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राज्य संग्रहालय, लखनऊ कला अभिरूचि पाठ्यक्रम

लखनऊ। कला अभिरूचि पाठ्यक्रम के चैथे दिन आज दिनांक 02 फरवरी, 2019 को लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ के प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर प्रो0 अमर सिंह ने भारतीय स्थापत्य कला विषय पर विशिष्ट व्याख्यान दिया गया।। विद्वान वक्ता द्वारा अपने व्याख्यान में बताया गया कि भारतीय वास्तुकला या स्थापत्य कला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है इसका विकास मानव सभ्यता के विकास के साथ ही आरम्भ हुआ। मानव के बौद्धिक क्षमताओं मे विकास के साथ ही वास्तु में भी उन्नति हुई। मानव ने इस क्रम में झोपङिया,छोटे भवन ,ग्राम, नगर दुर्ग आदि निर्मित किये। साथ ही अपनी धार्मिक एवं आध्यात्मिक आवश्यक्ताओं की पूर्ति के लिए उसने मंदिर, स्तूप, विहार, चैत्यगृह, मस्जिद, मकबरे एवं गुरूद्वारे का निर्माण किया। जिसके पीछे एक मूलभूत सिद्धांत कार्य करता है। उन्होंने इस क्रम में दिकविन्यास, पदविन्यास और मार्ग विन्यास के सिद्धांतों के साथ साथ भूमि चयन, वास्तुपूजा, वास्तु सम्बन्धी कर्मकांडो की भी चर्चा की।

उन्होंने हजार वर्ष पुरानी सिंधु सभ्यता के वास्तुगत विशेषताओं को विस्तृत रूप से पावर पॉइंट के माध्यम से व्याख्यायित किया। इस क्रम में उन्होंने बताया कि किस प्रकार सिंधु सभ्यता के लोग एक दुर्गीकृत आवासीय परिधि में एक सुनियोजित व्यवस्था के बीच निवास करते थे। उनके सड़क व्यवस्था,जल संचयन,पक्की ईटों से निर्मित आवास,कूप इत्यादि विशेषताए उनकी उच्च नगर नियोजन को प्रदर्शित करती है। स्थापत्य कला के विकासक्रम को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने बताया कि मौर्यकाल के दौैरान देश में कई शहरों का विकास हुआ। मौर्यकाल भारतीय कलाओं के विकास के दृष्टिकोण से एक युगांतकारी युग था। इस काल के स्मारकों व स्तंभों को भारतीय कला के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है। इस काल के स्थापत्य में लकड़ी का काफी प्रयोग किया जाता था। अशोक के समय से भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग प्रारंभ हो गया था।

उन्होंने यह भी बताया कि शुंग और कुषाण वंशों और दक्षिण में सातवाहन वंश के समय मे कला स्मारक स्तूप, गुफा मंदिर (चैत्य), विहार, शैलकृत गुफाएं आदि का निर्माण हुआ । अजंता की कुछ गुफाओं का निर्माण भी इसी काल के दौरान हुआ। इस काल के गुफा मंदिर काफी विशाल हैं। गुप्तकाल के दौरान स्थापत्य व वास्तु अपने चरमोत्कर्ष पर था। इस काल के मंदिरों का निर्माण ऊँचे चबूतरों पर पत्थर एवं ईंटों से किया जाता था। गुप्तकालीन मंदिरों के सबसे भव्य और महत्वपूर्ण मंदिर देवगढ़ (झाँसी के पास) और भीतरगांव (कानपुर) हैं। इन मंदिरों में रामायण, महाभारत और पुराणों से विषय-वस्तु ली गई है।

कार्यकम का संचालन रेनू द्विवेदी सहायक निदेशक, पुरातत्व (शैक्षिक कार्यक्रम प्रभारी) ने किया। कार्यकम के अन्त में डाॅ0 आनन्द कुमार सिंह, निदेशक उ0प्र0 संग्रहालय निदेशालय ने भारतीय स्थापत्य कला विषय पर अत्यन्त सजीवता के साथ विद्यार्थियों के मध्य दिये गये व्याख्यान के लिए विद्वान वक्ता को धन्यवाद ज्ञापन करने के साथ-साथ प्रतिभागियों तथा अतिथियों एवं पत्रकार बन्धुओं को धन्यवाद ज्ञापित किया।

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