चन्द्रशेखर आजाद के जन्मदिन पर विशेषः दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं और आजाद ही रहेंगे

चन्द्रशेखर आजाद के जन्मदिन पर विशेषः दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं और आजाद ही रहेंगे

शहीदों की मजार पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों को बस यही बाकी निशां होगा।

ये पंक्तियां यूं ही अस्तित्व में नहीं आयी होगी, इन पंक्तियों के रचियता को शायद इस बात का भान हो गया होगा कि देश में इतिहास हमेशा सत्ता की ही कहानी लिखने में मस्त रहता है। वतन पर मिटने वालों की सुध उसे किसी विशेष मौकों पर ही आती है। ऐसे वतन पर शहीद होने वाले चंद्रशेखर आजाद का जन्म आज ही के दिन 113 साल पहले वर्ष 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जनपद स्थित के भाबरा नामक स्थान पर हुआ था।

चन्द्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ, किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके।आज उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें भारत माता का वीर सपूत बताकर हम उन्हें श्रद्धांजलि. अर्पित कर रहे हैं, जबकि होना ये चाहिए कि हमें उनकी बहादुरी के किस्से अपनी आने वाली पीढ़ी के सम्मुख एक आर्दश बनाकर रखने चाहिएं। देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले चंद्रशेखर आजाद 1920 में 14 वर्ष की आयु में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गये थे। असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने के बाद जज द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और जेल को अपना पता बताया था। इस जवाब के लिए आजाद को 15 कोड़ों की सजा दी गई थी। इसके बाद उन्हें सार्वजनिक रूप से आजाद के नाम से पुकारा जाने लगा था।

1922 में चैरी चैरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आजाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया। इसके बाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया और चन्द्रशेखर आजाद भी इस दल में शामिल हो गये थे। आजाद ने 1925 के काकोरी कांड में सक्रिय भाग लिया था। चंद्रशेखर आजाद ने ही 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस ऑफिर एसपी सॉन्डर्स को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था। इतना ही नहीं उन्होंने साण्डर्स की हत्या के बाद लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए थे, जिन पर लिखा था कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है।

चंद्रशेखर आजाद ने कहा था-दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे। आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।।

और मरते दम तक उन्होंने अपनी बात को कायम रखा और वे न तो अंग्रेजों की पकड़ में ही आये और न ही उनकी दासता ही कबूल की। कहते हैं, जब वे चारो ओर से घिर गये थे, तो उन्होंने बचने का कोई रास्ता न देख खुद ही अपनी ही अपनी कनपटी पर गोली दाग ली थी और भारत का वीर सपूत चिरनिन्द्रा में चला गया था। बताते हैं कि चंद्रशेखर आजाद का निशाना बहुत अच्छा था। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे।

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