कराते रहें। तनाव मुक्त जीवन जीने की सलाह दी जाती है। तनाव का भी असर ब्रेन स्ट्रोक पर पड़ता है।
मोटापे को हावी न होने दें ओर सही व संतुलित आहार को अपनी आदतों में ढालें। शारीरिक रूप से सक्रियता बनाएं रखें और हो सके तो रोज उचित व्यायाम करें।
सिगरेट-तंबाकू का सेवन करते हों तो तुरंत बंद कर देंं। शराब पीने की आदत हो तो सीमित मात्रा में सेवन करें। साथ ही स्ट्रोक की चेतावनी देने वाले शरीर संकेतों को पहचानना सीखें।
साभार :आर्टिकल वर्ल्ड

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